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Updated: 04 जुलाई, 2017 09:35 PM
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पॉर्न ज्यादा देखने पर रेप ज्यादा होता है! पॉर्न कल्चर ने ही भारत के युवा को बिगाड़ दिया है! ऐसे कई बयान गाहे-बगाहे आपने सुन ही लिए होंगे. दुनिया भर के पॉर्न एक्टिविस्ट का ये कहना भी आपने सुना होगा कि पॉर्न के कारण सेक्शुअल हिंसा के केस ज्यादा होते हैं, लेकिन क्या ये वाकई सच है?

रिसर्च ने साबित किया अलग तथ्य...

माइकल कासलमैन जो एक अवॉर्ड विनिंग अमेरिकी जर्नलिस्ट हैं और करीब 13 नॉन फिक्शन किताबें लिख चुके हैं अपने एक आर्टिकल में इस मिथक को झुठलाते हुए नजर आते हैं.

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एक तथ्य को सामने रखते हुए माइकल ने दावा किया है कि ऐसा नहीं है कि पॉर्न के कारण सेक्शुअल हिंसा बढ़ी है. 1990 तक इंटरनेट और पॉर्न की एक्सेस काफी कम थी. वो केवल किताबों, मैगजीन और वीडियो टेप में ही मिलता था. धीरे-धीरे इंटरनेट के आने के बाद ये ज्यादा लोकप्रिय हुआ. अगर एंटी पॉर्न एक्टिविस्ट सही हैं तो 1999 के बाद से रेप और सेक्शुअल असॉल्ट के केस बढ़ जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

जस्टिस डिपार्टमेंट के अथॉरोटेटिव नेशनल क्राइम विक्टिमाइजेशन सर्वे के मुताबिक अमेरिका में 1995 के बाद से सेक्शुअल असॉल्ट के केस कम हो गए और ऐसे क्राइम की संख्या 44% कम हो गई.

दूसरा उदाहरण चेक रिपब्लिक (Czech) का है. चेक रिपब्लिक में पॉर्न लीगल है. अमेरिकन और चेक रिसर्चरों ने जब 17 साल पहले का डेटा निकाला जब पॉर्न लीगल नहीं था और उसे पॉर्न लीगल होने के 18 साल बाद के डेटा से कम्पेयर किया तो नतीजे चौंकाने वाले थे. इस दौरान रेप 800 प्रति साल से 500 प्रति साल तक कम हो गए थे. इतना ही नहीं पॉर्न लीगल करने के बाद से सेक्स क्राइम, चाइल्ड सेक्स अब्यूज जैसे जुर्म भी 2000 प्रति साल से 1000 प्रति साल हो गए थे.

ऐसे ही उदाहरण डेनमार्क, जापान, चीन और हॉन्ग-कॉन्ग में भी देखने को मिले जहां पॉर्न मटेरियल की आसानी से उपलब्धता के कारण सेक्शुअल जुर्म कम हो गए.

अब आप ही बताइए क्या ये आंकड़े कम हैं?

खैर, ये तो हुई पुरानी रिसर्च अब एक नए आर्टिकल की तरफ अपना रुख करते हैं. इन्हीं माइकल साहब ने एक और आर्टिकल लिखा है जो दो दिन पहले पब्लिश किया गया है.

पर पूरी तरह गलत भी नहीं...

माइकल के नए आर्टिकल में उन्होंने एक दूसरी रिसर्च का दावा किया है जिसमें ठीक इसका उल्टा नतीजा सामने आया है. पहली रिसर्च की तरह ही ये रिसर्च भी ऐसी है जिसमें कई सारे देशों के अलग-अलग खोजकर्ताओं ने अपनी बात रखी है. सबसे पहले एक कनाडा की रिसर्स की गई है. यहां 118 रेपिस्ट से बात की गई जिसमें तीन बातें सामने आईं.

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पहली ये कि उनके साथ बचपन में खुद सेक्शुअल असॉल्ट हुआ था, दूसरा ये कि उनके मन में हमेशा से ऐसी भावनाएं थीं और तीसरा ये कि पॉर्न देखकर उन्हें ऐसी इच्छा हुई.

दूसरी रिसर्च फिलाडेल्फिया के सोसियोलॉजिस्ट ने की है. यहां 100 डॉमेस्टिक वॉयलेंस सर्वाइवर्स से बात की गई. उनका कहना है कि उनके साथ उनके साथ सेक्शुअल असॉल्ट करने वाले उनके ब्वॉयफ्रेंड या पति पॉर्न एडिक्ट रहे हैं.

तीसरी स्टडी सिंगापुर की है यहां 62 रेपिस्ट से बात की गई जिनका कहना था कि जुर्म करने से पहले 6 महीने के अंदर कई बार पॉर्न देखा था.

तो किसे सही माना जाए?

जिस काउंटर स्टडी की माइकल ने बात की है वो उनके किसी एक क्रिटिक ने भेजी है. लेकिन इसको क्या सही माना जाए? अब अगर देखें तो जो भी स्टडी भेजी गई है वो रेपिस्ट या किसी अन्य मुजरिम के ऊपर की गई है. सिंगापुर में की गई स्टडी का समय काफी लंबा है. 6 महीने के अंदर अगर किसी ने पॉर्न देखा भी है तो भी इतनी लंबी अवधि में कई ऐसे कारण हो सकते हैं जो उन्हें पॉर्न के अलावा भी जुर्म करने को प्रेरित करें, इसके अलावा, जो भी स्टडी हुई है वो सिर्फ एक छोटी सी अवधि में लिया गया है जब्कि पहली स्टडी में पूरी जनसंख्या को लिया गया है और अवधि भी सालों की है.

तो किसे सही माना जाए? अगर भारत के हिसाब से देखा जाए तो यकीनन यहां लोग यही कहेंगे कि पॉर्न देखने के कारण जुर्म करने की इच्छा ज्यादा हो जाती है. इसे साबित करने के लिए कई तरह के तर्क दिए जाएंगे जिसमें फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे जैसी फिल्म देखने के बाद इस तरह के जुर्म की संख्या बढ़ गई थी. पर क्या ये वाकई सही है? मैं तो माइकल की पहली स्टडी से कुछ हद तक सहमत हूं. आप क्या मानते हैं? पॉर्न के कारण जुर्म होते हैं या नहीं?

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