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Updated: 22 सितम्बर, 2018 02:54 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
  @parulchandraa
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट के तीन तलाक पर अध्‍यादेश को मंजूरी देने के बाद से मुस्लिम समाज के मर्द बड़े खफा-खफा से हैं. वो भी क्या करें, अब तक जरा सी बात पर तुनककर औरत को तलाक-तलाक-तलाक कहकर ठुकारने वालों के हथियार- ये तीन शब्द अब मायने जो नहीं रखते.

मुस्लिम समाज में औरतों के हालात अब तक ऐसे क्यों रहे इसका जवाब आपको ये दो वीडियो दे रहे हैं. इसमें अल्लाह के रसूल का नाम लेकर एक मौलवी लोगों को ज्ञान दे रहा है. और बता रहा है कि-  

''अगर कोई औरत नमाज़ पढ़ती है, कुरान पढ़ती है और रोजे भी रखती है, सारी नेकियां करती है लेकिन उसका शौहर उससे नाराज़ है तो ऐसे में अगर औरत को मौत आ जाए तो वो जहन्नुम में जाएगी.''  

''अगर कोई औरत तंदूर पर रोटी डाल चुकी हो और उसका शौहर अपनी जरूरत के लिए उसे बुलाए, औरत न कह दे और शौहर नाराज हो जाए तो जबतक वो शौहर को नहीं मनाएगी तब तक अल्लाह और उसके फरिश्ते उसपर लानतें बरसाएंगे. उसी हालत में उसे मौत आ गई तो वो जहन्नुम में जाएगी.''

''अगर किसी के शौहर के जिस्म में फोड़े फुंसी हो जाएं और उनमें पीप निकल रहा हो और उसकी बीवी उसे जबान से चाट-चाटकर साफ करे तो भी बीवी अपने शौहर का हक अदा नहीं कर सकती.''

ये शब्द जिस मजबूती और प्रभावशाली तरह से बोले जा रहे हैं...वो पहली बार नहीं है. जाहिर है अपने धर्म में महिलाओं को किस तरह रखना है उसके लिए इसी तरह के भाषण धर्म प्रचारक सालों से देते आ रहे होंगे. मौलवी के इन शब्दों में रसूल देखने वाले लोगों के दिमागों पर इन विचारों ने क्या असर किया होगा वो आप मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को देखकर अंदाज़ा लगा ही सकते हैं.

महिलाओं की स्थिति हमारे समाज में ऐसी ही है, बस फर्क इतना है कि इसलाम में कट्टरता थोड़ी ज्यादा है. वरना औरत के लिए समाज ने यही निर्धारित किया हुआ है कि उसका अपना अस्तित्व तो कुछ है ही नहीं. उसके लिए उसका पति ही सबकुछ है. पति ही उसका परमेश्वर है इसलिए अच्छी औरत वही है जो अपनी हर खुशी अपने पति पर कुर्बान कर दे.

और जो ऐसा नहीं करतीं, इसकी नाफरमानी करती हैं, वो जहन्नुम जाती हैं. और जहन्नुम तो कोई जाना नहीं चाहता. लेकिन कमाल तो ये है कि ''रसूल ने जहन्नम में सबसे ज्यादा औरतों को देखा. क्योंकि औरतें अपने शौहरों की नाशुक्री हुई थीं.'' मतलब किस्से कहानी भी बनाए तो ऐसे जिसमें महिलाओं को जहन्नुम लायक ही बताया गया. और जहन्नुम जाने से तभी बचेंगी जब पति को खुश रखेंगी. यानी पति जो कहे वो करें, जब जरूरत पूरी करने को कहे तब करें. उसे न किसी कीमत पर न बोलें. और न करें तो तलाक-तलाक-तलाक!!

muslim-women_092118050630.jpgअच्छी औरत वही है जो अपनी हर खुशी अपने पति पर कुर्बान कर दे, क्या सच में?

औरतों को नाशुक्री कहने वालों, जरा ये तो बताओ कि क्या तुम इस लायक हो कि एक औरत का कर्ज उतार सको? न तो मां का कर्ज उतार सकते जो तुम्हें इस दुनिया में लाई और न अपनी बीवी को जो तुम्हारी औलाद को इस दुनिया में लाई. मेरी मानो तो औरत की जगह एक रोबोट ले आओ, जो किसी काम के लिए न ही न कर सके. और करे तो तलाक भी सुन ले बिना चूं किए. रही बात 'जरूरतों' की तो आजकल तो हर तरह के रोबॉट्स मिल रहे हैं बाजार में. 

हालत देखिए इस समाज की कि तीन तलाक से महिलाओं को आजादी दिलाने के बावजूद भी लोगों का ये कहना है कि ये अध्यादेश महिलाओं के खिलाफ है. समाज के पढ़े-लिखे नेता भी कौम की आवाज बने हुए हैं और तीन तलाक को जायज बता रहे हैं, फायदे भी गिनवा रहे हैं. समाजवादी पार्टी के नेता अबू आज़मी ने तो यहां तक कह डाला कि "वे महिलाएं बीजेपी के तलवे चाटने वाली महिलाएं है. ये बिकाऊ महिलाएं है इनमें से कई तो नकली मुसलमान हैं."

हद तो तब होती है जब मुस्लिम महिलाएं खुद इसकी खिलाफत पर उतर आती हैं. कुछ पढ़ी-लिखी महिलाओं को छोड़ दें तो ज्यादातर महिलाओं को तो ये भी समझ नहीं आता कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है. क्योंकि समाज ने उनकी कंडिशनिंग ही इसी तरह की हुई है कि अगर कोई आदमी उनसे शादी करता है तो उनपर अहसान करता है, उनके बारे में सोचने और फैसला लेने का हक उनका अपना नहीं बल्कि उनके आका यानी उनके शौहर का है.

सरकार चाहे कोई भी हो, अगर महिलाओं के हित में वो कोई निर्णय लेती है तो वो आने वाले बेहतर कल की उम्मीद होती है. और जब ऐसी उम्मीदें दिखाई देने लगती हैं तो पितृसत्ता में खलबली तो मचती है. जो भी हो, वीडियो महिलाओं को तो खूब हंसाएगा.

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लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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