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सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   06-12-2017
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ये मौजूदा राजनीति का तकाजा है कि हर चुनाव को आम चुनाव की तरह लिया जाने लगा है. यूपी के निकाय चुनाव को योगी आदित्यनाथ ने वैसे ही लिया जैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह विधानसभा चुनाव की ही तरह दिल्ली के एमसीडी चुनाव को भी गंभीरता से लेते हैं. मोदी और शाह की जोड़ी की तरह ही योगी और महेंद्र नाथ पांडेय निकाय चुनाव में प्रचार के लिए वॉर्डों तक पहुंचे.

हालत ये रही कि जो निकाय चुनाव अब तक स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते रहे, इस बार अयोध्या और हिंदुत्व के नाम पर ध्रुवीकरण के बीच उलझ गये. वैसे योगी को यूपी की कुर्सी पर बिठाने का बीजेपी का मकसद भी तो यही था. तभी तो बरेली में एक बीजेपी विधायक ने निकाय चुनाव को राम और बाबर के बीच की जंग बता डाली.

हैरानी की बात ये है कि कांग्रेस को बीजेपी जिस जाल में फंसाना चाहती है वो अपनेआप उसमें फंसती दिख रही है. लिहाजा राहुल गांधी का सॉफ्ट हिंदुत्व सिर्फ मंदिरों के चक्कर लगाने तक ही सीमित नहीं, अब तो कांग्रेस उन्हें जनेऊधारी भी बताने लगी है. अयोध्या पर फैसला टाले जाने की मंशा तो यही बताती है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर बहुत डरी हुई है, लेकिन ऐसा क्यों है?

डर तो बीजेपी को भी लगता है, लेकिन...

यूपी में हुए निकाय चुनाव के नतीजों को बीजेपी जिस तरीके से पेश कर रही है, वो आंकड़ों की कसौटी पर आधा सच ही साबित होते हैं. आंकड़े बताते हैं कि निकाय चुनाव में बीजेपी के 45 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी. बीजेपी उम्मीदवारों को 2,366 सीटों पर जीत मिली और 3,656 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी. ऐसे देखें तो जीती हुई सीटों के मुकाबले हारी हुई सीटों की तादाद कहीं ज्यादा है. चुनाव में गोरखपुर से लेकर वाराणसी तक कई अहम सीटें ऐसी भी रहीं जहां बीजेपी को मुहंकी खानी पड़ी है.

ram temple workshopअयोध्या पर फोकस बीजेपी...

ये सब तब हुआ है जब योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में दिवाली का भव्य आयोजन किया और चुनाव अभियान की शुरुआत भी वहीं से की - मौके की नजाकत को समझते हुए मथुरा को भी चुनाव अभियान का हिस्सा बनाया. अगर आने वाले दिनों में अयोध्या के साथ साथ मथुरा को भी वैसे ही पेश किया जाये तो हैरानी नहीं होनी चाहिये.डर तो बीजेपी को भी लगता है. अगर ऐसा न होता तो मोदी और शाह के गुजरात में बीजेपी को सारी ताकत झोंकने की जरूरत क्यों पड़ती? यूपी में चुनाव जीतने वाले मेयरों की ड्यूटी भला गुजरात में क्यों लगायी जाती? पहले पूरी कैबिनेट और फिर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्हीं गुजरातियों से इस कदर वोट क्यों मांगना पड़ता जिनके बूते वो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंच पाये?

अयोध्या मसला असरदार तो है, मगर कितना...

यूपी में निकाय चुनाव के दौरान ही उडुपी में धर्म संसद का आयोजन हुआ जिसमें अयोध्या का मसला उठा. उडुपी में दो नाम खास तौर पर चर्चा में रहे - एक मोहन भागवत और दूसरे श्रीश्री रविशंकर. मंदिर निर्माण पर दावे के साथ ही संघ प्रमुख भागवत ने आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री को खूब खरी खोटी भी सुनायी. नतीजा ये रहा कि श्रीश्री ने धर्म संसद में भाग लेने का अपना कार्यक्रम तक रद्द कर दिया. श्रीश्री अयोध्या मसला सुलझाने के लिए आगे बढ़े थे लेकिन आज तक के स्टिंग ऑपरेशन के बाद पैसे के लेन देने की बात सामने आयी और वो पूरी तरह घिरे नजर आये.

