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Updated: 20 मार्च, 2021 02:01 PM
मुकेश कुमार गजेंद्र
मुकेश कुमार गजेंद्र
  @mukesh.k.gajendra
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साल 2004 में एक फिल्म आई थी 'अब तक छप्पन' (Ab Tak Chhappan). शिमित अमीन के निर्देशन में बनी निर्माता राम गोपाल वर्मा की इस फिल्म में मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा की कहानी दिखाई गई थी. साल 1999 में मुंबई पुलिस ने क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट (CIU) का गठन किया था, ताकि उस वक्त मुंबई के गैंगस्टरों और वसूली करने वालों का बेधड़क सफाया करके अंडरवर्ल्ड राज खत्म किया जा सके. प्रदीप शर्मा इसके हेड बनाए गए थे, जिन्होंने कुल 113 एनकाउंटर किए हैं. CIU में प्रदीप शर्मा के अंडर असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वझे भी काम किया करते थे, जो इस वक्त एंटीलिया केस की वजह से सुर्खियों में हैं.

रिलायंस के मुखिया मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के बाहर से बरामद विस्फोटकों से भरी स्कॉर्पियो मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट के हेड रहे सचिन वझे को गिरफ्तार किया है. महाराष्ट्र में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर मशहूर सचिन वझे का नाम पहले भी कई बार विवादों में आ चुका है. यूं कहें कि उनका पूरा करियर ही विवादों से भरा रहा है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. अपने 30 के करियर में वह 16 साल तक सस्पेंड रहे हैं. इसमें से 12 साल तक पुलिस विभाग से बाहर रहे हैं. लेकिन उन्होंने काम हमेशा बड़े-बड़े किए हैं. बड़े काम की वजह से विवाद तो हुआ, लेकिन उनके संपर्क भी बड़े लोगों के साथ बन गए.

1-650_031821041113.jpgक्राइम इंटेलिजेंस यूनिट के हेड रहे सचिन वझे को NIA ने गिरफ्तार कर लिया है.

शिवसेना की सरकार में रद्द हुआ वझे का सस्पेंशन

महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार आने के बाद ही जून 2020 में उनका संस्पेंशन रद्द करके पुलिस विभाग में वापस ले लिया गया. एक बार फिर उनको क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विभाग की जिम्मेदारी दे दी गई. इसके बाद उन्हें कई बड़े केस सौंपे गए, फिर चाहे वह अर्णब गोस्वामी का TRP घोटाला हो या फिर बॉलीवुड का कास्टिंग काउच रैकेट. अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार करने गई पुलिस टीम का नेतृत्व भी वझे ने ही किया था. शिवसेना सरकार और सीएम उद्धव ठाकरे के खिलाफ मोर्चा खोलकर जुबानी हमला करने वाले अर्णब के साथ गिरफ्तारी के दिन पुलिस ने कैसा बर्ताव किया था, ये हर किसी ने देखा था. शिवसेना से वझे की नजदीकी सर्वविविदित है.

बाल ठाकरे ने की सचिन वझे के काम की तारीफ

1990 में महाराष्ट्र पुलिस में आए सचिन वझे की काम की तारीफ खुद शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे कर चुके हैं. साल 2004 को ख्वाजा यूनुस नामक एक इंजीनियर की पुलिस कस्टडी में हुई मौत के मामले में उनको सस्पेंड कर दिया गया था. तमाम कोशिशों के बाद भी जब उनका सस्पेंशन रद्द नहीं हुआ, तो मजबूर होकर उन्होंने 30 नवंबर 2007 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद वह साल 2008 में शिवसेना से जुड़ गए. ऐसा कहा जाता है कि पार्टी के लिए काम करते हुए वह कई बड़े नेताओं के विश्वासपात्र बन गए. यही वजह है कि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वझे को लेकर सूबे की सरकार और सीएम उद्धव ठाकरे पर जमकर निशाना साधा है.

'असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर को बनाया CIU का हेड'

शिवसेना और सचिन वझे के बीच कनेक्शन का खुलासा करते हुए फडणवीस ने कहा कि जब वो मुख्यमंत्री थे, शिवसेना ने उनपर दबाव बनाया था कि वझे को सर्विस में वापस ले लिया जाए, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. फडणवीस ने सवाल किया कि खराब रिकॉर्ड होने के बाद भी शिवसेना सरकार ने उन्हें बहाल क्यों किया? छोटी पोस्ट पर होने के बाद भी उन्हें क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट का हेड बनाया गया. CIU को 2 पुलिस इंस्पेक्टर लीड करते रहे हैं. लेकिन असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर होने के बावजूद सचिन वझे को इसका प्रमुख बना दिया गया. इसके बाद सारे अहम केस CIU के पास आने लगे. बादशाह केस, रितिक रोशन केस, TRP केस और कास्टिंग काउच केस CIU को दिए गए.

