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Updated: 11 जून, 2023 04:15 PM
प्रणय विक्रम सिंह
 
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भारत की महान संत परम्परा में कहा गया है कि 'राष्ट्रधर्म सबसे बड़ा धर्म है.' यही कारण रहा है कि जब-जब भारत भूमि पर विदेशी आक्रांताओं ने कुदृष्टि डालने का दुस्साहस किया, तब-तब भारत के संत समाज ने जनजागरण के साथ ही स्वयं आगे बढ़कर मां भारती की रक्षा हेतु शस्त्र द्वारा शत्रु का प्रतिकार करने में भी संकोच नहीं किया. पावन श्री गोरक्षपीठ इसी परम्परा की सशक्त हस्ताक्षर व पोषक है.

इतिहास साक्षी है कि सनातन आस्था के महान केंद्र श्री गोरक्षपीठ के योगी राष्ट्र-रक्षा हेतु स्वयं सहभागी बन सुप्त समाज के राष्ट्रीय बोध को जागृत करने का युगान्तरकारी कार्य शताब्दियों से कर रहे हैं. मध्ययुगीन पराधीनता से लेकर आधुनिक युग की ब्रितानी गुलामी तक, प्रत्येक स्वाधीनता के स्वर में 'नाथ पंथ' की हुंकार सुनने को मिलती है. उदाहरण के लिए मध्ययुगीन भारत में बाबा अमृतनाथ, परमेश्वरनाथ, बुद्धनाथ, रामचंद्रनाथ, वीरनाथ, अजबनाथ तथा पिपरिनाथ आदि महंतों से लेकर 19वीं शताब्दी में महंत गोपालनाथ तो बीसवीं शताब्दी में योगिराज बाबा गंभीरनाथ जी और महंत दिग्विजयनाथ जी का नाम उल्लेखनीय है.

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विदित हो कि 'संत एवं सैनिक' की समावेशी और समन्वयकारी प्रवृत्ति के साथ विकसित नाथ पंथ की योग प्रधान पांथिक परंपरा में मातृभूमि की आराधना को सदैव ही सर्वोपरि माना गया है. यही कारण है कि नाथ पंथ के योगियों ने आवश्यकता पड़ने पर 'साधना और संग्राम' को एक साथ साधा तथा अपने योगियों,  साधुओं एवं संन्यासियों को यह संदेश दिया कि 'धर्म, समाज तथा राष्ट्र, यदि विपत्ति में हों तो उनके संरक्षण व संवर्धन के लिए हो रहे संघर्ष में सहभागी बनना, उसका नेतृत्व करना भी धर्म है, साधना है. 

राष्ट्र-रक्षा के लिए विदेशी अरब आक्रमणकारियों के विरुद्ध उदयपुर की पहाड़ी पर जुटे संन्यासियों को गुरु गोरखनाथ ने योग साधना और राष्ट्र-रक्षा, दोनों का संदेश देते हुए कहा था कि 'राष्ट्र-रक्षा हेतु युद्ध भी योग है.' विदेशी आक्रमणकारियों से संग्राम हेतु श्री गोरखनाथ ने प्रत्येक घर से एक-एक नवयुवक को योगी सेना में आने का आह्वान किया था. सर्वविदित है कि खिलजियों के बर्बर शासनकाल के समय नाथ पंथ के योगी चर्पटनाथ ने योगी समूह का सैन्यीकरण किया था. संभव है कि सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह को भी सिख पंथ के सैन्यीकरण की प्रेरणा यहीं से प्राप्त हुई हो. 

भारत के प्रथम स्वातंत्र्य समर में भी नाथ योगियों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण और अविस्मरणीय थी. इस तथ्य को ऐसे समझा जा सकता है कि 1855 से 1880 ई. तक श्री गोरखनाथ मंदिर के महंत गोपालनाथ जी भारत के स्वतंत्रता संग्राम एवं संन्यासी सेना के प्रमुख सिपाही थे और योगिराज बाबा गंभीरनाथ क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक थे. यही नहीं, श्री गोरखनाथ मंदिर पूर्वी उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारियों का प्रमुख आश्रय स्थल था. इन्हीं चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में महंत दिग्विजयनाथ स्वाधीनता संग्राम में सहभागिता करते हुए विख्यात चौरी-चौरा घटना में मुख्य आरोपी बने थे. हालांकि महामना मदन मोहन मालवीय की पैरवी से वे फांसी की सजा से बच गए थे. 

