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Updated: 27 सितम्बर, 2015 07:54 PM
अभिषेक पाण्डेय
अभिषेक पाण्डेय
  @Abhishek.Journo
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कई दिनों के इंतजार और दिल में अगाध श्रद्धा लिए जब राजस्थान के मेंहदीपुर बालाजी मंदिर पहुंचा तो तड़के ही हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ देखकर इस तीर्थस्थल के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ गई. भगवान की कृपा पाने को देश के कोने-कोने से आए लोग उनके दर्शन को लालयित थे.

भगवान के दर्शन की अधीरता इस कदर कि लोग सुबह 3 बजे से ही सैकड़ों की संख्या में लाइन में लग गए थे ताकि सुबह 7 बजे मंदिर खुलने पर सबसे पहले प्रभु के दर्शन करने का सौभाग्य उन्हें ही प्राप्त हो. अपने ईष्ट देव से मिलने की इस व्याकुलता को देखकर मेरे मन में हज पर जाने वाले लाखों मुस्लिमों की तस्वीर उभर आई. शायद इसका कारण एक दिन पहले मक्का में हुई दुखद घटना भी थी, जिसमें अपने धर्म के सबसे पवित्र स्थान के दर्शन की हसरत लिए सैंकड़ों मुस्लिमों को असमय ही दुनिया से रुखसत हो जाना पड़ा था.

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मंदिर के पास लगा कूड़ों का ढेर
 

खैर, मुझे भी सुबह 6 बजे अपने एक साथी मुकेश तिवारी के साथ भक्तों की इस पंक्ति में शामिल होने का अवसर मिला. लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ, उसने मुझे झकझोर कर रख दिया. इसने दिखाया कि मक्का में सैंकड़ों मुस्लिमों की मौत पर वहां की अव्यवस्था पर सवाल उठाने वाले लोगों को जरा अपने देश के ऐसे तीर्थस्थलों पर जाकर देखना चाहिए, जहां भगवान की कृपा पाने आई हजारों की भीड़ को भगवान भरोसे ही छोड़ दिया गया है. देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों में इस कदर अव्यवस्था और अफरातफरी का माहौल होता है कि यहां मक्का जैसे हादसों के रोज होने का खतरा बना रहता है.

बालाजी के मंदिर के सामने बहता नाला और कूड़े का ढेरः बालाजी के दर्शन के लिए हजारों लोगों की लाइन को जब मैंने नाले के पानी में से होकर गुजरते और मंदिर के सामने लगा कूड़ों का अंबार देखा तो मन में यही सवाल उठा कि कहीं भगवान लोगों से मदद की गुहार तो नहीं लगा रहे हैं और अपील कर रहे हैं कि सिर्फ अपने स्वार्थ और कल्याण के लिए भगवान के घर को कूड़े के ढेर में तब्दील करने से लोगों को बाज आना चाहिए. लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो सरकार, प्रशासन और मंदिर की देखरेख करने वालों से है. क्यों आखिर ये लोग अपनी जिम्मेदारियों से मुहं मोड़ लेते हैं और यहां गंदगी और अव्यवस्था का साम्राज्य बन जाने देते हैं, वह भी तब जबकि यहां के चढ़ावे से होने वाली मोटी कमाई से ये अपनी जेबें भरते हैं. लेकिन उसका कुछ हिस्सा मंदिर और इसके आसपास के इलाकों की भलाई और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए नहीं खर्च करते हैं. इन्हें न भक्त की चिंता है, न भगवान की, चिंता है तो बस अपने सुख-सुविधाओं और आराम की.

