होम -> समाज

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 06 जुलाई, 2020 01:23 PM
प्रीति 'अज्ञात'
प्रीति 'अज्ञात'
  @pjahd
  • Total Shares

15 अगस्त तक कोरोना वैक्सीन (Corona Vaccine) आ जाने को लेकर ICMR का एक पत्र वायरल हो रहा है. यह पत्र असली है. लेकिन जो बातें कही गई हैं, उनके लिए बस इतना समझ लीजिए कि ‘दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है!’

यहां यह जान लेना भी महत्वपूर्ण है कि यह आंतरिक पत्र था, जो लीक हो गया है. दरअसल, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने अपने चुने हुए संस्थानों को यह आदेश दिया है कि ‘कोरोना वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल 7 जुलाई से पहले शुरू हो और 15 अगस्त से पहले ख़त्म हो जाए, जिससे 15 अगस्त को इसे लॉन्च किया जा सके. यदि आपने ऐसा नहीं किया तो इसे अवज्ञा मानकर गंभीरता से लिया जाएगा!’ अपने इस पत्र के कारण ICMR के डायरेक्टर का पूरी दुनिया में मजाक बनाया जा रहा है. कोई और ये बात कहता तो हंसकर टाली जा सकती थी, लेकिन पूरी प्रक्रिया को जानने-समझने वाला व्यक्ति किन परिस्थितियों में ऐसा बोल सकता है, यह आश्चर्य और शोध का विषय है.

ख़ैर! एक सच और जान लीजिए कि ये देशभर की कंपनियों के लिए धमकी नहीं थी, बल्कि उनके अपने चुने 12 सेंटर्स को लिखा गया पत्र है. जो इस विषय को नहीं समझते, वे बस इतना ही जान लें कि वैज्ञानिकों पर किसी भी प्रक्रिया को झटपट पूरा करने का दवाब डालना पूरी मानव जाति के साथ अन्याय है. विज्ञान को थोड़ा समझिए, यह लफ़्फ़ाज़ी से नहीं चलता, बल्कि प्रयोगों, परिणामों और विश्लेषणात्मक अध्ययन की कई प्रक्रियाओं के बाद ही अंतिम नतीज़े तय करता है.

कोरोना वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया न केवल जटिल है, बल्कि एक निश्चित अनुशासन और धैर्य की मांग भी करती है. हां, अभी तक के सकारात्मक परिणामों को देखते हुए दिसंबर 2020 तक इसके आ जाने की पूरी उम्मीद है. मानकर चलिए कि यह सबसे तेज गति से बनने वाली वैक्सीन ही होगी. सामान्यतः कंपनीज़ को विभिन्न स्तरों पर मंज़ूरी लेने में ही महीनों लग जाते हैं और एक वैक्सीन को तैयार होने में 3 से 4 साल तक का या उससे भी ज्यादा समय लगता है. सुखद पक्ष यह है कि इस बार सरकार काग़ज़ी कार्यवाही में समय जाया नहीं कर रही और वैज्ञानिक दिन-रात एक कर इस वैक्सीन के निर्माण में व्यस्त हैं.

क्या है Animal Testing और क्यों की जाती है?

सुरक्षा महत्वपूर्ण मुद्दा है. सकारात्मक परिणाम मिले बिना मनुष्यों को ख़तरे में नहीं डाला जा सकता. इसीलिए कोई भी दवा या वैक्सीन की पहले एनिमल टेस्टिंग (Animal Testing) की जाती है. वैज्ञानिकों द्वारा यह परीक्षण (Testing) लैब में मुख्यतः कुतरने वाले जन्तु (rodents), जैसे- White Mice, Guinea pig, Rats, Rabbits पर किया जाता है. कभी-कभी अतिरिक्त सुनिश्चितता (Surity) हेतु Monkeys भी लिए जाते हैं. वैक्सीन इंजेक्शन के द्वारा दी जाती है. जीवों को न्यूनतम (Minimum) डोज़ देकर सबसे पहले उनकी एंटीबॉडीज़ उत्पन्न करने की क्षमता (Effectiveness test) जांची जाती है. इसमें इंजेक्शन देने के बाद कम-से-कम 15 दिन रुकना होता है, क्योंकि एंटीबॉडीज़ डेवलप होने में इतना समय लेती है. उसके बाद safety test द्वारा इसके सुरक्षित (Safe) होने का अध्ययन किया जाता है. यदि उनमें कोई भी असामान्यता नहीं देखी जाती और उनका व्यवहार, खान-पान सब ठीक रहता है तो इसका मतलब कि वैक्सीन सेफ़ है.

