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 |  6-मिनट में पढ़ें  |   05-12-2018
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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रजनीकांत की फिल्म 2.0 जब से रिलीज हुई है तब से बहस का मुद्दा बन गई है. फिल्म में दिखाया गया है कि मोबाइल रेडिएशन की वजह से पक्षी मर रहे हैं, लेकिन उस ओर न तो सरकार ध्यान दे रही है ना ही कंपनियों को उनकी कोई फिक्र है. पक्षीराजन नाम का शख्स, जो पक्षियों से प्यार करता है, उन्हें बचाने के लिए दर-दर भटकता है, लेकिन कोई उसकी बात नहीं सुनता. आखिरकार उसे मौत को गले लगाना ही सही लगता है. यहीं से पैदा होता है फिल्म का विलेन, जिसमें हजारों पक्षियों की आत्मा समा जाती है, जिनकी मौत मोबाइल और टावर से होने वाले रेडिएशन की वजह से हुई होती है. पक्षी के रूप में विलेन लोगों की जान लेना शुरू करता है. यहां से फिल्म में आपको एक पक्षी नहीं, बल्कि हीरो रजनीकांत से लड़ता हुआ विलेन दिखेगा, लेकिन जरूरत ये समझने की है कि आखिर वो विलेन बना क्यों? एक पक्षी और पक्षियों से प्यार करने वाला शख्स लोगों की जान लेने पर उतारू क्यों हो गया? इसकी वजह वो रेडिएशन है, जो मोबाइल और उनके टावरों से होता है. इसी कारण पक्षीराजन और मारे गए पक्षियों ने हर उस शख्स को अपना दुश्मन मान लिया, जो स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं.

2.0, रजनीकांत, मोबाइल रेडिएशनएक्सपर्स मानते हैं कि 2.0 फिल्म के जरिए एक सही मुद्दे को बहस का विषय बनाया गया है.

अब बहस इस बात को लेकर हो रही है कि क्या वाकई ऐसा होता है? पक्षी रेडिएशन से मर रहे हैं? इसका सीधा सा जवाब है- नहीं. फिल्म में एक चिंता को लेकर कल्पना गढ़ी गई है, लेकिन ध्यान रहे, ये चिंता काल्पनिक नहीं है. इस बात तो नकारा नहीं जा सकता है कि मोबाइल और मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडिएशन से कुछ तो नुकसान होता ही है. भले ही आप कहें कि फिल्म में सब कुछ बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया है, लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि इस फिल्म ने उस चिंता को दुनिया के सामने रखा है, जो भविष्य में खतरनाक हो सकती है.

मोबाइल रेडिएशन कितना खतरनाक?

हर मोबाइल और टावर से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन (ईएमआर) निकलता है, लेकिन सवाल ये है कि क्या वो कितना खतरनाक होता है? 2011 में पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से एक रिपोर्ट 'A possible impact of communication tower on wildlife birds and bees' जारी की गई थी. इसके अनुसार पक्षियों की संख्या घटने के पीछे मोबाइल रेडिएशन की भी एक बड़ी भूमिका है. इतना ही नहीं, ईएमआर की वजह से मधुमक्खियों में अंडे देने की क्षमता में भी कमी पाई गई.

इस रिपोर्ट को तैयार करने वालों में से एक Nature Forever Society के प्रेसिडेंट मोहम्मद दिलावर का कहना है कि ईएमआर को हमेशा ही नुकसानदायक बताया जाता है. चीन और स्विटजरलैंड जैसे देशों में ईएमआर को लेकर अलग नियम हैं, जबकि भारत के नियम अलग हैं. स्टडीज से यह साफ हो चुका है कि जब किसी इलाके में मोबाइल और मोबाइल टावर बढ़े हैं, तो वहां गौरैया में कमी आई है. हालांकि, भारत में इस टॉपिक पर सही से रिसर्च की ही नहीं गई है. उन्होंने बताया कि 2011 की रिपोर्ट में भी उन्होंने कहा था कि ईएमआर गौरैया की संख्या में कमी की एक वजह है, ना कि सिर्फ यही एक वजह है. इसके अलावा खाना और घोंसला बनाने के लिए जगह नहीं मिल पाना भी इसकी वजहों में शामिल है.

एक ऑर्रनिथोलोजिस्ट मारुति चितामपल्ली ने सबसे पहले रेडिएशन के खिलाफ आवाज उठाई थी. उनके अनुसार रेडिएशन से पक्षियों पर बुरा असर पड़ता है और साथ ही प्रवासी पक्षियों को उड़ने में दिक्कतें भी होती हैं.