नक्सली इलाके में हुई थी वझे की पहली पोस्टिंग

सचिन वझे का जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर में साल 1972 में हुआ था. वह कोई बहुत बड़े पद पर नहीं रहे हैं. रैंकिंग देखी जाए तो राज्य की सिविल सेवाओं को क्लियर करने के बाद पहली पोस्टिंग सब इंस्पेक्टर के पद पर गढ़चिरौली में हुई थी. यह नक्सली इलाका है. यहां दो साल तक काम करने के बाद ही उनकी पोस्टिंग मुंबई से सटे ठाणे में हो गई. यहां आने के बाद तो वझे ने अपने काम के जरिए हंगामा मचा दिया. कई बड़े केस सॉल्व करके बहुत कम समय में मशहूर हो गए. मुस्लिम बाहुल्य मुंब्रा पुलिस स्टेशन में तैनाती के दौरान हिंदू-मुस्लिम सद्भाव स्थापित करके सियासी नजर में आ गए. इसके बाद उनको ठाणे क्राइम ब्रांच के विशेष दस्ते की कमान सौंप दी गई.

क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट बनाने के पीछे की मजबूरी

ठाणे क्राइम ब्रांच में जाते ही सचिन वझे ने एनकाउंटर शुरू कर दिए. इसी बीच अपने काम और पहुंच की वजह से उनको क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट में शामिल कर लिया गया. 1990 के दशक में मुंबई में अंडरवर्ल्ड का आतंक था. अंडरवर्ल्ड के लोग छोटे-छोटे गैंग के जरिए उगाही करते थे. बॉलीवुड हस्तियों से लेकर आम लोगों तक को निशाना बनाया जाने लगा. कोई पार्टी करे या मर्सिडीज कार खरीदे, माफिया की तरफ से वसूली का फोन आ जाता था. दिनदहाड़े शूटआउट होना आम बात थी. मुंबई पुलिस चुपचाप तमाशा देखती थी. तत्कालीन भाजपा-शिवसेना सरकार की विश्वसनीयता घट रही थी. इसके बाद तत्कालीन गृह मंत्री ने गैंगस्टरों का सफाया करने के लिए CIU को छूट दे दी.

पुलिस कस्टडी में आरोपी की मौत के बाद सस्पेंड

2 दिसंबर 2002 की बात है. मुंबई के घाटकोपर रेलवे स्टेशन पर एक ब्लास्ट हुआ. इसमें 2 लोगों की मौत हो गई थी. इस मामले में सचिन वझे ने डॉ. मतीन, मुजम्मिल, जहीर और ख्वाजा यूनुस को POTA के तहत गिरफ्तार कर लिया. 27 साल का ख्वाजा यूनुस महाराष्ट्र के परभणी का निवासी था. पेशे से इंजीनियर था और दुबई में काम काम करता था. 6 जनवरी 2003 को ख्वाजा युनूस की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई. ख्वाजा की मां आयशा बेगम के अनुसार, पुलिस पूछताछ में ख्वाजा को बुरी तरह से टॉर्चर किया गया था. इस संबंध में परिजनों की याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 3 मार्च 2004 को सचिन वझे सहित 13 पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया.

12 साल तक शिवसैनिक, अब पुलिस में वापसी

सस्पेंशन के दौरान बहाल होने के लिए सचिन वझे ने बहुत कोशिश, लेकिन सफल नहीं हो पाए. इस वजह से उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़कर राजनीति में जाने का मन बना लिया. साल 2008 में शिवसेना का दामन थाम लिया. पिछले साल जब शिवसेना की अगुवाई वाली सरकार बनी तो उनकी उम्मीदें जग गईं. कोरोना काल में पुलिस बल की कमी का हवाला देकर महाराष्ट्र सरकार के निर्देश पर तत्कालीन मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने ख्वाजा मौत केस में सभी पुलिस वालों का सस्पेंशन वापस ले लिया. इस तरह 12 साल शिवसेना की राजनीति करने के बाद वझे की पुलिस फोर्स में दोबारा वापसी हो हुई. इससे पहले इसी तरह साल 2017 में प्रदीप शर्मा को बहाल किया गया था.

