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Updated: 19 अगस्त, 2015 02:09 PM
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देश विकसित कैसे होता है?

रोटी, कपड़ा और मकान से (एक सिनेमा में इस पर जोर दिया गया था)...
बिजली, सड़क और पानी से (हर पांच साल में नेताओं से यह सुनने को मिलता है)...
या फिर...   
सबके लिए एक समान शिक्षा के अवसर से (जिसको लेकर आज तक कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया, यहां तक कि फिल्म भी नहीं बनी.)...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेरे दिल की सुन ली. तीसरा ऑप्शन उन्हें भी सबसे सटीक लगा और फैसला करके हथौड़ा मार दिया - राज्य के सभी सरकारी कर्मचारी (जज, पुलिस, आईएएस, चपरासी) या नेता, जो जनता के पैसों या सरकारी पैसों से लाभान्वित होते हैं, उन्हें अपने बच्चों को राज्य सरकार के स्कूलों में पढ़ाना होगा.

कोर्ट ने राज्य सरकार को अपने आदेश को लागू करने के लिए 6 महीने का समय दिया है. कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात को स्वीकारा कि यदि सरकारी अफसरों के बच्चे सरकारी स्कूलों में जाएंगे तो इनकी दशा-दिशा में सुधार लाने के लिए वे खुद तत्पर रहेंगे. राज्य सरकार को कोर्ट ने साथ में यह भी निर्देश दिया कि जो अधिकारी या नेता ऐसा करने से बचते हैं, उनके लिए पदोन्नति, वेतन-भत्तों में वृद्धि आदि पर रोक आदि जैसे दंडात्मक प्रावधान भी बनाए.         

ये 'पारा' शब्द क्या होता है?
प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की उट-पटांग भर्ती पर भी कोर्ट ने सवाल उठाए. एकदम सही किया. आखिर वह कौन सा तर्क है, जिसके आधार पर शिक्षक के आगे 'पारा' लगाकर उनकी भर्ती कर ली जाती है - वो भी 5000-6000 रुपयों के वेतनमान पर! अगर यह तर्क शिक्षा के लिए सही हो सकता है तो फिर इस देश में पारा-जज, पारा-डॉक्टर, पारा-पुलिस, पारा-आईएएस क्यों नहीं दिखते? क्या इनका काम बड़ा और कठिन होता है? जिन बेरोजगारों को 5000-6000 रुपयों का 'लेमनचूस' दिखाकर शिक्षा जैसा काम करवाया जा सकता है, क्या वे बेरोजगार 7000-8000 रुपये के 'चॉकलेट' के लालच में जज, पुलिस, आईएएस के काम करने नहीं कर सकते?

शिक्षा की राजनीति क्यों नहीं
यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में कभी बाहर के विद्यार्थी पढ़ाई करने आते थे, उस देश के विद्यार्थियों को आज 'उच्च' शिक्षा के लिए विदेश जाना पड़ता है. इसके पीछे की राजनीति को समझना होगा. चूंकि यह इंसानी कमजोरी के साथ जुड़ा है तो समझना बहुत आसान है. आज का जो शासक वर्ग है, वह कभी नहीं चाहेगा कि उसके या उसकी पीढ़ियों के आगे समाज का कोई भी निचला तबका (जाति या पैसे से) पढ़-लिख कर आने वाले वर्षों में तनकर खड़ा हो. 'पढ़-लिख कर' इस शब्द के भारीपने से शासक वर्ग वाकिफ है. वह नहीं चाहता कि जनता भी इस तिलिस्म को जान पाए. और जब तक जान पाए, तब तक कम खर्चे में सर्वसुलभ शिक्षा के मॉडल को ही चौपट कर दिया जाए. यही वो मूल वजह है कि आप-हम हर 5 साल पर बिजली, सड़क और पानी के अलावा किसी अन्य मुद्दों पर नेताओं को बोलते नहीं सुन पाते हैं.

मिड-डे मील का खेल
सरकार जब कोई योजना लाती है तो उसके लिए आवश्यक मानव संसाधनों की भर्ती की जाती है. क्या आप किसी ऐसे स्कूल का नाम बता सकते हैं, जहां सरकारी योजना मिड-डे मील के लिए किसी कर्मचारी की भर्ती की गई हो? नहीं बता पाएंगे, क्योंकि ऐसा हुआ ही नहीं है. दाल-चावल जुटाने से लेकर खाना बनवाने तक, बच्चों को खिलाने, बिल बनाने तक की जिम्मेदारी शिक्षकों पर होती है. हालांकि सरकार को लगा कि यह ज्यादा काम नहीं है तो उसने स्कूल बिल्डिंग बनवाने के काम भी शिक्षकों के हिस्से डाल दिया - पढ़ाइए, खाना बनवाइए, खिलाइए, इस बीच ईंट-गारे का भी ख्याल रखिए... क्योंकि आप शिक्षक हैं.

मेरे घर की कहानी
मेरी मां और मेरे ससुर दोनों ही शिक्षक हैं - केवल नाम के. क्यों? इसलिए क्योंकि दोनों को शिक्षा के अलावा मैंने हर काम करते देखा है. दोनों को अलग-अलग राज्य सरकारों ने प्रभारी बना दिया है. मेरी मां जिस जिले में नौकरी कर रही है, वहां के डीएम साहब को सिर्फ इतनी चिंता रहती है कि बच्चे खाना खाए या नहीं, उनकी उपस्थिति कितनी रही, किचन बन गया तो टॉयलेट में क्या दिक्कत है!!! ऐसी ही चिंता मेरे ससुर के जिले के डीसी साहब को रहती है. वो भी क्या करें, कहने को आईएएस हैं लेकिन कर तो रहे नौकरी ही हैं. नेताओं ने जो कानून बनाए हैं, उसका पालन करना उनकी नौकरी की पहली शर्त है.

अब जरा इस ओर गौर फरमाएं. मान लीजिए कि सब कुछ ठीक-ठाक रहा और इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को अक्षरशः लागू कर दिया गया तो डीएम-डीसी साहब की सबसे बड़ी चिंता क्या होगी - पढ़ाई. तब वो शिक्षक से पूछेंगे - 'और मास्टर साब, सब बढ़िया. कोई दिक्कत तो नहीं. किसी भी कारण से पढ़ाई में बाधा नहीं आनी चाहिए.'    

उम्मीद करें कि लालफीताशाही सिर्फ अपने बच्चों की खातिर इस फैसले पर कोई पेंच न लगा दे. और अगर ऐसा होता है तो यह देखना भी बड़ा दिलचस्प होगा कि भ्रष्टाचार जैसे छोटे मुद्दे के खिलाफ इंडिया गेट पर जुटी भीड़ से बड़ी भीड़ सबको एक समान शिक्षा जैसे व्यापक मुद्दे पर जुट पाती है या नहीं...

#इलाहाबाद हाईकोर्ट, #शिक्षा, #मिड डे मील, इलाहाबाद हाईकोर्ट, शिक्षा, मिड डे मिल

लेखक

चंदन कुमार चंदन कुमार @chandank.journalist

लेखक iChowk.in में पत्रकार हैं.

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