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बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 17 अप्रिल, 2015 07:31 AM
असित जौली
असित जौली
  @asit.jolly
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एक नई महिला पुलिस अफसर के साथ बातों में महिलाओं का एक बड़ा समूह मसरूफ है. कुछ नवविवाहिता, बेटियां-बहुएं, बच्चों को अपनी गोद से चिपकाए कुछ मां, बूढ़ी औरतें-सभी उसकी बातों पर हां में सिर हिला रही हैं. पुलिस अफसर उन्हें समझा रही है कि बच्चियों को स्कूल भेजना क्यों जरूरी है; औरतों को बांधकर रखने की किसी भी कोशिश का उन्हें प्रतिरोध क्यों करना चाहिए; बेटियों और बहुओं का बराबर सक्वमान क्यों किया जाना चाहिए और अपनी इज्जत के लिए किसी को मार देना क्यों गुजरे जमाने की बात हो चुकी है. इसमें कुछ खास नया नहीं है, सिवाए इसके कि यह तस्वीर हरियाणा के एक सुदूर अंचल की है जहां सिर्फ मर्दों का राज चलता है. जींद से भिवानी के बीच राजमार्ग पर दस किलोमीटर दूर स्थित बीबीपुर गांव में 19 फरवरी का दिन अपने आप में कुछ खास था क्योंकि उस दिन महिलाओं के भारी जमावड़े के बीच कुछ पुरुष भी मौजूद थे.

इन्हें संबोधित करने वाली युवा महिला का नाम अनिता कुंडू है जो हिसार स्थित उकलाना के भूमिहीन मध्यवर्गीय परिवार से आती हैं. उन्होंने मई, 2012 में माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल की थी जिसकी एवज में हरियाणा पुलिस में उन्हें सब-इंस्पेक्टर की नौकरी मिल गई. कुंडू के साथ 44 गांवों की प्रतिनिधि और बेहद शक्तिशाली खाप सतरोल के मुखिया कैप्टन महावीर लोहान भी मौजूद थे. वे खुद कन्या भ्रूणहत्या और परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर की जाने वाली हत्या के मुखर विरोधी हैं. उस दिन बीबीपुर में अपने किस्म की इस अद्भुत महिला चौपाल में (नौ गांवों की) नौगामा खाप के युवा और बूढ़े सदस्य भी मौजूद थे. जैसे-जैसे और महिलाएं आती जा रही थीं, वे उनके लिए अपनी कुर्सी छोड़ते जा रहे थे.खाप पंचायतों के लिए कुख्यात हरियाणा के बीचोबीच स्थित बीबीपुर में जो घट रहा है, वह एक बड़े सामाजिक बदलाव का संभावित संकेत है जो आने वाले समय में विवेकपूर्ण खाप पंचायतों की शक्ल ले सकता है.

इसकी शुरुआत 14 जुलाई, 2012 को हुई थी जब बीबीपुर के युवा सरपंच और दो बेटियों के पिता 32 वर्षीय सुनील जागलान ने हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली की 112 खापों की एक महापंचायत बुलाई थी और कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ मृत्युदंड की मांग करते हुए संयुक्त संकल्प को अपनाने के लिए इन्हें प्रेरित किया था.बुजुर्गों को हुई ''असहजता'' को याद करते हुए सरपंच की 29 वर्षीया बहन ऋतु बताती हैं, ''यह काम आसान नहीं था. इन्हें इस बात की आदत ही नहीं थी कि औरतें इनके बीच में बोलें. जब मैं बोलने उठी तो चर्चा का विषय बन गया.''

जल्द ही यह असहजता खत्म होने लगी. जागलान उस दिन को याद करते हुए बताते हैं, ''पहली बार औरतों ने बिना किसी बंधन के भागीदारी की और बिना डरे खाप के आला नेताओं पर सवाल उठाए.'' एक-से-एक अक्खड़ प्रधानों ने उनके सामने हथियार डाल दिए. कानून में तो बहुत पहले लिंग परीक्षण पर रोक लग चुकी थी, लेकिन इतने साल बाद आखिरकार खाप के सभी बुजुर्ग इस बात पर सहमत हो सके कि कन्या भ्रूणहत्या को हत्या के बराबर ही माना जाए.

जागलान बताते हैं कि उत्तर भारत में जाट समुदाय के भीतर लड़का पाने की बरसों पुरानी चाहत के खिलाफ एक संकल्प के लिए खाप नेताओं का राजी हो जाना दरअसल इस जागरूकता और बढ़ती चिंता का नतीजा था कि प्रौढ़ों में लिंगानुपात खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है और बहुत से गांवों से जन्म के समय लिंगानुपात की घटती दर के साथ आशंका है कि यह और बुरी स्थिति में पहुंच जाएगा.