हिरेन की रहस्यमयी मौत केस में वझे का नाम

25 फरवरी को मुंबई के पैडर रोड स्थित मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के बाहर विस्फोटक से भरी एक स्कॉर्पियो गाड़ी खड़ी मिली. 24 फरवरी की आधी रात 1 बजे यह गाड़ी खड़ी की गई थी. दूसरे दिन गुरुवार को इस पर पुलिस की नजरें गईं और कार से 20 जिलेटिन की रॉड बरामद की गईं. इस मामले की जांच CIU के हेड सचिन वझे के नेतृत्व में एक पुलिस टीम को सौंप दिया गया. इसी बीच स्कॉर्पियो गाड़ी के मालिक मनसुख हिरेन का 5 मार्च को शव बरामद हुआ. वझे पर हिरेन की हत्या का आरोप लगा. इसके बाद उनका ट्रांसफर करके महाराष्ट्र ATS के हवाले ये केस कर दिया गया. लेकिन मामला हाईप्रोफाइल होने और केस की जटिलता को देखते हुए इस केस की जांच NIA को सौंप दी गई.

वझे पर कसता जा रहा है NIA का शिकंजा

अपनी जांच में मिले सबूत के आधार पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने सचिन वझे को गिरफ्तार कर लिया. NIA ने वझे को ठाणे ले जाकर कई जगहों पर सीन रिक्रिएशन किया. उनके घर की तलाशी ली गई. कई दस्तावेज बरामद किए गए. इसी बीच एक मर्सिडीज कार जब्त की गई, जिसे सचिन वझे इस्तेमाल किया करते थे. ये कार मुंबई पुलिस मुख्‍यालय भी आती-जाती रहती थी. इस कार में एक चेक शर्ट, 5 लाख रुपये कैश और नोट गिनने वाली मशीन बरामद हुई है. इसमें उस स्कोर्पियो कार की नम्बर प्लेट भी मिली है, जो एंटिलिया के बाहर खड़ी थी. एक बोतल में मिट्टी का तेल भी मिला है. शक है कि इसका उपयोग पीपीई किट जलाने के लिए किया गया होगा.

परमबीर सिंह और सचिन वझे की सांठगांठ

कहा जा रहा है कि असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वझे मुंबई के पूर्व पुलिस कमीश्नर परमबीर सिंह के बहुत प्रिय हैं. हर बड़ा और हाईप्रोफाइल केस सचिन वझे दे दिया जाता था. हां तक कि जब एंटीलिया के पास जिलेटिन से भरी स्कॉर्पियो बरामदगी के बाद वझे के हाथ में इसकी जांच सौंपने वाले भी परमबीर ही थे. 16 साल तक सस्पेंड रहने के बाद 6 जून 2020 को परमबीर के आदेश पर ही वझे को बहाल किया गया था. इसके बाद सीधे उन्हें क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट का हेड बना दिया गया, जबकि वो उसके योग्य भी नहीं थे. CIU प्रमुख होने के बावजूद सचिन वझे की रिपोर्टिंग अपने से सीनियर इंस्पेक्टर या DCP को होनी चाहिए थी, लेकिन वे हर मामले में सीधे पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को रिपोर्ट किया करते थे. इन्हीं आरोपों का आधार बनाकर महाराष्ट्र सरकार ने परमबीर सिंह को पुलिस कमीश्नर पद से हटाकर होमगार्ड विभाग में तैनात कर दिया है.

एक सुपर टैलेंटेड पुलिस अफसर और लेखक

इन तमाम कंट्रोवर्सी के बीच सचिन वझे को एक टैलेंटेड पुलिस अफसर के रूप में जाना जाता है. वह तकनीकी रूप से दक्ष और अपने साइबर कौशल के लिए मशहूर हैं. उनको हमेशा आधुनिक गैजेट्स और गिज़्मो के साथ देखा गया है. उन्होंने कई गंभीर साइबर अपराधों को हल किया है. यह भी माना जाता है कि उन्होंने ही मुंबई पुलिस के लिए सेलफोन इंटरसेप्शन और ईमेल ट्रैकिंग यूनिट की स्थापना की है. अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी के एक केस का खुलासा करके साल 1997 में वह सुर्खियों में आए थे. वझे पुलिस अफसर के साथ ही लेखक भी हैं. मुंबई हमलों पर आधारित उनकी मराठी किताब 'जिंकुन हरलेली लढाई' बेस्टसेलर थी. इसके साथ ही हुसैन जैदी की किताब हेडली एंड आई, माई नेम इज अबू सलेम, बायकुला से बैंकॉक, एड्रियन जैसी कई किताबों के स्रोत और सलाहकार भी रह चुके हैं. उनके जीवन पर आधारित एक मराठी फिल्म Rege भी बन चुकी है.

लेखक

मुकेश कुमार गजेंद्र मुकेश कुमार गजेंद्र @mukesh.k.gajendra

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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