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Updated: 29 जून, 2016 02:56 PM
अभिषेक पाण्डेय
अभिषेक पाण्डेय
  @Abhishek.Journo
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चेन्नई के सलेम की रहने वाली 21 वर्षीय विनुप्रिया को जब उसके दोस्तों ने फेसबुक पर उसकी आपत्तिजनक तस्वीर के बारे में बताया तो उसके होश उड़ गए. किसी ने विनुप्रिया की तस्वीर को फोटोशॉप करके फेसबुक पर अपलोड कर दिया था. इस बात से परेशान वेनुप्रिया मदद के लिए पुलिस के पास पहुंची. लेकिन पुलिस भला कहां सुनने वाली थी, इन तस्वीरों को फेसबुक से हटवाने की उसकी अपील का पुलिस पर कोई असर नहीं हुआ.

नतीजा रविवार को वेनुप्रिया की और भी फोटोशॉप्ड आपत्तिजनक तस्वीरें फेसबुक पर अपलोड कर दी गईं. अपनी आपत्तिजनक तस्वीरों को फेसबुक पर अपलोड किए जाने से परेशान विनुप्रिया इस बार टूट गई और सोमवार को उसने आत्महत्या कर ली. अपने सूसाइड नोट में विनुप्रिया ने जो लिखा है, वह इस देश के कानून, कानून के रखवालों और पूरे समाज को कठघरे में खड़ा करता है.

विनुप्रिया ने लिखा कि इस शर्मिंदगी को और बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हो गया था. पुलिस ने शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की. सबसे दुखद तो ये कि खुद उसके माता-पिता ने अपनी बेटी पर भरोसा नहीं किया कि ये तस्वीरें उसने नहीं अपलोड की थीं. यानी विनुप्रिया को दोहरी मार पड़ी, एक तरफ उसकी फर्जी तस्वीर अपलोड करने वाले शख्स ने उसे शर्मिंदगी झेलने पर मजबूर किया तो दूसरी ओर उसके घरवालों ने भी उस पर शक करके उसकी हिम्मत तोड़ दी. ऐसे में अगर वह इस बुराई के खिलाफ लड़ती भी तो कैसे, शायद इसीलिए उसे आत्महत्या का रास्ता चुनने को मजबूर होना पड़ा.

इस घटना से कानून से लेकर समाज तक सबकी भूमिका पर चर्चा जरूरी है. पहले तो वह शख्स जिसने ये अपराध किया, दूसरा पुलिस, जिसने इस अपराधी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, और तीसरा उसके माता-पिता जो बजाय के इस मुश्किल से निपटने के लिए अपनी बेटी का साथ देने के बजाय उसे ही दोषी ठहराने लगे. इसके लिए जरूरी है कि पहले तो हाल के वर्षों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही साइबर क्राइम की ऐसी घटनाओं और उससे निपटने वाले कानूनों के बारे में चर्चा की जाए. आइए जानें आखिर क्या है ऐसे अपराधों से निपटने के लिए कानून?

क्या है साइबर क्राइम और उससे निपटने का कानूनः

साइबर क्राइम ऐसा क्राइम होता है जिसमें कंप्युटर को टूल या टारगेट के तौर पर इस्तेमाल किया गया हो. यानी साइबर क्राइम में कुछ मामलों में कंप्युटर का इस्तेमाल क्राइम करने में होता है तो वहीं कुछ मामलों में कंप्युटर क्राइम का टारगेट हो सकता है. देश में इंटरनेट के विकास के साथ ही साइब्र क्राइम के मामलों में जबर्दस्त तेजी आई है. खासकर महिलाओं के खिलाफ होने वाली साइबर क्राइम की घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है.

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तमिलनाडु की 21 वर्षीय वेनुप्रिया ने फेसबुक पर उसकी अश्लील तस्वीर अपलोड किए जाने के बाद आत्महत्या कर ली

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक इसमें 2010 से 2013 तक साइबर क्राइम के मामले 350 फीसदी तक बढ़े हैं. 2010 में दर्ज हुए साइबर क्राइम के मामलों की संख्या 966 थी जोकि 2013 में बढ़कर 4356 हो गई. 4356 मामलों में से सबसे ज्यादा धोखाधड़ी (1240) और ईवटीजिंग और हैरेसमेंट (1116) के मामले थे. इन अपराधों को अंजाम देने वालों में सबसे ज्यादा 62 फीसदी अपराधी 18 से 30 की उम्र के हैं.

क्या है साइबर अपराध को रोकने के लिए कानूनः

देश में बढ़ते हुए साइबर अपराधों पर काबू पाने के लिए इंफॉर्मेशन ऐक्ट 2000 बनाया गया. इस ऐक्ट के तहत साइबर क्राइम करने वालों को आईटी और आईपीसी दो धाराओं में सजा दी जा सकती है. इस ऐक्ट के तहत साइबर क्राइम के अपराध का दोषी पाए जाने पर तीन से सात साल तक की सजा और 2 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. हर शहर में साइबर अपराधों से निपटने के लिए साइबर सेल का गठन किया गया है. साइबर क्राइम से पीड़ित कोई भी व्यक्ति साइबर सेल में इसकी शिकायत दर्ज करवा सकता है.

पुलिस का रवैया ऐसे अपराधों के प्रति हैरान करने वाला!

चेन्नई में 21 साल की लड़की की आत्महत्या की घटना भी देश में बढ़ते हुए साइबर क्राइम को दिखाती है. लेकिन पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करने में जितनी ढिलाई दिखाई उससे साइबर क्राइम से निपटने की सारी कोशिशें धरी की धरी रह जाती हैं. सरकार चाहें जितने भी कानून बना ले. अगर पुलिस उस कानून को लागू करने में ढिलाई दिखाएगी तो कोई भी कानून अपराधियों पर नकेल नहीं कस पाएंगे. अगर वेनुप्रिया के मामले में पुलिस ने उचित कार्रवाई की होती तो उसकी जान बचाई जा सकती थी. लेकिन पुलिस की लापरवाही विनुप्रिया की जिंदगी जाने की वजह बन गई.

विनुप्रिया के मामले में समाज भी कठघरे मे!

ये बहुत ही दुखद है हैरान करने वाली बात है कि अश्लील तस्वीर अपलोड किए जाने से परेशान और टूट चुकी विनुप्रिया को उसके माता-पिता से भी मदद नहीं मिली. उल्हे उन्होंने उस पर इन तस्वीरों को अपलोड करने का शक किया. ये मानसिकता समाज की उस सोच पर सवाल उठाती है जहां छेड़छाड और उत्पीड़न का शिकार होने के बाद महिलाओं को नसीहत दी जाती है और उन्हें ही दोषी ठहरा दिया जाता है.

विनुप्रिया जैसी लड़कियों के साथ होने वाले अपराधों में उनका कोई कसूर नहीं होता लेकिन बावजूद इसके उनके माता-पिता और समाज उन्हें ही अपना आचरण ठीक करने और उनके साथ हुए अन्याय का दोषी ठहरा देता है. अगर विनुप्रिया को इस मामले में अपने माता-पिता साथ मिला होता तो शायद वह इतनी जल्दी हिम्मत हारकर आत्मघाती कदम नहीं उठाती.

महिलाओं के खिलाफ न सिर्फ साइबर बल्कि हर तरह के बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए कानून और समाज दोंनों को गंभीर होने और अपनी सोच बदलने की जरूरत है, तभी इन अपराधों पर काबू पाया जा सकेगा!  

लेखक

अभिषेक पाण्डेय अभिषेक पाण्डेय @abhishek.journo

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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