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 |  4-मिनट में पढ़ें  |   06-11-2018
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#Metoo मूवमेंट अब भारत में लोगों की समझ में आने लगा है. तनुश्री दत्ता का मामला जब से सामने आया है तब से ही देश में #Metoo के कई किस्से सामने आ चुके हैं. लोग सेक्शुअल हैरेस्मेंट को लेकर जागरुक हो रहे हैं. पर इस मूवमेंट के शुरू होने से पहले ऐसे कितने लोग थे जिन्होंने अपनी आवाज़ तो उठाई, लेकिन कुछ हुआ नहीं और तो और उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई. असम की एक महिला IPS अफसर के साथ जो घटना हुई थी वो मीटू मूवमेंट के काफी पहले ही हो गई थी. उन्होंने अपनी आवाज़ भी उठाई थी, लेकिन उन्हें उसका परिणाम जो देखने को मिला वो बेहद खतरनाक था. हाल ही में लीना डोले ने अपने फेसबुक अकाउंट पर अपनी आप बीती लिखी और लीना की पोस्ट वायरल हो गई.

लीना ने अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा-

'मैं भी कार्यस्थल पर सेक्शुअल हैरेस्मेंट की सर्वाइवर हूं.

मार्च 2012 में मेरे एक सीनियर IPS मुकेश अग्रवाल जो अब असम, गुवहाटी के ADGP हैं उन्होंने मुझे अपने साथ छुट्टी पर चलने को कहा. ये मेरे बेहतरीन काम करने के एवज में था.

मैंने साफ तौर पर मना कर दिया और न्याय का सहारा लेने की सोची. मैं अपने बॉस के साथ छुट्टी पर नहीं जाना चाहती थी. मैंने सीधे मना कर दिया. उसके बाद बहुत कुछ बदल गया. मुकेश अग्रवाल के खिलाफ मैंने लिखित शिकायत दर्ज की थी.

लंबी स्टोरी को शॉर्ट में मैं बताना चाहती हूं कि उसके 6 महीने बाद मेरे पति ने आत्महत्या कर ली. इसके बाद इन्क्वाइरी अफसर एमिली चौधरी (IAS) मेरे घर आईं उन्होंने मुझे बताया कि ये मेरी शिकायत की वजह से नहीं हुआ कि मेरे पति ने आत्महत्या कर ली है. पर मैं उस समय कुछ न कह पाई. मैं कुछ कहने की हालत में नहीं थी. उसके बाद भी जांच शुरू नहीं हुई.

मेरे केस को एक गलतफहमी कहकर नकार दिया गया, जब्कि गुनाह करने वाले ने खुद ये कबूल कर लिया था. गुनहगान ने मुझसे कहा था कि मैं उसके साथ छुट्टी पर जाऊं और अपने पति को इस बारे में न बताऊं. गुनहगार की पत्नी ने भी मेरे खिलाफ मानहानी का दावा ठोंका क्योंकि उसके पति को मैंने बदनाम करने की कोशिश की. मैंने अपने केस के खिलाफ एक रिव्यू याचिका दायर की.

मैं हाईकोर्ट से केस जीत गई. मुझे किसी भी तरह की मुक्ति का अहसास नहीं होता सिर्फ और सिर्फ ये संतोष है कि सेक्शुअल हैरेस्मेंट करने वाले लोगों के खिलाफ अगर केस करें तो कोई संतोषजनक नतीजा मिलेगा.

Leena Doleyलीना के साथ हुई घटना ने उनके अतीत पर ऐसा गहरा घाव किया है, जिसे भुला पाना उनके लिए मुश्किल है.

लेकिन मुझे किसी तरह का कोई न्याय नहीं मिला उस शिकायत के लिए जो मैंने की थी. मेरे पति ने आत्महत्या कर ली, मैं अपना केस और अपने पति दोनों को हार गई. मेरे दो साल और 6 साल के दो बच्चों के पिता उनसे छिन गए.

जांच कमेटी ने अपना निश्‍कर्ष गलतफहमी के तौर पर निकाला. मैं जानती हूं कि मेरी कहानी के बाद कोई भी इतनी हिम्मत नहीं करेगा कि वो सरकारी ऑफिसों में अपनी कहानी सामने लाए. मैं केस जीतकर भी हार गई. मैं हार का सीधा साधा उदाहरण हूं.

लेकिन फिर भी बाकी सब जो #Metoo के लिए अपनी आवाज उठा रहे हैं वो सही हैं. वो हमारी प्रेरणा हैं. शक्ति हैं.

मैं ये भी सोच रही हूं कि मेरे साथ एक तरह की रिस्पॉन्सिबिलिटी है कि मैं अपने साथ हुई घटना की जानकारी दूं कि गुवहाटी हाईकोर्ट के जजमेंट के मुताबिक अगर किसी शिकायत की जांच पूरी नहीं हुई है तो मानहानी का दावा खारिज हो जाता है. '

लीना डोले ने जिस तरह अपनी बात रखी उसे देखकर लगता है जैसे उनके साथ अन्याय हुआ था और भले ही कोर्ट ने उनके हक में फैसला दिया हो, लेकिन फिर भी एक तरह से तो लीना हार गईं. उन्होंने न सिर्फ अपना पति खो दिया बल्कि उन्होंने अपने सम्मान और अपनी जिंदगी के अहम साल खो दिए. किसी भी मामले में अगर विक्टिम के साथ ऐसा होता है तो उसे किसी का भी साथ नहीं मिलता तो उसका मनोबल टूट जाता है. इसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए कि कोई अपने साथ हुई गलत बात के लिए आवाज उठाए, लेकिन सालों बाद भी अगर उसे किसी तरह का कोई संतोष न मिले तो जीना दूभर सा लगने लगता है.

यही तो होता है हमारे देश में सेक्शुअल विक्टिम के साथ उन्हें न सिर्फ इस बात के लिए कोसा जाता है कि वो क्यों सही समय पर अपनी बात नहीं रखी लेकिन इतने सारे विक्टिम सामने आ रहे हैं जिन्होंने अपनी बात तो सामने रखी, लेकिन कुछ हुआ नहीं. अगर हम अपने देश में किसी कमेंट को सेक्शुअल हैरेस्मेंट नहीं समझते हैं, या फिर बॉस द्वारा की गई हरकत को सही समझते हैं तो ये हमारे समाज की गलती है.

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