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 मंदिर से सटे बहता नाला

हजारों श्रद्धालुओं को भगवान भरोसे छोड़ाः देश में हर साल विभिन्न त्योहारों के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में सैंकड़ों लोग अपनी जानें गंवाते हैं. ये हादसे देश के प्रसिद्ध मंदिरों में होते हैं. 2011 में केरल के सबरीमाला मंदिर में मकर ज्योति के दर्शन को लेकर जुटी लाखों की भीड़ के बीच हुई भगदड़ में 102 लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे. हैरानी की बात यह है कि जब 14 जनवरी को कथित तौर पर थोड़ी देर के लिए प्रकट होने वाली ज्योति की सत्यता की जांच की बात आई तो सरकार ने कोर्ट में इसे लाखों लोगों की आस्था का सवाल कहकर इसकी जांच से इंकार कर दिया था. मतलब सरकार को लोगों की आस्था की तो चिंता है लेकिन उनकी जान की सुरक्षा की नहीं. इसी तरह अभी कुछ ही महीने पहले सावन के दौरान देवघर के शिव मंदिर में हुए हादसे में कई लोगों की मौत हो गई थी. सरकारें हर साल होने वाले इन हादसों को लेकर इस कदर बेफिक्र रहती हैं कि लगता है उन्हें जनता की जरूरत सिर्फ चुनाव के वक्त वोट पाने के लिए ही होती है. उसके बाद जनता की चिंता वह क्यों करें, भगवान के भक्त हैं तो भगवान ही जानें, उनसे क्या लेनादेना!

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भीड़ को नियंत्रित करने वाला कोई व्यवस्था नहीं

मक्का हो या मंदिर, सरकारों को फिक्र नहीं?छोटे से संकरे रास्तों के बीच धक्का-मुक्की करते हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच फंसकर जब मेरा दम घुटने लगा और आसपास मुझे मंदिर के ट्रस्ट या सरकार का कोई भी व्यक्ति भीड़ को संभालने और व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाते नहीं दिखा तो मुझे लगा कि सरकार को इन भक्तों की कोई चिंता नहीं है. वह तो सिर्फ मंदिर में भगदड़ जैसे हादसों के बाद घड़ियाली आंसू बहाकर और मदद के नाम पर मुआवजे का झुनझुना थमाना ही अपना कर्तव्य समझती है. फिर मुझे अचानक ही मक्का में हए हादसे में हज यात्रा पर गए सैकड़ों लोगों की मौत की बात याद आई. मतलब भारत हो या दुनिया का कोई और देश, हिंदू मंदिरों से लेकर मुस्लिम मस्जिदों तक अल्लाह और भगवान से दुआ मांगने गए लोगों की जान की सरकार की नजर में कोई कीमत नहीं है. नहीं तो क्या वजह है कि हज यात्रा पर गए लोगों की हर साल भगदड़ में होने वाली मौतों और हमारे देश में मंदिरों में भगदड़ में मारे जाने वाले श्रद्धालुओं के मरने का सिलसिला कभी थमता ही नहीं. कोरे आश्वसनों के अलावा इन मामलों से निपटने के लिए सरकारें कोई ठोस कदम उठाती नजर नहीं आती हैं.

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मंदिर से सटे गंदगी का आलम

भगवान ने लगाई अर्जी, सुनेगा कौन? यहां मंदिर के सामने ही बदइंतजामी और गंदगी का ढेर और भक्तों को इन अव्यवस्थाओं से होने वाली परेशानियों को देखकर लगता है कि भगवान ही गुहार लगा रहे हैं कि कम से कम उनके घर के आंगन को तो स्वच्छ रखो. यहां अपने भले के लिए भगवान के सामने मदद की अर्जी लगाने आने वालों को भगवान की यह गुहार सुनने और उसे बहरी सरकार के कानों तक पहंचाने की जरूरत है.

हमारे देश के मंदिर हों या हज के लिए मक्का-मदीना जाने वाले लोग, कहीं पर भी श्रद्धालुओं की सुरक्षा की चिंता नहीं है. अब तो लगता है कि सरकार से उम्मीद छोड़कर भगवान के सामने ही अपनी सुरक्षा की अरदास करनी पड़ेगी. लेकिन सवाल तो यह है कि इंसानों की दुनिया में भगवान के रहने की जगह को बेहतर बनाने कौन बनाएगा? जहां भगवान की ही अर्जी सुनने वाला कोई नहीं है, वहां भक्तों के बारे में कौन सोचेगा?

लेखक

अभिषेक पाण्डेय अभिषेक पाण्डेय @abhishek.journo

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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