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर मोहन भागवत ने कहा, 'वहां केवल राम मंदिर ही बनेगा और इसके अलावा कोई और निर्माण नहीं होगा. मंदिर का निर्माण उसी जमीन पर होगा जहां से रामचंद्र की महिमा जुड़ी हुई है. पिछले 25 सालों से राम जन्मभूमि आंदोलन में शामिल लोगों की देखरेख में और उसी पत्थर से मंदिर का निर्माण होगा.'

rahul gandhiअब तेरा ही आसरा...

बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यन स्वामी तो इसको लेकर भागवत से भी दो कदम आगे दिखे और मंदिर निर्माण का काम पूरा होने का वक्त भी बता दिया - अगले साल अक्टूबर तक. स्वामी ने मीडिया से कहा - 'अगली दीवाली तो अयोध्या में बनने वाले नए राम मंदिर में ही मनाएंगे.'

स्वामी ने दावा किया कि उन्होंने खुद बहस की है और सारे सबूत मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं. भागवत और स्वामी दोनों ऐसे दावे कर रहे हैं जैसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी उन्हीं की उम्मीदों के मुताबिक होना पक्का है. भागवत के दावों पर असदुद्दीन ओवैसी ने पूछा है कि क्या वो सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हैं?

अयोध्या पर कांग्रेस का ये डर तब सामने आया जब सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से कपिल सिब्बल ने दलील पेश की. बीजेपी अब कांग्रेस अयोध्या पर अपना स्टैंड साफ करने की चुनौती दे रही है. हांलाकि, कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि सिब्बल ने जो कहा वो उन्होंने एक पक्ष के वकील के तौर पर कहा है.

असल में कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को ये समझाने की कोशिश की कि राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के 2014 के घोषणापत्र में शामिल है, कोर्ट को बीजेपी के जाल में नहीं फंसना चाहिए. अयोध्या पर सुनवाई टालने की मांग करते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि ये मामला सिर्फ भूमि विवाद नहीं, राजनीतिक मुद्दा भी है और इसका चुनाव पर असर पड़ सकता है लिहाजा इसकी सुनवाई 2019 के बाद शुरू हो. 2019 में लोग सभा का अगला चुनाव होना है. कयास ये भी लगाये जा रहे हैं कि आम चुनाव नियत समय से पहले भी कराये जा सकते हैं.

ayodhya mayorमोदी के साथ अयोध्या के मेयर ऋषिकेश

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी दलीलों को बेतुका माना और कहा - 'हम राजनीति नहीं, केस के तथ्य देखते हैं.' इसके बाद कोर्ट ने केस की सुनवाई 8 फरवरी तक टाल दी.

एनडीटीवी के ब्लॉग में इस मसले पर एक रेस्ट्रां चेन चलाने वाले शामिल शम्सी की बात बहुत महत्वपूर्ण लगती है. शम्सी कहते हैं - 'अगर चुनाव की वजह से कोर्ट की सुनवाई रुकेगी तो फिर तो कभी नहीं हो पाएगी.' शम्सी का सवाल है - '2019 के लोकसभा चुनाव के बाद अगर कपिल सिब्बल मांग करें कि इसे 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव तक टाल दिया जाए तो क्या होगा?'

कांग्रेस की ये मुश्किल तो समझ में आती है कि वो न तो हिंदुओं को नाराज करने का जोखिम ले सकती है न मुस्लिम को नजरअंदाज करने की, वरना न तो राहुल गांधी को मंदिर मंदिर घूमना पड़ता और न ही कांग्रेस को उनके उपनयन संस्कार के इनविटेशन कार्ड ढूंढने पड़ते.

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