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Updated: 02 जून, 2015 06:42 AM
नेहा सिन्हा
नेहा सिन्हा
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'आदमखोर' या 'पीडि़त'...

उस्ताद के इर्द-गिर्द जारी बहस के दो ध्रुव इन्हीं दो शब्दों पर टिके हैं. उस्ताद है रणथंबौर का सुनहरी आंखों वाला एक बाघ. जिस पर इल्जाम है  चार लोगों की हत्या का, जिनमें से कम से कम तीन को वह खा चुका है. हाल ही में उसे पकड़कर पिंजरे में डाल दिया गया है. इस कार्रवाई के बाद से सोशल मीडिया पर जंग छिड़ गई है. ऑनलाइन याचिकाएं दायर की गई हैं. सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई है कि उस्ताद, जिसे टी24 भी कहा जाता है, के साथ गलत हुआ है.   एक पक्ष का कहना है कि उस्ताद आदमखोर हो चुका है और रणथंभौर टाइगर रिजर्व को बचाने के लिए इसे अलग कर पिंजरे में डालना ही बेहतर होगा. दूसरे पक्ष का कहना है कि उस्ताद के साथ ऐसा करना उसके 'बाघाधिकार' का हनन होगा.

उस्ताद की पुरानी तस्वीरों को देखें तो वह प्रकृति का एक नायाब हिस्सा मालूम होगा. टूरिस्टों के कैमरों में उस्ताद के चौड़े कंधे, सुनहरी आंखें, औंघाई चाल और 'बाघशाहत' हमेशा से शाही रही थीं. फिर अचानक से ऐसा क्या हो गया कि शांत रहने वाला जानवर न सिर्फ हत्यारा बन बैठा बल्कि आदमखोर भी हो गया?

जंगल में या इसके बाहर, बाघ जब भी इंसान को देखते हैं तो लगता है नजरों से ही वे आपको कैद कर लेंगे. हालांकि इस 'नजर' के बाद वो अपनी राह चल देते हैं और इंसानों से दूरी बनाए रखते हैं. यह आप पर हमला नहीं करते हैं. क्या कभी सोचा है कि हम इंसानों को बाघ इतने क्यों लुभाते हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि बाघ कई मायनों में मानवीय संवेदनाओं के करीब होते हैं. बाघिन को अपने शावकों से काफी लगाव होता है और जीवन के अंत तक उसकी रक्षा करती हैं. बाघ की आंखें, भौहें, चेहरे की बनावट और उसके ऊपर काली पट्टी इंसानों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं. इन सब के बावजूद वह इंसानों से उतना ही घुलते-मिलते हैं, जितनी उनकी सहन की क्षमता होती है. शायद यही वजह है कि इनकी लड़ाई, गर्जना, अपने इलाके का निर्धारण आदि इंसानी बस्तियों सा नहीं बल्कि बड़ा ही जंगली होता है.     

तो आखिर उस्ताद ने क्यों अपनी ही बनाई दुनिया की लकीरों को लांघा? और लांघा भी तो कैसे लांघा? दरअसल दूसरा प्रश्न प्रासंगिक है. रणथंभौर टाइगर रिजर्व दुनिया के बेहतरीन रिजर्व में से एक है. उसी हिसाब से पर्यटक भी बड़ी तादाद में आते हैं. सूत्रों की मानें तो कुछ पर्यटक बाघों के ज्यादा ही नजदीक चले जाते हैं. जाहिर सी बात है ऐसे पर्यटन स्थल में शावकों की परवरिश पर्यटकों के बीच ही होती है. इनके इलाके तय होते हैं, इन्हें होने वाले रोगों का रिकॉर्ड रखा जाता है (वन विभाग के डॉक्टर इनका इलाज भी करते हैं). ऐसे चिर-परिचित माहौल में उस्ताद का एक नहीं बल्कि चार बार सीमा को लांघ जाना, सवाल खड़े करता है.

उस्ताद के पक्ष में आवाज उठाने वाले उसके जंगली प्रवृति की रक्षा की गुहार लगा रहे हैं, कुछ उसे उसके परिवार से अलग कर देने जैसे मुद्दों को रख रहे हैं. इन सब का कारण भी है. जब उस्ताद को पकड़ा गया तो गुस्से में उसने खाने से मना कर दिया. गुस्सा इतना कि वह पिंजरे में अपने सिर को भी मार रहा था. जंगल में, खुले में विचरने वाले शाही जानवर को पिंजरे में कैद करना निश्चित ही उसके जीवन के लिए अंतिम पीड़ा साबित हुई होगी.              