सेफ्टी स्टडीज़ में जन्तु के सभी अंगों (organs) का विस्तृत अध्ययन किया जाता है कि कहीं किसी भी ऑर्गन पर इस वैक्सीन का कोई दुष्प्रभाव (Adverse Effect) तो नहीं पड़ा है! यदि किसी भी ऑर्गन में कुछ दुष्प्रभाव देखने को मिला तो उसी समय वैक्सीन पर प्रश्नचिह्न लग जाता है. यदि परिणाम अनुकूल हैं तो इन आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट तैयार होती है. संतोषजनक परिणाम आने के बाद ही सरकार क्लिनिकल ट्रायल की अनुमति देती है.

ह्यूमन (Clinical) ट्रायल्स क्यों महत्वपूर्ण हैं?

मनुष्य आकार में तुलनात्मक रूप से बड़े होते हैं. जंतुओं (Animals) के जो रिज़ल्ट आते हैं, जरूरी नहीं कि वही शत-प्रतिशत परिणाम मनुष्यों में भी मिलें. इसलिए सुरक्षा प्रमाणित होने के बाद इन पर विस्तृत अध्ययन की अपनी महत्ता होती है. दोनों प्रजातियाँ (Species) अलग हैं तो रिस्पांस भी भिन्न हो सकता है. दोनों का तंत्र (System) अलग प्रकार से व्यवहार करता है. एनिमल्स में उनके तंत्रों का अध्ययन किया जा सकता है पर अन्य तक़लीफ़ें पता नहीं चलतीं. जबकि मनुष्य बता सकता है कि यहां दर्द है, सिरदर्द हो रहा, उल्टी- चक्कर आ रहे. प्रायः मनुष्यों को भी वही सिमिलर डोज़ दी जाती है, लेकिन इसका कोई निश्चित नियम नहीं है. कभी-कभी इसमें फ़र्क़ भी हो सकता है.

ह्यूमन ट्रायल कैसे होता है?

ह्यूमन ट्रायल Phase 1 में मुख्य रूप से वैक्सीन का सुरक्षित होना देखा जाता है. इसमें 6 से 12 लोगों के ग्रुप्स बनते हैं. इन्हें वैक्सीन की डोज़ दी जाती है. कुछ सब्जेक्ट में Placebo (इसमें कोई ड्रग नहीं होती है) भी दिया जाता है. इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन एक अच्छे वैक्सीन की सेफ्टी Placebo जैसी होनी चाहिए. अलग-अलग कंपनी में डोज़ देने का तरीक़ा अलग हो सकता है. प्रायः पूर्ण रूप से स्वस्थ मनुष्यों को इंजेक्शन द्वारा प्रामाणिक माप की डोज़ दी जाती है. फिर उन्हें 24 घंटे वहीं ऑब्ज़र्वेशन सेंटर में रखा जाता है. जहां उनके रहने-खाने का पूरा ध्यान रखा जाता है. डोज़ देने के पहले इनका ब्लड सैंपल लेकर रिपोर्ट तैयार की जाती है और डोज़ देने के 24 घंटे बाद भी ब्लड सैंपल लेकर यह सुनिश्चित किया जाता है कि कहीं कोई एडवर्स इफ़ेक्ट तो नहीं है और उनका तापमान (Temperature), ECG और सारे पैरामीटर्स सामान्य (Normal) हैं. बहुत ही सावधानीपूर्वक निगरानी (Carefully Monitoring) होती है और आंकड़े तैयार किए जाते हैं.

एक से ज्यादा बार भी क्लीनिकल ट्रायल संभव!

