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Updated: 30 जुलाई, 2015 07:20 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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नासिक में सिंहस्थ कुंभ के शुरू होने में हफ्ते भर बाकी रहे होंगे. ट्विटर पर कुंभ मेला ट्रेंड कर रहा था. पहली नजर में परंपरा और आधुनिकता का ये संगम बढ़िया लगा.

गौर करने पर जो पता चला वो हैरान करने वाला था. कुंभ मेला अपने आरंभ या शाही स्नान के चलते नहीं, बल्कि कंडोम को लेकर ट्रेंडिंग टॉपिक बना था.

पहले कंडोम, अब वाइन टूरिज्म

खबर आई कि मेले का आयोजन करने वाली अथॉरिटी लगभग साढ़े पांच लाख कंडोम नासिक भेज रही है. कुंभ में देश के तमाम हिस्सों से श्रद्धालु तो पहुंचते ही हैं, दुनिया भर से आने वाले सैलानियों के लिए भी ये मेगा इवेंट होता है. एड्स और दूसरी ऐसी संक्रमित बीमारियों से बचाव के मकसद से कुंभ अथॉरिटी ने 'एक्स्ट्रा कंडोम' की सप्लाई करने का फैसला किया था.

ताजा खबर है कि कुंभ के चलते इलाके में वाइन की बिक्री बढ़ गई है. मॉनसून सीजन में आम तौर पर वाइन की बिक्री काफी कम होती है, लेकिन कुंभ के चलते खपत इतनी हो रही है कि लोग उसे बढ़े हुए दाम पर भी खूब खरीद रहे हैं.

वाइन बिजनेस से जुड़े लोगों का मानना है कि कुंभ में हर कोई सिर्फ डूबकी लगाने थोड़े ही आता है, ऐसे लोगों की भी तादाद खासी होती है जो महज पर्यटन की दृष्टि से प्रकट होते हैं.

ये नए जमाने का शहर है

मद्रास हाई कोर्ट ने शराब को भी फायर, पुलिस और दूध की सप्लाई जैसी सेवाओँ के बराबर माना है. कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के अंतिम संस्कार के दौरान तमिलनाडु सरकार द्वारा चलाई जा रही शराब की दुकानों को बंद करने की मांग खारिज कर दी. कोर्ट की नजर में राज्य की करीब 30 फीसदी आबादी के लिए शराब एक जरूरत है. अपने फैसले में जज ने कहा कि फाइव स्टार होटलों में सुबह के 5 बजे से रात 11 बजे तक शराब परोसी जाती है - और जब इन होटलों में लोग शराब पी सकते हैं, तो फिर आम लोग सरकारी दुकान से खरीदकर शराब क्यों नहीं पी सकते.

जमाना बदल रहा है. तरक्की का शायद ये नया नजरिया है. अदालतें भी पुराने कंसेप्ट को नए दौर में अप्रासंगिक मानने लगी हैं.

क्या किसी ने कभी सोचा होगा कि कुंभ भी कंडोम की खपत या वाइन की बिक्री के लिए चर्चा में रहेगा? लेकिन होता तो वही है जो इंसान सोच भी नहीं पाता.

12 साल में एक बार होने वाले इस कुंभ में एक करोड़ लोगों के पहुंचने की उम्मीद है. इनमें से ज्यादातर तो गोदावरी में डूबकी लगाएंगे, कुछ ऐसे होंगे जो वाइन से भरे पैमानों में ही गोते लगाकर खुश हो लेंगे - और कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें असीम आनंद की अनुभूति के लिए कंडोम की दरकार होगी.

वैसे भी हर किसी को अपनी अपनी श्रद्धा और आस्था के अभ्यास की छूट है. ये तो अपनी अपनी फितरत है, जो जैसे चाहे पूरा लुत्फ उठाए.

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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