विदित हो कि महंत दिग्विजयनाथ ने एक ओर जहां उस समय के क्रांतिकारियों को संरक्षण, आर्थिक मदद और अस्त्र-शस्त्र मुहैया कराया, वहीं महात्मा गाँधी की अगुवाई में चल रहे असहयोग आंदोलन के लिए अपनी पढ़ाई भी छोड़ दी. चौरी-चौरा की ऐतिहासिक घटना (04 फरवरी, 1922) के करीब साल भर पहले 08 फरवरी, 1921 को जब गाँधी जी का पहली बार गोरखपुर आना हुआ था, तब महंत दिग्विजयनाथ रेलवे स्टेशन पर उनके स्वागत और सभा स्थल पर व्यवस्था के लिए स्वयं सेवक दल (वालेन्टियर कोर) के साथ मौजूद थे. उन्होंने गांधी जी के कार्यों को पूरा करने में तन-मन-धन से सहयोग किया. किन्तु थोड़े दिनों के पश्चात चौरी-चौरा की प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि राणा नान्हू सिंह (महंत दिग्विजयनाथ) महात्मा गाँधी के समझौतावादी सिद्धांतों के नहीं बल्कि क्रांति-पथ के पोषक थे.

गोरखपुर जिले में स्थित चौरी-चौरा स्थान पर आंदालेन के खिलाफ जो प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई, उससे नौकरशाही तो आतंकित हुई ही, महात्मा गाँधी के अहिंसात्मक आंदोलन का रूप ही बदल गया. उन्हें बहुत शीघ्र ही अपना आंदोलन वापस लेना पड़ा. इस चौरी-चौरा घटना के अभियुक्तों को फांसी की सजा देने का निर्णय लिया गया था. उनमें राणा नान्हू सिंह भी थे, किन्तु साक्ष्य न होने के कारण वे मुक्त कर दिये गये.

इसके बाद महंत दिग्विजयनाथ ने मंदिर को नवीन रूप से व्यवस्थित किया. अब यह पावन मंदिर नाथ पंथी साधुओं के साधना केन्द्र, पर्यटक साधुओं व श्रद्धालुओं के लिए पूजा स्थल होने के साथ ही हिन्दू धर्म और संस्कृति के समस्त अंगों को प्रोत्साहित करने के लिए महान सांस्कृतिक केन्द्र बना दिया. ब्रिटिश शासन काल में इस मंदिर ने हिन्दू धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष किया. 

महायोगी भगवान गोरखनाथ के मंदिर की पवित्रता और आध्यात्मिक गरिमा ने मान, रक्षा तथा हिन्दुत्व प्रेम के साथ ही हिन्दू संस्कृति की रक्षा की भावना को और भी दृढ़ कर दिया. देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों ने भी उनके सांस्कृतिक भावों को सुदृढ़ किया. 

महंत दिग्विजयनाथ ने नाथ सम्प्रदाय के बिखरे योगी समाज को एक किया. उन्हें धर्म, आध्यात्म के साथ-साथ राष्ट्रोन्मुख किया. हिन्दुत्व के मूल्यों और आदर्शों की स्थापना के लिए वे राजनीति में कूदे. गौरतलब है कि राष्ट्रीयता का जो मंत्र उन्होंने दिया, यदि उसे मान लिया गया होता तो आज पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाववाद और कश्मीर में ये हालात नहीं होते. वृहद हिन्दू समाज ही राष्ट्रीय एकता की गारन्टी है. भारत-नेपाल सम्बन्धों को आगे बढ़ाने के लिये तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को बार-बार ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की सहायता लेनी पड़ थी. धर्म, राजनीति, शिक्षा, समाज के सन्दर्भ में ब्रह्मलीन महाराज के विचार आज भी प्रासंगिक हैं.

शिक्षा और स्वास्थ्य की दृष्टि से अति पिछड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश में उन्होंने शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाओं और तकनीकी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना कर सामाजिक परिवर्तन में अपनी सक्रिय भागीदारी निभायी. राष्ट्र की रक्षा और समृद्धि के लिए सामाजिक समरसता बुनियादी शर्त है. श्री गोरक्षपीठ ने सदैव इस सत्य को स्वीकार करते हुए समतामूलक समाज की स्थापना के लिए संघर्ष किया. जब वाराणसी में विश्वनाथ जी के मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित था, तब महंत दिग्विजयनाथ ने अपने आन्दोलन के माध्यम से मंदिर का दरवाजा सबके लिए खुलवाया.

ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ ने मीनाक्षीपुरम में दलितों को सम्मान दिलाने के लिए आन्दोलन किया तथा उनके साथ बैठकर सहभोज कर हिन्दू समाज को जोड़ने का काम किया. दुनिया के राजनीतिक इतिहास में गोरक्षपीठ ने विशिष्ट परम्परा को प्रतिष्ठित किया है. इस पीठ ने भारत की सनातन परम्परा को वर्तमान युग में व्यावहारिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया है. मध्य युग से लेकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम तक, धर्म, राष्ट्र और राजनीति को एक साथ साधने का प्रयत्न करने वाले ऋषियों की एक लम्बी परम्परा है. 

ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे. वे कहते थे कि भारत का विकास हिन्दुत्व के वैचारिक अधिष्ठान पर ही सम्भव है. आजाद भारत का पुनर्निमाण उसकी सांस्कृतिक विरासत पर ही करना होगा, तभी स्वाभिमानी व स्वावलम्बी भारत खड़ा होगा. महंत अवेद्यनाथ ने जनाभियान चलाकर महंत दिग्विजयनाथ के वैचारिक अधिष्ठान को जनान्दोलन बना दिया और महंत योगी आदित्यनाथ आज उसी जनान्दोलन के प्रतिफल हैं.

ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ राष्ट्र के उन नायकों में से हैं, जिनके अन्दर सिद्धांत के प्रति जबरदस्त आक्रामकता दिखती थी. कभी भी सिद्धांतों के प्रति इन्होंने समझौता नहीं किया. राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ सैद्धांतिक विनयशीलता के प्रतिमूर्ति थे. दीगर है कि महंत अवेद्यनाथ का पूरा जीवन ही जाति व्यवस्था, छुआ-छूत एवं ऊंच-नीच के विरुद्ध संघर्ष करते हुए व्यतीत हुआ था. उनके द्वारा गांव-गांव में सहभोज, हिन्दू समाज में तथाकथित अछूत माने जाने वाले दलितों व वंचितों के साथ स्वयं और सबको एक साथ बैठाकर भोजन करने के अभियान को भला कौन भूल सकता है?

महंत अवेद्यनाथ का ही प्रस्ताव था कि पावन श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट कोई तथाकथित 'अछूत' रखे. ऐसे ही वाराणसी में अछूत माने जाने वाले डोम राजा के घर जाकर न केवल स्वयं उन्होंने भोजन किया, अपितु अपने साथ बड़ी संख्या में साधु समाज को भी भोजन कराकर सामाजिक-विखण्डन का बड़ा कारण बनीं जातिवादी प्रवृत्तियों पर कुठाराघात किया. विश्व को संदेश दिया कि भारतीय समाज में छुआ-छूत एवं ऊंच-नीच की कुप्रवृत्तियों के दिन समाप्ति की ओर हैं. 

नाथ पंथ की परम्परा में विश्व का सर्वोच्च नाथपंथी केन्द्र गोरखनाथ मंदिर के कपाट सदैव सभी के लिए खुले रहते हैं. श्री गोरक्षपीठ में प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के एक साथ भोजन रूपी प्रसाद प्राप्त करता है. गोरखनाथ मंदिर को आमतौर पर लोग सिर्फ हिन्दुत्व के केन्‍द्र के रूप में देखते हैं, लेकिन मंदिर साम्प्रदायिक सद्भावना का केंद्र भी है. परिसर में कई मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से रहते हैं और वहीं वे विभिन्न व्यवसाय कर जीविकोपार्जन करते हैं. वे मंदिर की व्यवस्था में न सिर्फ रच-बस गए हैं, बल्कि उसकी उतनी ही फिक्र भी करते हैं, जितना कि हिन्दू धर्मावलंबी.

गोरक्षपीठ के सभी महंत बिना किसी भेदभाव के समाज में सभी के यहां,  सभी के साथ पानी पीते हैं, भोजन करते हैं तथा अपने भण्डारे में भी सभी के साथ भोजन प्रसाद ग्रहण करते हैं. वर्तमान महंत योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि ‘सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृति का प्राण है.’  वे गरीबों, असहायों, पीड़ितों, दलितों व वंचितों के अत्यंत प्रिय धर्मगुरू होने के साथ ही श्रेष्ठ जननेता भी हैं. वे कहते हैं कि दुनिया की श्रेष्ठतम हिन्दू संस्कृति, श्रेष्ठतम हिन्दू जीवन पद्धति एवं श्रेष्ठतम सामाजिक व्यवस्था में जाति के आधार पर ऊंच-नीच की भावना और छुआ-छूत का कोई स्थान नहीं है. 

सत्य भी है, हम उस आध्यात्मिक संस्कृति के वारिस हैं, जिसने कण-कण में परमात्मा का वास तथा सभी प्राणियों में उसी परमात्मा का अंश माना है. ऐसे में जातिवाद, प्रान्तवाद, भाषावाद सहित नारी-पुरुष, अमीर-गरीब, ऊंच-नीच जैसे भेदभाव हमारी संस्कृति के हिस्सा नहीं हो सकते. नाथ पंथ के सबसे बड़े केंद्र श्री गोरक्षपीठ ने इस संदेश को प्रत्येक कालखण्ड में जन-जन तक पहुंचाकर राष्ट्र निर्माण की दीवार को समता और सद्भाव की ईंटों द्वारा सुदृढ़ करने का कार्य किया है.

स्वाधीनता संघर्ष में बढ़-चढ़ कर सहभागिता करने वाली विभिन्न संस्थाएं व प्रतिष्ठान आज जब अस्तित्वहीन अथवा दिशाहीन हो गए हैं, इस संक्रमणकालीन समय में श्री गोरक्षपीठ भारत की सांस्कृतिक व लोकतांत्रिक चेतना को जागृत कर अपने 'राष्ट्रधर्म' का सतत निर्वहन कर रही है. पीठ का यह अमूल्य और अमिट योगदान युग-युगांतर तक करोड़ों लोगों को राष्ट्र आराधना के लिए प्रेरित करता रहेगा.

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