वैक्सीन का प्रभाव देखने के लिए सेकेंड डोज़ की जरूरत भी पड़ सकती है, इसलिए वॉलंटियर को 1 महीने बाद बुलाकर दूसरी डोज़ दी जाती है. चूंकि Safety establish हो चुकी है, इसलिए इस बार वॉलंटियर का रुकना जरूरी नहीं है. इस बार भी पहले की तरह ही ब्लड टेस्ट किया जाता है. जरूरत पड़ने पर तीसरी बार भी यही प्रक्रिया अपनाई जा सकती है. यहां मैं यह स्पष्ट कर दूं कि वैक्सीन परीक्षण (Test) अलग से ख़ून (Blood) लेकर नहीं होता! क्योंकि एंटीबॉडीज़ शरीर में तैयार होती है. वैक्सीन दिए गए मनुष्य का ब्लड लेकर यह स्टडी की जाती है कि एंटीबॉडीज़ डेवलप हुए या नहीं. चूंकि एनिमल टेस्टिंग के पुख्ता प्रमाणों के बाद ही क्लिनिकल ट्रायल्स होते हैं, इसलिए नतीजे सकारात्मक आने की पूरी उम्मीद होती है. दुर्भाग्यवश ऐसा न हुआ तो भी वॉलंटियर सुरक्षित रहता है. हां, प्रयोग असफ़ल माना जाता है.

कुछ ट्रायल एक डोज़ में भी पूरे हो सकते हैं लेकिन कोरोना के लिए कुछ कंपनीज़ एक से अधिक डोज़ के प्रयोग भी कर रही हैं. यदि पहले माह में ही एंटीबॉडीज़ बन जाती हैं तो ये अवधि कुछ कम दिनों की भी हो सकती है. अब प्रयोग सफल मान लिया जाता है. लेकिन नियमों के आधार पर ट्रायल निर्धारित समय अर्थात तीन महीने (अनुमानतः) तो फिर भी चलेगा ही.

हम जानते हैं कि 12 इंसानों के अध्ययन के आधार पर करोड़ों लोगों को वैक्सीन नहीं दिया जा सकता. इसलिए सुरक्षा स्थापित हो जाने के बाद Phase 2 में 100 से 1,000 लोगों पर ट्रायल होता है. Data Safety Monitoring Board और Ethics Committee को Phase 1 का डेटा दिखाया जाता है. उनकी अनुमति के बाद ही यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है. बताना चाहूंगी कि 1000 लोगों पर टेस्टिंग कंपनी में न होकर हॉस्पिटल में होती है. कंपनी वैक्सीन सप्लाई कर देती है. जहां डॉक्टर्स अपने-अपने हॉस्पिटल में ट्रायल करते हैं और कंपनी परिणाम के डेटा एकत्रित कर लेती है.

वैक्सीन परीक्षण के लिए कैसे चुने जाते हैं वॉलंटियर?

वैक्सीन परीक्षण के लिए पूर्ण रूप से स्वस्थ लोग लिए जाते हैं. इनका हेल्थ चेकअप होता है. मेडिकल हिस्ट्री देखी जाती है. परखा जाता है कि ये लोग किसी भी तरह की बीमारी से तो ग्रस्त नहीं हैं. मसलन किडनी, लिवर, डायबिटीज़, हार्ट संबंधी समस्याओं की जांच की जाती है. कोरोना संक्रमित या पूर्व कोरोना पीड़ित व्यक्ति वॉलंटियर नहीं हो सकता! कुछ शहरों में वॉलंटियर्स का एक शेयर्ड database होता है. इसमें एक वॉलंटियर एक समय दो जगहों पर नहीं जा सकता है. एक बार ट्रायल के रजिस्टर में उसका नाम आ गया तो वह निर्धारित समय के लिए ब्लॉक हो जाता है. डेटाबेस में हजारों लोग रजिस्टर्ड होते हैं. कंपनी आवश्यकतानुसार वॉलंटियर्स को बुलाकर उन्हें अच्छे से समझाती है कि ट्रायल किस चीज़ का है और क्यों कर रहे हैं? इसका क्या परिणाम हो सकता है? क्या नहीं हो सकता है? संतुष्ट होने पर उसकी लिखित अनुमति ली जाती है. पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी होती है. इनका हेल्थ चेकअप होता है और उन्हें ट्रायल के लिए चयनित कर लिया जाता है.