मसलन, हरियाणा में 2011 की जनगणना के मुताबिक औसत राज्यवार लिंगानुपात 1,000 पुरुषों पर 879 महिलाओं का है. लेकिन गांवों से जो खबर आ रही है, वह इससे कहीं अधिक भयावह है. राज्य के स्वास्थ्य विभाग के पास मौजूद आंकड़े इस भयावह सचाई को सामने लाते हैं और यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 जनवरी को अपने ''बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'' अभियान की शुरुआत हरियाणा से की जब उन्होंने यहां के लोगों से साफ कहा कि वे ''बेटियों की हत्या न करें.''

राज्य के कुल 7,363 गांवों में से 3,974 यानी आधे से ज्यादा गांवों में 2013 में जन्म के समय (0 से एक साल) लिंगानुपात 500 से नीचे पाया गया था. इनमें मेवात का गजरपुर, जींद का खराल, कैथल का बोपुर और पंचकूला का सूरी गांव शामिल है जहां यह अनुपात खतरनाक स्तर तक कम यानी 1,000 पुरुषों पर 76 से 143 महिलाओं का था. इसके अलावा करीब 2,400 गांव और कुछ छोटी रिहाइशें ऐसी भी हैं जहां से 2013 में किसी भी लड़की के जन्म की खबर ही नहीं आई. हरियाणा के अतिरिक्त मुख्य सचिव और स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी रामनिवास बताते हैं कि लगातार घटता लिंगानुपात कड़ी सचाई को बयान करता है और इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती. वे कहते हैं, ''यह सच है कि ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जा रहा है.'' वे चेतावनी देते हैं कि स्थिति बहुत नाजुक है और समय के साथ यह ''हरियाणा के ग्रामीण समाज के पतन'' की वजह बन सकती है.

राम निवास ऐसे तमाम युवकों के बारे में बताते हैं जिन्हें शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रही हैं और ऐसा तकरीबन हर गांव में है. नौगामा और सरतोल खाप के युवा सदस्य बताते हैं कि कन्या भ्रूणहत्या के चलन की वजह से पैदा हुआ लड़कियों का संकट इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अधिकतर खाप पंचायतें गोत्र के कानून को लागू करती हैं. उनके मुताबिक लड़कों की तरह लड़कियों को भी पैतृक संपत्ति में समान हिस्सा देने संबंधी हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 में किए गए ऐतिहासिक संशोधन ने लड़कों की चाहत को और बढ़ाने का ही काम किया है.

जींद के रहने वाले दो किसान अनिल कुमार और सुनील लांबा बीस की उम्र काफी पहले पार कर चुके हैं लेकिन उन्हें लगता है कि उनकी गृहस्थी बसने में अभी काफी समय लगेगा. वे कहते हैं, ''हरियाणा में दुलहन की तलाश सरकारी नौकरी पाने जितनी मुश्किल है.'' दोनों युवा खाप की बैठकों में सक्रिय तौर पर हिस्सा लेते हैं. इनका इकलौता उद्देश्य यही होता है कि ज्यादा से ज्यादा परंपरावादी बुजुर्गों को शादियों के मामले में लगी बंदिशें ढीली करने के लिए तैयार किया जा सके.

इसी समस्या की वजह से कुछ और युवाओं को प्रेरित करने के बाद पिछले साल 20 अप्रैल को सतरोल खाप ने एक स्वर में 650 साल पुरानी परंपरा को तिलांजलि दे डाली. सदियों में पहली बार खाप नेताओं ने घोषणा की कि वे दूसरे गांवों और दूसरी जातियों में शादियों का समर्थन करेंगे.

