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Updated: 05 नवम्बर, 2019 04:42 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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महाराष्ट्र चुनाव नतीजे (Maharashtra Assembly Election Results) आए 12 दिन बीत चुके हैं, लेकिन वहां कोई भी अपनी सरकार नहीं बना सका है. शुरुआत में तो यूं लगा था कि भाजपा-शिवसेना का गठबंधन ही सरकार बनाएगा, क्योंकि उनके गठबंधन को बहुमत मिला है, लेकिन शिवसेना की मांगों के आगे भाजपा झुकने को तैयार नहीं है. वहीं दूसरी ओर शिवसेना (Shiv Sena) इस कोशिश में भी लगी है कि वह कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन (Congress-NCP) के साथ मिलकर सरकार बना ले. लेकिन अभी तक महाराष्ट्र की सियासत में जो कुछ चल रहा है, उसे देखकर ये साफ हो रहा है कि ना तो भाजपा ना ही कांग्रेस-एनसीपी, दोनों ही शिवसेना के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं. आपको बता दें कि शिवसेना चाहती है कि महाराष्ट्र में भाजपा के साथ गठबंधन वाली सरकार में कम से कम आधे समय यानी ढाई साल शिवसेना का मुख्यमंत्री (Aaditya Thackeray) हो, जबकि भाजपा ये मानने को तैयार नहीं है. वैसे विपक्ष (कांग्रेस-एनसीपी) के पास ये मौका है कि वह शिवसेना के साथ मिलकर भाजपा का विजय रथ रोक दे, लेकिन विपक्ष अब ये बात समझ चुका है कि सिर्फ भाजपा का विजय रथ रोकने भर से कुछ नहीं होगा. इस समय जरूरत है जनता का विश्वास जीतकर उसका वोट हासिल करने की और भाजपा को खुलेआम करारी शिकस्त देने की.

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव, कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेनाकांग्रेस फिलहाल शिवसेना के साथ सरकार बनाने में पुराने अनुभवों की वजह से डर रही है.

कर्नाटक ने आंखें खोल दीं !

15 मई 2018 के बाद कर्नाटक (Karnataka) में एक नाटक शुरू हुआ था, कुछ वैसा ही नजारा इन दिनों महाराष्ट्र का है. कर्नाटक में मतगणना के बाद पता चला कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जैसी स्थिति महाराष्ट्र में है. तब कांग्रेस और जेडीएस ने साथ मिलकर सरकार बना ली और भाजपा का विजय रथ रोक दिया. लेकिन ये सब ज्यादा दिन तक नहीं चल रहा. 15 महीने बाद ही कर्नाटक की सरकार गिर गई और सत्ता भाजपा के हाथ जा पहुंची. इन 15 महीनों में भी कांग्रेस-जेडीएस में अनबन होती रही. जनता को भी कांग्रेस का जेडीएस के साथ जाकर सरकार बनाना पसंद नहीं आया. कम से कम कांग्रेस ने तो कर्नाटक से सबक ले लिया है. शायद तभी इस बार उनकी ओर से भाजपा का विजय रथ रोकने की कोशिशें नहीं हो रही हैं.

भाजपा का विजय रथ एक-दो बार रोका जा सकता है वो भी एक-दो राज्यों में, लेकिन पूरे देश में सत्ता पर वापस काबिज होने के लिए कांग्रेस को आगे की सोचनी पड़ेगी. कहते हैं ना कि आगे निकलना है तो तेज दौड़ो, आगे वालों को पीछे खींच-खींच के रेस नहीं जीती जाती. वैसे भी, कर्नाटक का अनुभव कांग्रेस को कई सबक दे गया, लेकिन अगर बावजूद इसके वह शिवसेना की मांगें मानकर सरकार बनाने को राजी हो जाती है तो इसका भी अंजाम बुरा भी हो सकता है.

आदित्य ठाकरे को सीएम बनाकर नुकसान हो सकता है !

एक बात, जिसे हर कोई समझता है, वो ये कि आदित्य ठाकरे (Aaditya Thackeray) अभी इतने काबिल नहीं हैं कि वह सरकार चला सकें. 30 साल से भी कम के आदित्य ठाकरे को अगर कांग्रेस-एनसीपी ने या फिर भाजपा ने ही महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज कर दिया और अनुभव न होने की वजह से कुछ ऊंच-नीच हो गई तो पब्लिक का गुस्सा अगले चुनाव में झेलना पड़ सकता है. ऐसे में सिर्फ एक राज्य की सत्ता में आने के चक्कर में कोई भी अपना नाम नहीं खराब करना चाह रहा. वैसे इस रिस्क से उद्धव ठाकरे भी वाकिफ हैं, लेकिन वह सिर्फ शिवसेना की धमक को वापस पाने की कोशिश में हैं, ताकि महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर वह बड़े भाई की भूमिका में आ सके.

जनादेश का पालन बहुत जरूरी है

कहते हैं जनता सबसे ऊपर है, क्योंकि जनता ही तय करती है कि सत्ता किसके हाथ देनी है. इसे ही तो कहते हैं वोट की पावर. अब अगर जनता ने महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन को जिताया है, तो दोनों को चुपचाप सरकार बनानी चाहिए. विपक्ष के लिए जनता ने कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन को चुना है. अब अगर कर्नाटक की तरह विपक्ष जनादेश के खिलाफ जाकर सरकार बना भी ले, तो उसकी उम्र बड़ी नहीं होगी.

अब कांग्रेस सिर्फ भाजपा का विजय रथ रोकने के चक्कर में नहीं है. अब वह छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसी जीत चाहती है, जिसमें भाजपा को करारी शिकस्त मिले और वह विजेता की तरह सामने आए. जनादेश का पालन हो, ताकि सरकार भी चले और छवि भी सलामत रहे. महाराष्ट्र में एक बार फिर कांग्रेस के सामने वही स्थिति है. कंफ्यूजन भी बहूत हैं और दबाव भी बेशक होंगे. कांग्रेस के कार्यकर्ता चाहते होंगे कि वह शिवसेना से हाथ मिला लें, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता इसका नुकसान भी अच्छे से समझते होंगे. हाल ही में दिल्ली में सोनिया गांधी और शरद पवार की मीटिंग भी हुई थी. उम्मीद जताई जा रही थी कि इससे कुछ निकल कर आएगा, लेकिन अभी तक स्थिति जस की तस है. उधर फडणवीस भी अमित शाह से मिले हैं, वह भी कोई न कोई रणनीति बना ही रहे होंगे. देखना दिलचस्प रहेगा कि इस बार विपक्ष क्या तय करता है, शिवसेना के साथ जाना, या उसके खिलाफ विपक्ष में बैठकर जनादेश को मानना.

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