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Updated: 27 जून, 2018 06:12 PM
आशुतोष मिश्रा
आशुतोष मिश्रा
  @ashutosh.mishra.9809
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लंदन की एजेंसी थॉमसन रॉयटर्स ने दुनिया भर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जो सर्वे किया है उसमें भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश घोषित किया है. 4 साल पहले भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देशों की चौथी श्रृंखला में रखा गया था पर अब भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश घोषित किया गया है जिसमें पाकिस्तान और अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति भारत से बेहतर बताई गई है. दरअसल, यही तुलना इस सर्वे को हास्यास्पद बनाने के साथ-साथ सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है. भारत में महिलाओं की स्थिति पाकिस्तान और अफगानिस्तान से कितनी बेहतर है यह जानने समझने के लिए किसी सर्वे की जरूरत नहीं है.

राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस सर्वे को खारिज कर दिया और सरकार भी इस रिपोर्ट को दरकिनार कर रही है. जाहिर है महज़ कुछ महिलाओं से बात करके आप किसी देश में महिलाओं के रहन-सहन व उनकी सुरक्षा की वास्तविक स्थिति को लेकर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकते. लेकिन इस रिपोर्ट को अगर नकार भी दें तो क्या यह मान लें कि भारत महिलाओं के लिए बेहद सुरक्षित देश है या फिर सरकार यह कहना चाहती है कि भारत में क्रांतिकारी कदम और क्रांतिकारी बदलाव आ गए हैं जिससे महिलाओं की स्थिति में कायापलट हो गया है?

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जाहिर है स्थिति वैसी भी नहीं है. इसीलिए इस रिपोर्ट और सर्वे के कुछ तथ्यों को भारत को गंभीरता से लेना चाहिए. भारत में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध की जानकारी शासन द्वारा दर्ज की गई मुकदमों के जरिए सामने आती है. यह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश और उसकी पारदर्शी व्यवस्था की ताकत कही जा सकती है जिसकी वजह से आज महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों में ज्यादा से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो रहे हैं और दुनिया को उनके बारे में पता चल पा रहा है.

भारतीय राष्ट्रीय महिला आयोग के पीए का मानना है कि महिलाओं के अपराध पहले भी इतने ही होते थे लेकिन तब इन मामलों में न शिकायत दर्ज की जाती थी ना ही परिवार महिलाओं को शिकायत दर्ज करने के लिए प्रोत्साहित करता था और कई बार महिलाएं यौन हिंसा या अपने खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर सामाजिक दबाव या परिवार के दबाव में चुप्पी साध कर बैठ जाती थीं. भारत के कई इलाकों में महिलाओं के खिलाफ अपराध होने की स्थिति में बहू बेटियों को ही चुप करा दिया जाता था. आज स्थिति बदल गई है.

मीडिया और सोशल मीडिया के दौर में कड़े कानून और लगातार बदलती समाज की मानसिकता ने महिलाओं को वह आजादी दी है कि वह अपने खिलाफ होने वाले हर अपराध की सीधे शिकायत कर सकें और उसे सरकार तक पहुंचा सकें. 2012 के निर्भया कांड के बाद महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध खासकर यौन अपराध को लेकर कानून और कड़े हो गए हैं. मौजूदा सरकार ने नाबालिगों के साथ बलात्कार करने वाले को फांसी की सजा देने तक का प्रावधान किया है. लेकिन क्या यह कदम काफी हैं? क्या हाल फिलहाल में उठाए गए कदमों से महिलाओं की सुरक्षा भारत देश में आश्वस्त की जा सकती है? क्या महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देश के प्रधानमंत्री या किसी सूबे की सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

चुनावों में महिला सुरक्षा का दावा करने वाली सरकारों को लगातार महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराध को लेकर एक हद तक जिम्मेदार जरूर ठहराया जा सकता है साथ ही उनसे सवाल पूछा जा सकता है कि ऐसे अपराधों को रोकने के लिए उन्होंने ठोस कदम के तौर पर क्या फैसले लिए या उन्हें कैसे अमल में लाया. लेकिन इन सबसे जरूरी है महिला सुरक्षा महिला सम्मान को लेकर समाज की मानसिकता को बदलना और शुरुआत अपने घर अपने स्कूल और अपने दफ्तर से करना जहां आज भी महिलाएं अपने खिलाफ भद्दी मानसिकता से ग्रस्त लोगों से त्रस्त रहती हैं. क्या हम अपने घर में पुरुषों को और नव युवकों को यह सिखाते हैं कि वह समाज में लड़कियों और महिलाओं से कैसा बर्ताव करें? क्या हम अपने दफ्तर में पुरुषों के बीच यह नजरिया बनाने की कोशिश करते हैं कि वह साथी कर्मचारियों को किस भावना से देखें? क्या हम अपने इर्द-गिर्द समाज में महिलाओं को सम्मान और उनकी सुरक्षा को लेकर एक बड़ी भूमिका और चर्चा के लिए तैयार हैं?

सच तो यह है कि देश में महिला को सम्मान और सुरक्षा तभी मिलेगी जब उसकी शुरुआत हम अपने घर से करेंगे. महिलाओं के खिलाफ अपराध में कानून का काम दर्शन अपराध घटने के बाद आता है. कानून अपराध के बाद अपराधियों पर कार्यवाही कर सकता है लेकिन अपराध को रोक नहीं सकता. इसलिए भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उनकी स्थिति को लेकर इस सर्वे को नकारने की बजाए इस पर चिंता करने की जरूरत है और कुछ मौलिक कदम उठाने की जरूरत है.

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लेखक

आशुतोष मिश्रा आशुतोष मिश्रा @ashutosh.mishra.9809

लेखक आजतक में संवाददाता हैं

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