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Updated: 02 जून, 2015 11:43 AM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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देश की राजधानी में एक ऐसी जगह है जहां सिर्फ 'साफ-सुथरे' बच्चों की ही एंट्री हो सकती है. बाकियों के लिए 'नो एंट्री' लागू है.

जमाना टर्म्स एंड कंडीशन का है - इसलिए यहां भी शर्तें लागू हैं. यहां से मतलब दिल्ली की एक अदालत परिसर में बने एक क्रेच से है. शर्तें छोटी छोटी हैं! शायद इसलिए क्योंकि मामला छोटे बच्चों का है.

एक क्रेच - जहां शर्तें लागू हैं

ये क्रेच एक ऐसे परिसर में है जहां इंसाफ के लिए लोग फरियाद लेकर आते हैं. हालांकि, ये केस सीधे अदालत से तो नहीं जुड़ा है लेकिन उसी कैंपस का है जिसमें इंसाफ का मंदिर भी बसता है.

मगर मामला उनसे जुड़ा है जिन्हें इंसाफ का मतलब भी नहीं मालूम. उनके माता-पिता दुखी हैं. दुख का कारण एक सर्कुलर है जिसे जिला अदालत के एडमिनिस्ट्रेशन ने जारी किया है.

क्या कहता है ये सरकारी फरमान? सर्कुलर में लिखा है, 'नॉर्थ वेस्ट और नॉर्थ जिले के सभी न्यायिक अफसरों और मिनिस्टीरियल स्टाफ के ढाई साल से 12 साल की बेटियों और ढाई साल से 9 साल के बेटों के लिए रोहिणी कोर्ट कॉम्प्लेक्स की तीसरी मंजिल पर क्रेच की सुविधा उपलब्ध है.'

बात सिर्फ इतनी होती तो उतनी नहीं अखरती. खास बात सर्कुलर में दी गईं शर्तें हैं जो हैरान करने वाली हैं.

"यह सुविधा स्टाफ के बच्चों को तभी मिलेगी, जब क्रेच में अफसरों के बच्चे नहीं होंगे और बच्चे साफ-सुथरे, हाइजीनिक और बीमारी रहित होंगे."

स्टाफ के बच्चों को तभी ये सुविधा मिलेगी जब यहां सीट खाली होगी. ऐसा तभी होगी जब इसमें अफसरों के बच्चे नहीं होंगे. यहां तक तो किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए और न ही स्टाफ के किस सदस्य को है. आपत्ति आगे की शर्तों पर है.

बच्चे साफ सुथरे, हाइजीनिक और बीमारी रहित होने चाहिए. 'हाइजीनिक और बीमारी रहित' की बात भी शायद उतनी नहीं अखरती क्योंकि दूसरे बच्चों के बीमारी से बचाने की बात है.

'साफ-सुथरे' बच्चों का क्या मतलब है? निश्चित रूप से ये फरमान स्टाफ के लोगों के लिए तकलीफदेह है. उन्हें खुद और उनके बच्चों में हीन भावना जताने वाला है.

बच्चे गंदे कैसे हो सकते हैं?

ये कहानी एक टीचर की है. गाजियाबाद के वसुंधरा में एक टीचर घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं. कुछ महीने पहले उनके यहां काफी बच्चे पढ़ते थे. हाल में एक दिन जाना हुआ तो कम बच्चे नजर आए. कारण पूछने पर जो बात सामने आई - वो मिसाल है.

जैसा उन्होंने बताया, "असल में कुछ पेरेंट्स अपने बच्चों को अलग से पढ़ाने के लिए कह रहे थे. मुझे भी लगा कोई बात नहीं शायद वो ज्यादा अटेंशन चाहते होंगे. लेकिन बात और थी. असल में मेरे पास कई बच्चे झुग्गियों से पढ़ने आते हैं. कुछ पेरेंट्स का कहना था कि उन्हें गंदे बच्चों के साथ अपने बच्चों को बैठाना मंजूर नहीं है. जब उन्होंने उसकी वजह बताई तो मैंने साफ मना कर दिया."

इस फैसले से उन्हें आर्थिक नुकसान हुआ. धीरे धीरे वे सारे पेरेंट्स जिन्हें झुग्गियों में रहने वाले बच्चों के साथ अपने बच्चों को पढ़ने देना पसंद नहीं था, उन्होंने अपने बच्चों को भेजना बंद कर दिया. लेकिन उस टीचर को कोई पछतावा नहीं है. बल्कि, खुशी इस बात की है कि कुछ बच्चों के लिए वो कुछ कर पाती हैं.

पुणे की वो घटना

पुणे के एक रेस्तरां के स्टाफ ने एक बच्चे को धक्का देकर बाहर कर दिया था. इस घटना की जानकारी एक फेसबुक पोस्ट से मिली. जब मीडिया में खबर आई तो बवाल मचा. फिर शुरू हुई जांच, स्टाफ के खिलाफ कार्रवाई और चला माफी का दौर.

हुआ ये था कि महिला अपने दोस्तों के साथ मैकडोनाल्ड गईं और उन्होंने एक सॉफ्टड्रिंक खरीदा. जब वह रेस्तरां से बाहर आईं तो वहां एक बच्चा खड़ा था. बच्चे ने उनसे वैसा ही सॉफ्ट ड्रिंक मांगा. बच्चे की इच्छा जानकर वो उसे अंदर ले गईं. इसी बीच रेस्तरां के एक कर्मचारी ने बच्चे को बाहर कर दिया. उसका कहना था, ‘इस तरह के लोगों को यहां आने की अनुमति नहीं है.’

दिल्ली के कोर्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने भले ही नियमों के तहत सर्कुलर जारी किया हो. मगर 'साफ-सुथरे' बच्चों का क्राइटेरिया समझ से परे है. बच्चे न साफ होते हैं, न गंदे होते हैं. बच्चे तो बस निर्मल होते हैं. बच्चों के मामले में नियम बनाते वक्त अगर एक बार उनका चेहरा गौर से देख लिया जाए तो ऐसा सर्कुलर शायद ही कभी तैयार हो पाए.

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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