वॉलंटियर्स का विशेष ध्यान रखा जाता है

EC (Ethics Committee) सरकार के नियमानुसार (पेमेंट संबंधी) वॉलंटियर का मानदेय निर्धारित करती है. कंपनी इसे ही फॉलो करती है. EC की इन पर पूरी नज़र होती है. वॉलंटियर का जो work loss होता है, उसकी भरपाई भी कंपनी ही करती है इनका Insurance भी covered होता है. कंपनी अपनी आवश्यकतानुसार प्रोपोज़ल भेजती है, लेकिन प्रोटोकॉल सरकार ही तय या approve करती है. उसके बाद किसी भी स्थिति में उसमें एक भी बदलाव नहीं किया जा सकता. ह्यूमन सेफ्टी और वेलफेयर को सुनिश्चित करने के लिए जो Ethics Committee होती है, वो बाहर की होती है. ये यह भी देखती है कि वॉलंटियर का कुछ और फायदा न ले लिया जाए!

वॉलंटियर के लिए सामान्यतः 18 से 55 आयु वर्ग तक के लोग चयनित होते हैं. वैक्सीन बनाने वाली कंपनी का कोई भी व्यक्ति एवं उसके परिवार का सदस्य उस कंपनी के लिए वॉलंटियर नहीं बन सकता. महिलाएं भी वॉलंटियर हो सकती हैं पर पुरुषों को प्राथमिकता दी जाती है. इसका कारण गर्भधारण पर वैक्सीन के दुष्प्रभावों का न जानना है. Post-Menopausal और hysterectomy वाली महिलाएं ली जा सकती हैं. जहां ऐसी कोई कमेटी, ग्रुप या डेटा बेस नहीं होता, वहां कैंप लगाए जाते हैं. वॉलंटियर्स को विभिन्न तरीकों से ढूंढ़ा जाता है.

क्या मनुष्यों में live virus डालकर परीक्षण होगा?नहीं! क्योंकि EC ऐसे किसी भी प्रयोग की अनुमति नहीं देती, जिसमें जान को ख़तरा हो. क्योंकि इस वायरस को कंट्रोल करने की कोई दवाई अभी नहीं बनी है. उन बीमारियों में जहां ट्रीटमेंट के विकल्प मौजूद हैं, वहां ऐसा अध्ययन किया जाता है. जैसे- मलेरिया. इसमें भी मलेरिया पैरासाइट की न्यूनतम डोज़ दी जाती है, क्योंकि यदि टेस्टिंग ड्रग काम नहीं करे तो इसका Backup solution है.

वैक्सीन, वायरस से लड़ने में कैसे मदद करती है?वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया में वायरस को deactivate कर दिया जाता है. यानी यह डेड वायरस होता है, इसलिए बीमार नहीं कर सकता. ह्यूमन बॉडी उसे वायरस या बाहरी शत्रु (Foreign element) मानकर उसके खिलाफ एंटीबॉडीज़ डेवलप करती है, जो मनुष्य को live वायरस से लड़ने में सक्षम बनाती है. Virus Mutation से कैसे लड़ा जा सकता है?वायरस में mutation संभव है. उसके कारण नया Strain बन जाता है. Covid 19 के कुछ mutation संभव हैं और यदि mutation significant नहीं है तो वैक्सीन उसके खिलाफ भी काम करेगा. हमारे पास ऐसे उदाहरण भी हैं, जिसमें वैक्सीन बनना संभव नहीं, क्योंकि pathogens निरंतर mutate होते हैं. जैसे HIV में. ध्यान रहे कि एरर फ्री वैक्सीन बनाने का कोई बना-बनाया नुस्खा नहीं होता! जितना भी विज्ञान विकसित हुआ है, हमारे साइंटिस्ट उन मापदंडों पर पूरी सक्षमता और लगन के साथ कार्य करते हैं.

 

लेखक

प्रीति 'अज्ञात' प्रीति 'अज्ञात' @pjahd

लेखिका समसामयिक विषयों पर टिप्‍पणी करती हैं.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय