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Updated: 14 जून, 2018 01:06 PM
भवदीप कांग
भवदीप कांग
  @bhavdeep.kang
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1999 में भय्यूजी महाराज का आश्रम स्थापित किया गया था. उसके पहले उनका करियर बहुत ही उतार चढ़ाव वाला रहा. आधिकारिक तौर पर तो उनका जन्म 29 अप्रैल 1968 को हुआ था. लेकिन ये निश्चित नहीं है कि तारीख सही है या नहीं. उन्होंने कहा, "आप जानते ही हैं कि गांवों में यह कैसा था." उनके पिता विश्वास राव देशमुख और उनकी मां कुमुदनी देवी इंदौर के पास शुजलपुर गांव में रहते थे. और उदय ने गांव के स्कूल में पढ़ाई की थी. मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में पले बढ़ उदय ने कई भाषाएं सीख लीं: हिंदी, मराठी, मालवी और अंग्रेजी.

"बीएससी करने के बाद, मैंने कुछ छोटी मोटी नौकरियां की. मैंने महिंद्रा सीमेंट प्लांट में प्रोजेक्ट इंजीनियर के रूप में काम किया. थोड़ा ज्यादा कमाने के लिए पार्ट टाइम में मैंने सियाराम सूटिंग्स सहित कुछ और ब्रांड्स के लिए मॉडलिंग की!" उनके मेट्रोसेक्शुअल लुक के पीछे का कारण शायद यही था...लेकिन इनमें से कोई भी संतोषजनक नहीं था. उदय सिंह देशमुख, जानते थे कि वह कुछ और ही करने के लिए पैदा हुए हैं. अब फिर वो कुछ बहुत बड़ा है या बेहतर, ये नहीं पता था...ये तो साफ था कि बचपन से ही उन्हें आध्यात्मिकता के प्रति कोई झुकाव नहीं था. यहां तक वो कई राहों, करियर और उतार-चढ़ाव के बाद पहुंचे थे.

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संभावनाएं कई थीं. वो एक अनुभवी क्रिकेटर थे, पहलवान और एक अच्छा अभिनेता थे. घोड़े की सवारी और तलवारबाजी के कारण गठा हुआ शरीर, चॉकलेटी लुक और बोलने की शानदार क्षमता उन्हें बॉलीवुड से जोड़ती है. दूसरी तरफ, उनकी मां को ये यकीन था कि उनका बेटा सिविल सेवा परीक्षा पास करके मां का सपना जरुर पूरा करेगा.

आध्यात्मिक गुरुओं की जीवनी अक्सर बचपन में ही उनके "आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध" होने के रूप में दिखाते हैं. भय्यूजी कोई अपवाद नहीं हैं. उनकी मां उन्हें एक दयालु, मधुर प्रकृति का और उदार युवा बताती हैं. स्कूल में उनका रिकॉर्ड शानदार रहता था और उनकी याददाश्त भी बहुत तेज थी. उनके पिताजी जो किताबें लाते वो उन्हें जल्दी से पढ़कर खत्म कर देते और फिर दूसरे बच्चों को उसे पढ़ाते. वो बचपन में बहुत शरारती थे. लेकिन उन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं किया और बहुत जल्दी ही खुद के लिए खड़े होना सीखा लिया. "एक बार वो मेरे पास रोते-रोत आया क्योंकि किसी ने उसे मारा था. मैंने उसे कहा कि उसे जितने थप्पड़ मारे हैं उसका दोगुना वो जाकर उस लड़के को मारे." हालांकि ये कहीं से भी गांधीवादी दृष्टिकोण नहीं है लेकिन फिर भी एक मां के लिए ये फैसला सही है क्योंकि वो अपने बच्चे को मजबूत बनाना चाहती है.

ग्यारहवीं क्लास में आते-आते उदय को एक संत सपने में आने लगे जो उनके बिस्तर के पास में खड़े होते और मुस्कुरा रहे होते. आशिर्वाद दे रहे होते. तब उदय की मां को एक डरावने साधु की याद आई जो उज्जैन के कुंभ मेले में उन्हें दिखे थे. तब उदय उनकी पेट में थे. साधु ने भविष्यवाणी की थी कि वह एक असाधारण बेटे को जन्म देगी. बेटे की सुरक्षा के लिए साधु ने उन्हें कुछ शुभ दिनों पर कबूतरों के लिए सात प्रकार के अनाज फैलाने का निर्देश दिया. उदय की मां ने इसका पूरा पालन किया था.

बचपन में उदय को भूतों की तलाश में पास के जंगल में भाग जाने की बहुत बुरी आदत थी. उनकी मां के अनुसार उन्होंने कुछ भूतों को देखा भी था. रहस्यमय तरीके से एक बूढ़ी औरत प्रकट हो गई थी जिसने उन्हें बाढ़ से बचाया था. एक और जिसने उनके मृत बेटे को मुक्ति दिलाने के नाम पर उनका बनाया सारा खाना खा लिया था.

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इस तरह के घटनाओं से उदय का जुड़ा होना उनकी मां को परेशान करता था. एक तरफ तो ये साफ था कि बहुत विशेष हैं, दूसरी तरफ इस तरीके की असाधारण घटनाओं ने इशारा कर दिया था कि सिविल सेवा में उनका करियर नहीं है. हालांकि उन्होंने अपनी मां का सपना कभी पूरा नहीं किया लेकिन कुमुदनी देवी को इसका कोई पछतावा नहीं है. उनके एक शिक्षक ने बताया कि, 'मैं पहले आपके लड़के को डांटा करता था. लेकिन अब मैं उसके पैर छूता हूं.' अगर मां किसी चीज के बारे में चिंतित थीं तो सिर्फ ये कि उदय बहुत दयालु हैं. "वह कभी भी चिंतित नहीं होता, यहां तक कि जब लोग उसका लाभ उठाते हैं. उसे धोखा देते हैं तो वह कहता है कि वह एक ट्रेन की तरह है, यात्री चढ़ते उतरते रहते हैं."

इस बीच, उदय ने कभी भी खुद को एक सरकारी ऑफिस में काम करते हुए नहीं देखा. बल्कि फिल्म के सेट पर मखमली सूट पहनकर शूटिंग करना उन्हें ज्यादा भाया. इस बात का कभी खुलासा नहीं हुआ लेकिन वो अच्छे से जानते थे कि उन्हें कुछ बदलना था. वो अक्सर खुद को ऐसे प्रश्नों से घिरा हुआ पाते थे जिसका उनके करियर से कोई लेना देना नहीं था. लोगों को किस चीज ने प्रभावित किया?

धन, प्रसिद्धि, शक्ति और सफलता के परंपरागत तरीके किस हद तक नजरिए बदल सकते हैं? अगर वो विफल हो जाते हैं तो क्या होगा? क्या उनके परिवार और दोस्त उन्हें छोड़ देंगे?

उन्होंने कहा, "इसलिए मैंने अपनी खेती छोड़कर 1995 में इंदौर आ गया. जैसा कि हर कोई करता है मैंने भी बहुत संघर्ष किया. मैं ये देखना चाहता था कि एक विनम्र आदमी के कितने रिश्तेदार होते हैं. मेरा जीवन एक प्रयोग रहा है. मैंने असफल इंसान और फिर एक सफल व्यक्ति के रूप में भी सभी प्रकार के लोगों से बातचीत की है."

इसके बाद, उन्होंने शुजलपुर गांव में अपने पैतृक भूमि का एक हिस्सा बेचा. और 2,400 वर्ग फुट की जमीन खरीदने के लिए इस पैसे का इस्तेमाल किया. इस तरह आश्रम बना, जिसके दरवाजे और रसोई हमेशा खुले रहते थे.

(वेस्टलैंड बुक का एक हिस्सा)

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लेखक

भवदीप कांग भवदीप कांग @bhavdeep.kang

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं और राजनीति, कृषि और खाद्य नीति पर लिखती हैं.

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