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Updated: 26 जुलाई, 2019 04:21 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
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लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान आजम खान ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी थीं जब उन्होंने जयाप्रदा के अंडरवियर का रंग पब्लिक को बताया था. उस वक्त हमारी जनता के सामने एक नेता का व्यक्तित्व चीख चीखकर कह रहा था कि वो आखिर किस तरह का इंसान है. जनता के सामने उन्हें चुनने और न चुनने का पूरा अवसर था. लेकिन जनता ने उन्हें जिताकर संसद भेज दिया.

लेकिन महिलाओं का अपमान करने की गंदी आदत से मजबूर आजम खान संसद में भी अपनी हरकत से बाज नहीं आए. लोकसभा में तीन तलाक बिल पर चर्चा के दौरान सांसद आजम खान ने बीजेपी सांसद रमा देवी पर एक टिप्पणी की. उन्होंने अपनी बात शुरू करने से पहले कहा- ‘तू इधर-उधर की ना बात कर…ये बता के काफिला क्यों लुटा...’. इसपर रमा देवी ने कहा कि- 'आप भी इधर (यानी स्पीकर को) देखकर बात कीजिए, उधर मत देखिए.' तब आजम खान ने कहा- ''मैं तो आपको इतना देखूं कि आप मुझसे कहें कि नजर हटा लो. मुझे तो आप इतनी अच्छी लगती हैं कि आपकी आंखों में आंखें डाले रहूं ये मेरा मन करता है.''

azam khanआजम खान के लिए महिला अपमान कोई नई बात नहीं है

ये टिप्पणी बिलकुल वैसी थी जैसे कोई सड़कछाप छिछोरा किसी लड़की को छेड़ने के लिए कहता है. जैसे सोशल मीडिया पर कोई शख्स किसी लड़की की टाइमलाइन पर आकर लिख देता है. वो जिसे लड़की का भाई सुन ले तो मार-पीट हो जाया करती है. न ही ये बात ऐसी थी कि कोई भाई अपनी छोटी बहन के लिए कहता हो, जैसा कि आजम खान बार बार बोल रहे थे.

इसपर सदन में हंगामा होना वाजिब था. हुआ भी. और आजम खान से माफी मांगने की मांग की गई. मगर उन्होंने कह दिया कि उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा, अगर कोई भी बात मर्य़ादा के खिलाफ बोली है तो वो अपने इस्तीफे का ऐलान कर देंगे. मगर बेशर्मी इतनी कि माफी नहीं मांगी उल्टा सदन छोड़कर चलते बने. इसके बाद से ही आजम खान पर बहस हो रही है और अगले दिन संसद में सारी महिला सांसदों का गुस्सा उनपर फूटा और उन्हें संसद से बर्खास्त करने की मांग की गई. निंदा प्रस्ताव पारित किया गया.

आजम खान को सदन से बर्खास्त क्यों किया जाना चाहिए

आजम खान इस्तीफा दे उससे पहले उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए. इस्तीफा देना व्यक्ति की अपनी मर्जी होती है और बर्खास्त करना सजा. आजम सिर्फ सजा के हकदार हैं. मुझे याद है यूपी पुलिस का एंटी रोमियो स्कॉड महिलाओं से छेड़छाड़ करने वाले मनचलों को रेड कार्ड देता है जो उनके लिए पहली चेतावनी होती है, अगर दूसरी बार उन्हें इस तरह की हरकत करते पकड़ा जाता है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है. लेकिन आजम खान के मामले में तो ये भी नहीं कहा जा सकता कि पहली बार गलती हुई है, वार्निंग देकर छोड़ देना चाहिए. आजम खान का तो इतिहास ही रहा है महिलाओं से अभद्रता करने का. और हर बार वो अपनी भद्दी टिप्पणियों पर सफाई दे देते हैं लेकिन माफी कभी नहीं मांगते. जयाप्रदा मामले में भी उन्होंने कहा था कि उन्होंने ये जया प्रदा के लिए नहीं कहा क्योंकि उन्हेंने उनका नाम नहीं लिया था. हां सड़क पर छेड़खानी करने वाले मनचलों को भी कहां किसी महिला का नाम मालूम होता है, वो तो अश्लील टिप्पणी करके चलता बनता है.