पंजाब के Centre for Environment and Vocational Studies को घरों में घूमने वाली गौरैया के 50 अंडों को करीब 5-10 मिनट के लिए ईएमआर में रखा गया था. इसके बाद पाया गया कि सभी अंडों को ईएमआर की वजह से नुकसान पहुंचा.

प्रकृति से प्यार करने वाले श्रीकांत देशपांडे कहते हैं कि मोबाइल टावर लगाने में नियमों का पालन नहीं किया गया. टेलिकॉम कंपनियां मोबाइल टावर की फ्रीक्वेंसी बढ़ा देती हैं, ताकि कम टावर लगाने पड़ें, जिसकी वजह से पक्षियों पर बुरा असर पड़ रहा है.

सेल्युलर कंपनियों ने किया था फिल्म का विरोध

अभी तक ये देखने को मिलता था कि किसी फिल्म का विरोध इतिहास से छेड़छाड़ करने या फिर धर्म-जाति को लेकर होता था, लेकिन '2.0' का विरोध सेल्युलर कंपनियां तकनीक को गलत दिखाने को लेकर कर रही थीं. सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का आरोप है कि यह फिल्म एंटी साइंटिफिक एटिट्यूड दिखा रही है और जनहित के खिलाफ है. फिल्म के खिलाफ सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में शिकायत भी दर्ज करा दी गई थी. आरोप लगाया जा रहा है कि फिल्म में मोबाइल फोन और मोबाइल टावर को पर्यावरण और जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक दिखाया गया है, जो गलत है. हालांकि, बावजूद इन सबके फिल्म रिलीज भी हुई और लोग इसे खूब देख भी रहे हैं. हां, इस फिल्म के कॉन्सेप्ट पर बहस जरूर हो रही है. वहीं, इतना सब होने के बावजूद मोबाइल रेडिएशन को लेकर अभी तक ना कोई रिसर्च शुरू हुई है ना ही किसी टेलिकॉम कंपनी से रेडिएशन पर रिपोर्ट मांगी गई है.

असली दिक्कत मोबाइल टावर हैं

अगर बात की जाए रेडिएशन से होने वाली दिक्कतों की तो असली दिक्कत तो मोबाइल सिग्नल के लिए लगे टावरों से हो रही है. मोबाइल फोन पर तो रेडिएशन चेक भी किया जा सकता है, लेकिन टावरों का क्या? मोबाइल फोन तो लोगों के हाथ में हैं, जिसका रेडिएशन चेक हो सकता है, लेकिन टावरों से निकलने वाला रेडिएशन खतरनाक स्तर से कम है या अधिक, इसका पता लगाना सरकार की जिम्मेदारी है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)के अनुसार मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडियो तरंगे इतनी ताकवर नहीं होती हैं, जिससे शरीर को या फिर डीएनए को कोई भी नुकसान पहुंचे. हालांकि, WHO भी लंबी अवधि में शरीर पर पड़ने वाले असर के बारे में नहीं पता लगा सका है, क्योंकि अभी मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर बहुत अधिक साल नहीं बीते हैं. ऐसे में डेटा की ही कमी है.

मोबाइल फोन से निकलने वाला रेडिएशन आपकी सेहत के लिए खतरनाक है या नहीं यह मोबाइल की SAR यानी स्पेसिफिक एबजॉर्प्शन रेट पर निर्भर करता है. 1.6 W/Kg तक की एसएआर वैल्यू होने से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन इससे अधिक नहीं होनी चाहिए. हालांकि, आजकल के मोबाइल फोन में 0.3 W/Kg - 0.6 W/Kg की एसएआर वैल्यू ही होती है. अगर आपके पास एंड्रॉइड मोबाइल है तो उसकी एसएआर वैल्यू आप *#07# डायल कर के चेक भी कर सकते हैं.

भारत में अभी तक घरों में पाई जाने वाली गौरैया की संख्या में आ रही कमी का सही कारण पता नहीं है, क्योंकि भारत में ऐसी कोई रिसर्च नहीं की गई है. एक्सपर्स मानते हैं कि 2.0 फिल्म के जरिए एक सही मुद्दे को बहस का विषय बनाया गया है, लेकिन इस पर और अधिक रिसर्च की जरूरत है. वहीं दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर इस फिल्म को लेकर दो पक्ष दिखाई दे रहे हैं. एक वो, जो फिल्म द्वारा एक अहम मुद्दा उठाने को सही बता रहे हैं, जबकि एक दूसरा पक्ष वो है जो इस फिल्म में दिखाई गई बातों से सहमत नहीं है. 2.0 फिल्म में बेशक थोड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बातें दिखाई गई हैं, लेकिन ये ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर अभी नहीं संभला गया तो भविष्य में मोबाइल रेडिएशन से होने वाली दिक्कतें सामने जरूर आएंगी.

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