हिसार में हुई सतरोल पंचायत में विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल रहे जागलान इस फैसले को ''ऐतिहासिक और इंकलाबी'' मानते हैं. वे एक और अहम बात बताते हैं, ''उन्होंने प्रेम विवाहों को भी मान्यता दे दी है.'' लोहान के मुताबिक अब उनके इलाके में हुई हर अंतर्जातीय शादी के लिए खाप 21,000 रु. की प्रोत्साहन राशि देती है. लंबे समय से चली आ रही आलोचनाओं को विराम देते हुए अब खाप पंचायतों ने अपनी बैठकों में औरतों को भी सक्रिय रूप में हिस्सेदारी निभाने और बोलने को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया है. लोहान साठ के दशक की एक घटना का हवाला देते हैं जब मलिक समुदाय के मुखिया घासीराम मलिक ने एक ही गोत्र के दंपती के बीच शादी को सार्वजनिक तौर पर सहमति दी थी. लोहान बताते हैं कि कैसे उन्होंने घोषणा की थी कि इस दंपती का बच्चा ''असली मलिक'' होगा. वे एक और पुरानी घटना बताते हैं कि कैसे सतरोल खाप के एक पुराने जेलदार ने जबरदस्त उर्वर 44 गांवों के समूह के बाहर असिंचित और बंजर इलाके में लड़कियों की शादी करने के चलन पर खुलेआम सवाल उठाया था. पिछले अप्रैल में सतरोल खाप की परिवर्तनकारी घोषणा के कुछ ही हक्रतों बाद भिवानी की सर्वाधिक वर्चस्व वाली सांगवान खाप ने भी ऐलान कर डाला कि वह अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों को मान्यता देगी.

हालांकि कई सामाजिक कार्यकर्ता और विद्वान अब भी सशंकित हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे डी.आर. चैधरी कहते हैं कि 'ये बदलाव सतही हैं और परिस्थितियों की मजबूरी के चलते किए गए हैं. इनका दिमाग-इनकी बुनियादी निक्वन-जाति विरोधी और स्त्री-द्वेषी मानसिकता नहीं बदली है.'' वे शिकायती लहजे में ही सही, पर बीबीपुर में जागलान और उनके लोगों की कोशिशों को जरूर स्वीकार करते हैं.

सतरोल और अन्य खापों में निभाई अपनी भूमिका के अलावा सुनील जागलान ने अपने गांव की औरतों को जोडऩे के एजेंडे पर लगातार काम किया है. वे जून, 2010 में बीबीपुर के सरपंच चुने गए थे. जुलाई, 2012 में कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ  खापों से एक संकल्प पारित करवाने का उनका प्रयास भले ही अंतरगोत्र और अंतर्जातीय विवाहों में रियायत दिलवाने तक न जा सका हो, लेकिन जो शुरुआत उन्होंने की है, वह ज्यादा अहम है.

बीबीपुर में 19 फरवरी को हुआ जुटान संयोग से पचासवां था, जिसकी शुरुआत 24 जनवरी, 2012 को हुई थी. इस बार बीबीपुर की औरतें आदमियों के मुकाबले कहीं ज्यादा मुखर और निर्णायक थीं. इनमें एक वक्ता जयवंती शिवकंद थीं जो आइएएस अफसर रह चुकी हैं. उन्होंने जब यह कहा कि ''स्कूल जाने और किताब पढऩे से कोई लड़की खराब नहीं हो जाती,'' तो संतोष देवी नामक वृद्ध महिला ने सबसे तेज आवाज में उनका अभिवादन किया, जो अपनी उम्र पूछे जाने पर बस इतना बता पाती हैं कि ''जब पाकिस्तान बना था तब उनके बच्चे हो चुके थे.''

हरियाणा में महिलाओं की शिक्षा से जुड़े आंकड़े गायब हो चुकी लड़कियों के आंकड़े जितने ही भयावह हैं. जागलान कहते हैं, ''बमुश्किल 20 फीसदी स्कूली लड़कियां ही कॉलेज जा पाती हैं क्योंकि उनके माता-पिता को डर रहता है कि दूर शहर में स्थित संस्थानों में जाते या लौटते समय इन पर यौन हमले हो सकते हैं.'' फिलहाल पंचायत, ग्रामीण लड़कियों को सुरक्षित संपर्क साधन मुहैया कराने के लिए राज्य सरकार पर दबाव डालने के लिए अभियान चला रही है.

बीबीपुर की पंचायत ने 2014 में एक संकल्प पारित करते हुए गांव के सरकारी बजट के आधे हिस्से पर महिलाओं का पूरा नियंत्रण कायम कर दिया था. जागलान और उनके साथियों समेत गांव की महिलाओं को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में ज्यादा से ज्यादा खाप नेता दकियानूसी परंपराओं से मुक्त होंगे. फिलहाल तो यह सुखी कस्बा अपनी औरतों के मामले में धारा के विपरीत तैर रहा है. इसका पता गांव के प्रवेश द्वार से चलता है जिस पर लिखा है कि ''बीबीपुर-औरतों की दुनिया'' में आपका स्वागत है.

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लेखक

असित जौली असित जौली @asit.jolly

लेखक इंडिया टुडे मैगजीन में पत्रकार हैं.

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