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Updated: 13 जून, 2018 06:04 PM
गिरिजेश वशिष्ठ
गिरिजेश वशिष्ठ
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भय्यू जी महाराज, कोई उन्हें राष्ट्र संत कहता था तो कोई महान आत्मा, मोदी और अन्ना हज़ारे उनके हाथ से जूस पीकर अनशन तोड़ चुके थे. उन्होंने आत्महत्या कर ली. खबर ये नहीं है कि उन्होंने आत्महत्या की. खबर ये है कि उन्हें इतना मान सम्मान मिलने की वजह क्या रही होगी. क्या वजह रही होगी कि मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री उन्हें मंत्री का दर्जा देने को आतुर हो.

bhaiyyuji maharajभय्यूजी महाराज ने तनाव की वजह से आत्महत्या कर ली

ये तो सबको पता था कि उन्होंने दो दो शादियां की थी. ये भी सब जानते थे कि सवा साल में पहली पत्नी के निधन के बाद भय्यू जी ने दूसरी शादी कर ली वो भी प्रेम विवाह, ये भी सब जानते थे कि एक तीसरी एक्ट्रेस ने खुद अपना नाम उनसे जोड़ा. सवाल ये है कि कौन सा संतत्व उदयसिंह देशमुख उर्फ भय्यू जी महाराज का पूरा सत्ता तंत्र देख रहा था ? कोई तो पैमाना होगा ना.

हिंदू धर्म में कोई भी चलता फिरता दाती महाराज बन जाता है, आसाराम बन जाता है, उसे सिर माथे पर बिठा लिया जाता है. ऐसे अनगिनत पापियों की यहां पूजा होती रहती है. बात इतनी नहीं है कि ऐसे लोग धर्म में ऊंची जगह कैसे पा जाते हैं. बात इतनी है कि कथित रूप से इतने महान धर्म में इतने नीच लोग ही कैसे बड़ी-बड़ी उपाधियां प्राप्त कर लेते हैं. आप राधे मां को महामंडलेश्वर की उपाधि दे देते हैं. दिल्ली के गांधी नगर का एक गुंडा गोल्डन बाबा कहलाने लगता है. उसे भी महामंडलेश्वर की उपाधि मिल जाती है.

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अपराधी अपराध करके साधु बन जाते हैं. हम तो सनातन धर्म इसीलिए कहे जाते हैं क्योंकि हम खुद को ढालते रहते हैं, बदलते रहते हैं. यहां नास्तिक के लिए भी स्थान है, हिंसक के लिए भी और अहिंसक के लिए भी. यहां शैव भी हैं तो शाक्त भी, वैष्णव भी, फिर हम खुद को बदलने को तैयार क्यों नहीं हैं. जैसे ही कोई पकड़ा जाता है पल्ला झाड़ने में तो हम पीछे नहीं रहते. लेकिन इतना तो काफी नहीं है ना. आप कह देते हैं कि वो पाखंडी था साधु नहीं था और फिर अपने काम में लग जाते हैं. और दस बीस ऐसे लोगों को फिर भर्ती कर लेते हैं.

अगर आप जैन हैं तो दीक्षा के बगैर आप मुनि नहीं बन सकते. बौद्ध हैं तो भी दीक्षा और लंबे समय के इंतजार के बाद आप सम्माननीय होते हैं. मुसलमान हैं तो मौलवी बनने के लिए पढ़ना पड़ेगा, अगर आप ईसाई हैं तो प्रक्रिया और भी कठिन है. बाकायदा आपकी पादरी के तौर पर नियुक्ति होती है. संत बनना तो असंभव से थोड़ा पहले का काम है. सिख ग्रंथी बनने के लिए सेवा और समर्पण की बाधाओं से गुजरना पड़ता है, लेकिन हिंदू धर्म में आप दीक्षा न भी लें तो चलता है. यहां आप पूरी उम्र साधु रह सकते हैं यहां परीक्षा आपको बनने से पहले नहीं देनी होती बल्कि बनने के बाद कोई आपकी शिकायत कर दे तो अखाड़ा परिषद जागती है. शिकायत पर भी नहीं, बड़ा बवाल होने पर. पचासों लोग अखाड़ों की उपाधियां लेकर मजे कर रहे हैं. खास तौर पर कुछ वैष्णव अखाड़ों में दान दक्षिणा के आधार पर आसानी से महामण्डलेश्वर बना जा सकता है. ये बात अलग है कि शैव अखाड़े अभी भी नियमों के सख्त हैं लेकिन प्रश्न वहीं का वहीं. करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं से खेलने की खुली छूट क्यों ?

सत्ता संस्थान को इन लोगों पर सख्ती करनी चाहिए लेकिन वो इन बाबाओं के पीछे-पीछे घूमता रहता है. अखाड़ा परिषद जैसी संस्थाएं भी जब खबरों में आकर किसी की पोल खुल जाती है तो एक्शन ले लेती हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि मदर टेरेसा को संत साबित करने में कई दशक लग जाते हैं लेकिन यहां चुटकी में जो चाहे संत बना जाता है. क्या धर्म ऐसा ही होता है ?

हो सकता है कि आप कहें कि नहीं लेकिन अगर हम पिछले सौ से भी ज्यादा साल से धर्म के इसी स्वरूप को देख रहे हैं तो कैसे मान लें कि ये धर्म नहीं है ? धर्म वास्तविक और साक्षात स्वरूप तो यही है. बलात्कारियों और दुराचारियों के हाथ में खेलता एक संस्थान. आप कहेंगे ये गलत लोग हैं लेकिन ये गलत लोग ही तो हमारे धर्म की सच्चाई हैं. ये कड़वा सच ही हमारा सच है. तर्क और विवेक से दूर अंधी आस्था के अनाचारी रथ पर सवार असभ्य आचरण करने वाले लोगों के हाथों हांका जा रहा एक प्रकल्प ही धर्म का वास्तविक या कहें प्रेक्टिकल रूप है. बाकी सब थ्योरी है.

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लेखक

गिरिजेश वशिष्ठ गिरिजेश वशिष्ठ @girijeshv

लेखक दिल्ली आजतक से जुडे पत्रकार हैं

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