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Updated: 03 अक्टूबर, 2015 04:03 PM
श्रीमई पियू कुंडू
श्रीमई पियू कुंडू
  @sreemoyee.kundu
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एक दोस्त ने हमदर्द साफी(खून साफ करने का टॉनिक) के एक विज्ञापन पर उंगली उठाई कि वो सेक्सिस्ट था और इससे मांओं और बेटियों के पवित्र रिश्ते में परेशानियां आ सकती हैं.

इस विज्ञापन में एक लाइन है- 'मुझे सिर्फ निराशा, अलगाव और कड़वाहट मिली क्योंकि मुझे मां जैसा रूप नहीं मिला'. मेरी दोस्त ने कहा कि इसमें मां और बेटी के रिश्ते का मज़ाक उडाया गया है, साथ ही साथ इसमें एक महिला के अच्छे दिखने की ज़रूरत का प्रमाण भी दिया गया है.

मुझे तुरंत अपनी मां का ख्याल आया. कैसे मैं हमेशा मोटी और नाटी होने के लिए उनको दोष दिया करती थी, और ये भी कि 37 की उम्र में ही मैं डायबिटीज के मुहाने पर खड़ी हूं.

मुझे ये भी लगता है कि हम भारतीय बहुत बकवास करते हैं.

वैसे, कितनी माएं और दादियां बच्चों के शरीर पर उबटन, हल्दी और चंदन की लकड़ी का पेस्ट लगाती हैं जिससे उनके हाथ पैर खूबसूरत हो जाएं? और कितनी बार एक महिला को एक बांझ होने या सिरे से लड़कियां पैदा करने के लिए सास-ससुर और महिला रिश्तेदारों द्वारा दोषी ठहराया और दंडित किया जाएगा? कितनी सासें और ननदें उन्हें गुरुओं के पास ले लेकर जाएंगी?

और अगर आपको लगता है कि साफी का विज्ञापन सेक्सिस्ट है- तो तब आवाज क्यों नहीं उठाई गई जब माएं सैनिटरी नेपकिन छिपाया करती थीं और विज्ञापन इस तरह आते थे 'महीने के उन दिनों के लिए' जैसे कि महिलाओं के पीरियड्स कोई बीमारी हों.

एक महिला जिनके साथ मैंने कभी काम किया था उन्होंने मुझे बताया था कि महावारी के दिनों में उनकी मां उन्हें रसोई में कदम नहीं रखने देती थीं. उन्हें पुरुषों से अलग कर दिया जाता था, यहां तक कि उन्हें खाना भी एक अलग प्लेट में दिया जाता था.

क्यों भारतीय माएं शायद ही कभी अपने पतियों को चूमती हैं? और अपनी किशोर बेटियों को गर्भ निरोधक या आई-पिल के साइड इफेक्ट्स के बारे में समझाती हैं? क्यों माएं ही अपनी बेटियों को घर में मुस्लिम लड़का न लाने की हिदायत देती हैं? उन्हें क्यों निराशा होती है जब उनकी बेटी फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई करना चाहती है? क्यों हमेशा बेटी को ही अपनी योग्यताएं साबित करनी होती हैं?

हम मां और बेटियों के बीच प्यारी सी नोक-झोंक ही क्यों दिखाते हैं, क्यों उनके बीच जगह लेती ईर्श्या को नहीं दिखाते? इस समाज में हमें एक विद्रोही बेटी के नजरिए का पता लगाने की ज़रूरत है जो अपनी मां के डर से मुक्त होना चाहती है. लड़की पैदा करने के लिए मां का अपराध बोध, एक अधूरी खुशी जिसे हमेशा पुरुष के सत्यापन की ज़रूरत है उसका पता लगाने की ज़रूरत है.

भारतीय माएं अपनी बेटियों से कहती हैं कि वो ससुराल को सहें, वहां हो रही चीजों को भोगें क्योंकि शादी के बाद, वही बेटी का घर है, और वही उनका भाग्य है.

ज़्यादातर भारतीय शादियों में, विदाई के वक्त, एक बेटी पीछे अपनी मां की तरफ कुछ चावल फेंकती है.

ये उसके जीवन का ऋण है.

शायद ये मां-बेटी के समीकरणों को और भी आलोचनात्मक तरीके से देखने का समय है, बराबरी के साथ.

 

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लेखक

श्रीमई पियू कुंडू श्रीमई पियू कुंडू @sreemoyee.kundu

लेखिका पूर्व लाइफ स्टाइल एडिटर और उपन्यासकार हैं.

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