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Updated: 30 नवम्बर, 2015 05:37 PM
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सुनील नरेन की गेंदबाजी पर बैन लगाने का आईसीसी का फैसला चौंकाने वाला नहीं है. नरेन वैसे भी काफी पहले से संदिग्ध गेंदबाजी एक्शन को लेकर चर्चा में थे. आईसीसी के रडार पर थे. पिछले साल आईपीएल और फिर चैम्पियंस लीग के दौरान नरेन के बॉलिंग एक्शन को लेकर खूब चर्चा हुई. कई लोग यह भी मानते हैं कि एक्शन से इतर नरेन तब दो खेमों के बीच चल रही तनातनी के भी शिकार हुए. उसकी अपनी कहानी है लेकिन यह तो तय है कि नरेन ने जब 2011 में अपने इंटरनेशनल करियर की शुरुआत की तभी से उनका एक्शन सवालों के घेरे में रहा है.

नरेन बस इससे बचते नजर आ रहे थे. शायद यही कारण था कि बिना कारण उन्होंने वर्ल्ड कप से नाम वापस ले लिया जबकि वेस्टइंडीज के लिए विश्व कप में वह सबसे बड़े खिलाड़ी साबित हो सकते थे.

सवाल ICC से

संदिग्ध एक्शन की लिस्ट में नरेन अकेले नहीं है. नरेन अभी वनडे और टी-20 वर्ल्ड रैंकिंग में नंबर एक गेंदबाज हैं. जब पाकिस्तान के सईद अजमल पर प्रतिबंध लगा था तब वे भी रैंकिंग में शीर्ष पर थे. इसलिए सवाल इन खिलाड़ियों से नहीं है. इन खिलाड़ियों ने प्रदर्शन किया और उसके बल पर शीर्ष स्थान हासिल करने में कामयाब रहे. सवाल तो आईसीसी और इसके कर्ताधर्ताओं से होना चाहिए. क्या कारण है कि अचानक पिछले दो-तीन वर्षों में एक के बाद एक कई ऐसे गेंदबाजों के नाम सामने आए जिन्हें लेकर आईसीसी को सख्त रवैया अपनाना पड़ा? इसमें कुछ तो ऐसे नाम हैं जो टॉप टेन में रहे. क्या बॉलिंग एक्शन को लेकर अंपायरों ने ज्यादा सख्त रवैया अपनाना शुरू कर दिया है?

ICC का ढीला रवैया

1995 में ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका के बीच मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर खेला गया बॉक्सिंग डे टेस्ट डारेल हेयर की अंपायरिंग के कारण सबसे ज्यादा चर्चित रहा. हेयर ने तब मुरलीधरन के तीन ओवरों में सात गेंदों को नो बॉल करार दिया था. मुरलीधरन को तब इंटरनेशनल क्रिकेट में कदम रखे दो-तीन साल ही हुए थे. वह घटना बेहद चर्चित हुई. लेकिन उसके बाद लंबे समय तक अंपायरों का तेवर मैदान पर नहीं दिखा. ऐसा लगा कि किसी ने अंपायरों के हाथ बांध दिए हों. लेकिन अब चीजें बदली-बदली नजर आने लगी हैं. अभी पिछले साल ही आईसीसी ने माना कि उसने अंपायरों से ज्यादा स्वतंत्र रूप से फैसले लेने को कहा है और संदिग्ध एक्शन पर भी चौकस निगाह रखने के निर्देश दिए हैं.

मतलब, देर से ही सही आईसीसी की नींद खुली है. पिछले दो दशकों में आईसीसी बॉलिंग एक्शन को लेकर सुस्त था. उदाहरण के तौर पर बीते वर्षों में मुरलीधरन के 'दूसरा' को लेकर बवाल मचा. सकलैन मुश्ताक, शोएब मलिक विवादों में रहे. शोएब अख्तर और ब्रेट ली जैसे तेज गेंदबाजों पर भी सवाल उठे. लपेटे में हरभजन सिंह तक आए. लेकिन आईसीसी ने शिकायतों से निपटने का बेहतर रास्ता यही खोजा कि उसने नियम ही बदल दिए. पहले तेज गेंदबाजों के लिए जरूरी था कि बॉलिंग करते समय उनकी कोहनी 10 डिग्री से ज्यादा नहीं घुमे जबकि स्पिनरों के लिए यह सीमा 5 डिग्री तक निर्धारित थी. इसे 2004 में बदलकर सभी बॉलर्स के लिए 15 डिग्री कर दिया गया. लेकिन कई गेंदबाज अब 15 डिग्री की निर्धारित सीमा का भी उल्लंधन करते नजर आ रहे हैं.

आईसीसी को पता चल चुका है कि पानी अब सिर से ऊपर जा रहा है. पिछले दो वर्षों में बांग्लादेश के सोहाग गाजी, श्रीलंका के सुचित्रा सेनानाएके, न्यूजीलैंड के केन विलियमसन, वेस्टइंडीज के शेन शिलिंगफोर्ड, ऑस्ट्रेलिया के जोहान बोथा सहित कई और नाम हैं जिनके एक्शन पर सवाल उठे और प्रतिबंधित भी किया गया. यह सभी बॉलर उस दौर में आए जब आईसीसी बॉलिंग एक्शन को लेकर नरम था. जाहिर है अब आईसीसी के पास दो ही विकल्प थे. या तो उसे देर-सबेर कड़े कदम उठाने थे या इसे और अनदेखा करना था. लेकिन देर से ही सही, आईसीसी ने पहला विकल्प चुना.

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