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Updated: 25 नवम्बर, 2015 01:04 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
  @parulchandraa
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देश के बयानबाज नेताओं और फिल्मी सितारों को असहिष्णुता सिर्फ धर्म-संप्रदाय में ही क्यों नजर आती है. बयानबाजियां उस वक्त क्यों नहीं होतीं जब निर्भया जैसे मामले देश में होते हैं. सोशल मीडिया पर अपना विरोध जताने वाले लोग और हाथ में मोमबत्तियां लेकर मार्च करने वाले लोग सिर्फ कुछ ही क्यों होते हैं. धर्म के नाम पर देश में हलचल मच जाती है, लेकिन महिलाओं की चीखें किसी बुद्धिजीवी के ह्दय को छलनी नहीं करतीं. महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर न कोई अभियान चलता है, और न सरकार खीझकर इस पर किसी तरह का बैन लगाती या कानून ही बनाती है.

लोगों में असंतोष तो है पर क्यों उस जगह नहीं दिखता जहां दिखना चाहिए. लोगों में गुस्सा है, कि तेजस्वी यादव 9वीं फेल हैं फिर भी डिप्टी सीएम बना दिए गये. लोगों में गुस्सा है कि निर्भया केस के जुवेनाइल आरोपी को सजा नहीं हुई, लोगों में ये भी असंतोष है कि उस आरोपी का चेहरा दुनिया को दिखाया जाये, जो दिसंबर में जेल की सलाखों से छूटकर खुली फिज़ाओं में कुछ भी करने के लिए आजाद होगा. पर कहां है ये असंतोष? ये दिखता क्यों नहीं? रेप और यौन शोषण पर क्यों भारत असहिष्णु नहीं होता? क्यों कड़े कानून बनाये जाने की बात पर बुद्धिजीवी चुप्पी साध लेते हैं?

क्यों महत्वपूर्ण हैं ये मामले- देश के लोगों को डरने की जरूरत है क्योंकि हम उस देश में रहते हैं जहां-

* 2010 में पूरे देश में महिलाओं पर अत्याचार के 2,13,585 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें अपहरण, बलात्कार, प्रताड़ना, दहेज के कारण हत्या और घरेलू हिंसा शामिल हैं. 2012 के निर्भया कांड के बाद जागरुकता अभियान चलाए गए, आंदोलन हुए पर इन मामलों में कोई कमी नहीं आई, बल्कि 2014 में इनकी संख्या 3,37,922 हो गई. यानि हर रोज करीब 925 महिलाओं पर किसी न किसी रूप से अपराध किया जाता है.

* 2010 में देश भर में 22,172 महिलाओं का बलात्कार हुआ, 2012 में 24,923 और 2014 में कुल 36,735 बलात्कार किए गए और 4,234 बलात्कार के प्रयत्न किए गए. यानि हमारे देश में हर रोज करीब 100 महिलाओं का बलात्कार होता है.

* अपहरण के मामले 2010 में 29,795 थे, जो 2014 में बढ़कर 57,311 हो गए. यानि हर रोज करीब 157 महिलाओं का अपहरण किया जाता है.

* दहेज हत्याएं 2010 में 8,391 थीं 2013 में कम होकर 8,083 हुईं , लेकिन 2014 में फिर से से बढ़कर 8455 हो गईं. यानि देश में करीब 23 महिलाएं हर रोज दहेज के नाम पर जला दी जाती हैं.

* घरेलू हिंसा के मामले भी कम नहीं. 2010 में देश भर में करीब 94,041 मामले सामने आए थे, जो 2012 में 1,06,527 हुए और 2014 में 1,22,877 हो गए. यानी हर रोज करीब 336 महिलाओं को घर में पति या परिवारवालों द्वारा प्रताड़ित किया जाता है.

ये आंकड़े उन मामलों के आधार पर हैं जो दर्ज किए गए. इनमें वो मामले शामिल नहीं जिन्हें दर्ज नहीं कराया जाता. अगर वो भी इसमें जोड़ दिए जाएं तो वो भी भयावह होंगे. पर इन आंकड़ों को देखकर भी आवाज उठाने की ज़रूरत है. लेकिन देश की पुलिस और कानून व्यवस्था से निराश हो चुकी ये आधी आबादी क्या अब हैशटैग्स पर भड़ास निकालने वाले लोगों से उम्मीदें लगाये? क्योंकि बलात्कार पर देश का कानून इतना लचर है कि एक जुवेनाइल बलात्कार तो कर सकता है लेकिन बलात्कार करने का दण्ड नहीं भोग सकता. उसका चेहरा भी छुपा लिया जाता है, जिससे दुनिया के लोग उस बलात्कारी के साथ भी रहें और उसे पहचान भी न पाएं. क्योंकि उसने बलात्कार तब किया था जब उसकी उम्र 18 साल से कम थी.

देश को चलाने वाले लोग अगर ये असहिष्णुता किसी सकारात्मक दिशा में दिखाएं तो महिलाएं पर होने वाले इन मामलों में गिरावट आएगी. वो निडर होकर चल पाएंगी. नहीं तो 25 नवंबर को सिर्फ International Day For The Elimination Of Violence Against Women बनकर ही रह जाएगा, लेख लिखे जाएंगे, आंकड़े परोसे जाएंगे, और अगले दिन सब भूल जाएंगे.

 

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लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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