संसद की अस्मिता दाव पर

अगर आजम खान को सजा नहीं मिली तो वो इन सभी मंनचलों को सही साबित करेंगे. और उनके हौसलों को बल देंगे. इन्हें सजा न देकर देश की सबसे गरिमामय संसद पर भी सवाल खड़े होंगे क्योंकि संसद का ये कदम ही समाज को सबक दे सकता है. अगर आजम खान की इस हरकत को भी नजरअंदाज करके बात आई गई कर दी गई तो ये किसी भी सूरत में संसद की गरिमा के लिए अच्छा नहीं होगा.

अगर सजा नहीं हुई तो ये तो मामला तो आजम खान के ही पक्ष में जाएगा और ये सिद्ध होगा कि वो सही थे. संसद का कार्रवाई न करना संसद को भी अखिलेश यादव के समकक्ष लाकर खड़ा कर देगा. वो अखिलेश जो ऐसे मामलों में हमेशा आजम खान का उसी तरह बचाव करते हैं जैसा बिगड़ैल मनचलों के मां-बाप करते हैं. अपने बच्चे की गलत हरकत पर भी सफाई देते फिरते हैं कि इसका कहने का मतलब ये नहीं था...वो नहीं था.

समाज का रुख भी समझिए

आजम खान की पत्नी जो समाजवादी पार्टी की नेता और राज्यसभा सदस्य हैं वो आज हमारे उसी समाज का प्रतिनिधित्व कर रही हैं जो इस तरह की हरकतों को गलत मानता ही नहीं है. खासकर तब जब मामला अपने ही घर का हो. लोकसभा चुनाव के दौरान आजम खान के बेटे अब्दुल्ला खान ने भी जया प्रदा को अनारकली कहा था- 'हमें अली भी चाहिए, बजरंगबली भी चाहिए लेकिन अनारकली नहीं चाहिए'. तब भी तजीन अच्छी मां बनकर अपने बेटे के बचाव में उतरीं और कहा कि ये 'यह बयान महिलाओं के खिलाफ नहीं है.

आज भी वो अच्छी पत्नी बनकर अपने पति के बचाव में खड़ी हैं. और कह रही हैं कि- 'उन्होंने गलत कहा ही नहीं तो क्यों माफी मांगे. और संसद में विरोध कर रही महिलाएं तो राजनीति में अपनी सक्रियता दिखा रही हैं. अगर वो उन्हें बहन कह रहे हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं हैं. जयाप्रदा मामला भी एक साजिश था जिससे आजम खान चुनाव हार जाएं. उर्दू भाषा में मिठास ज्यादा ही घुली हुई है औऱ वो अच्छी उर्दू बोलते हैं, वो अच्छे वक्ता हैं और इसीलिए लोग नहीं चाहते कि वो संसद में बोलें.'

हमारा समाज कब गलत को गलत कहेगा. और हर गलत को सही ठहराने की समाज की पुरानी आदत कब तब स्वीकारी जाती रहेगी. महिला होकर भी महिलाएं ये भूल जाती हैं कि कल को उनकी बेटी के साथ भी अगर ये होगा तो वो उसे कैसे सही कहेंगी. अच्छी पत्नी, अच्छी मां के अलावा भी वो कुछ हैं, कम से कम एक महिला होने का ही मान रख लेतीं. 

azam khanकब तक गलत का सही करते रहेंगे आजम का बचाव करने वाले

समय ज्ञान देने का नहीं सजा देने का है

लोकसभा के माननीय स्पीकर ने तो मामला उसी वक्त ये कहकर खत्म करने की कोशिश की थी कि हर सदस्य को संसद की गरिमा बनाकर रखनी चाहिए. वो उन लोगों को नैतिक मूल्य सिखा रहे थे जो लोग समाज के लिए कानून बनाते हैं. लेकिन सवाल ये कि ये ज्ञान आखिर कब तक दिया जाता रहेगा. समाज को भी पता होता है कि ये गलती है और इसकी सजा है, और इसी डर से व्यवस्था बनी रहती है. इसलिए अब समय ज्ञान देने का नहीं, सजा देने का है. सामान्य ज्ञान और नैतिकता का ज्ञान को बचपन से मिल ही रहा है न.

हैरानी हुई ये देखकर कि देश की संसद को भी आजम खान ने ये समझ लिया कि वहां मुशायरा हो रहा है और वो कलाम पढ़ रहे हैं. लेकिन ये देखकर खुशी होगी अगर संसद उन्हें मर्यादा न समझाकर ये बताए कि गलत आखिर गलत होता है, चाहे वो कोई आम आदमी करे या फिर लोकसभा का सांसद. वो हर बार छूट नहीं सकते.

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लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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