उस्ताद के पक्ष में बात रखने वालों को मैं एक पक्ष दिखाना चाहती हूं: उस्ताद को कैद कर अलग कर देने से रणथंभौर के दूसरे बाघों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा. ऐसा क्यों इसे समझने की जरूरत है. उस्ताद ने वन विभाग के दो गार्डों को मार दिया था. उसने उन्हें मारा, जिन्होंने सारी उम्र उस्ताद की और उस्ताद जैसों की शिकारियों से रक्षा की. फॉरेस्ट गार्ड बहुत आरामतलबी वाली जिंदगी नहीं जीते हैं. इनकी नौकरी में कोई तय घंटे नहीं होते, नौसैनिकों की ही तरह इन्हें भी कई तरह की बीमारियों का खतरा रहता है. पीने लायक साफ पानी की कमी के कारण इन्हें वेक्टर-जनित रोगों से भी लड़ना पड़ता है. पर्यटकों की तरह खराब मौसम, बारिश, तेज धूप का बहाना कर ये खुद को टेंटों में छुपा नहीं सकते. इन सबके ऊपर, अत्याधुनिक हथियारों से लैस शिकारियों से भी इन जंगली जानवरों की रक्षा का जिम्मा भी ये फॉरेस्ट गार्ड ही उठाते हैं.          अगर हम यह सवाल करते हैं कि उस्ताद ने क्यों मारा, तो साथ ही हमें यह सवाल भी करना चाहिए कि क्यों इतनी समर्पित फौज रणथंभौर से उसे दूर रखने का आग्रह कर रही है. समझना एकदम आसान है. यहां मौजूद फॉरेस्ट गार्डों को यह अहसास हो गया है कि उस्ताद ने अपने शिकार के लिए लोगों को चुना. सामान्यतः इंसानों से खुद को दूर रखने वाले बाघों की प्रवृति अब उस्ताद पर फिट नहीं बैठती है. यह तर्क शायद पूर्वाग्रही लगे, पर इससे भी ज्यादा पूर्वाग्रही यह है कि उस्ताद को सुधारा नहीं जा सकता है.      

और अंत में, सबसे अहम सवाल - एक आदमखोर, इंसान को क्यों मारता है - न्यायसंगत बात करें तो यह सवाल पूछा ही नहीं जाना चाहिए. यह तो मानव-संबंधी सवाल है. हम अपने बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, आचरण और आदर्श की सीख देते हैं. किसी दूसरे से जबरदस्ती कुछ ले लेना गलत है, और जीवन लेना तो पाप बताया जाता है. यह अक्षम्य बताया जाता है. लेकिन क्या हम एक जंगली जानवर से भी ऐसी ही नैतिकता की उम्मीद कर सकते हैं? क्या हम उनसे हत्या या आक्रमण के लिए अपराध बोध वाले भाव की उम्मीद लगा सकते हैं? इस संदर्भ में एक आदमखोर को 'हत्यारा' कहना सोच के भटकाव को दर्शाता है. इसी नजरिये से, जब कोई बाघ शिकारी जानवर और शिकारी इंसान के बीच की दीवार को गिराता है तो हमें भी कम से कम तमाशे के साथ इसे हटाने की जरूरत है.     

उस्ताद के आस-पास घूम रही कहानी और उससे इत्तेफाक रखने वाले लोग एक संकेत देते हैं कि हम बाघों के लिए सोचते हैं. लेकिन मानवता की कीमत पर बाघ का पक्ष नहीं रखा जा सकता है. उस्ताद को जैसे हत्यारा कहना उचित नहीं है, ठीक वैसे ही उसकी जंगली प्रवृति की रक्षा के नाम पर हम और इंसानी जानों की बलि नहीं चढ़ा सकते हैं. 'उसने ऐसा क्यों किया' की जगह हमें इस घटना से संबंधित परिस्थिति पर सवाल उठाने होंगे. सवाल है कि किन परिस्थितियों में एक जंगली जानवर की परवरिश होती है - इंसानों से घिरे, पालतू पशुओं और जीप में सवार लोगों से घिरे. उस्ताद की कीमत पर ही सही, हमें रणथंभौर के व्यस्त पर्यटन, आस-पास के गांव वालों के दबाव से उपजी समस्या को खंगालना होगा. जंगली जानवरों से ज्यादा नजदीकी न उनके लिए उत्तम है, न हमारे लिए सही... उस्ताद की कीमत पर ही सही, हमें यह भी समझना होगा.

लेखक

नेहा सिन्हा नेहा सिन्हा @neha.sinha.3363

लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण शिक्षा विभाग में गेस्ट फैकल्टी हैं

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