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सियासत

 |  4-मिनट में पढ़ें  |   28-03-2018
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सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने 23 मार्च शहीदी दिवस के दिन को अपने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के साथ दिल्ली में वापसी की. 1931 में इसी दिन ब्रिटिश अधिकारियों ने भगत सिंह और उनके सहयोगियों सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु को फांसी पर लटका दिया था. 2018 में हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई के दूसरे संस्करण को लॉन्च करने के लिए और अनिश्चितकालीन हड़ताल के लिए इस दिन को ही चुना.

अन्ना हजारे ने कहा है कि वो रामलीला मैदान में अपना धरना तब तक जारी रखेंगे जब तक सरकार उनकी देश के किसानों की समस्या के हल के लिए बने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को कार्यान्वित नहीं करती और साथ ही केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकयुक्त्तों की स्थापना करने की मांगों को मान नहीं लेती. ये 19वीं बार है जब किसी सामाजिक कार्य के लिए अन्ना हजारे, भूख हड़ताल पर हैं.

अन्ना हजारे ने अपने इस विरोध की घोषणा बहुत पहले ही कर दी थी. लेकिन हाल ही में हुए बैंकिंग घोटालों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों में रोष जरुर बढ़ाया है. लेकिन ये गुस्सा उतना नहीं है जैसा 2011 में था, जिसने पूरे देश को हिला दिया था.

तब तो सभी वर्ग के लोगों ने अन्ना हजारे के पीछे "मैं अन्ना हूं" की टोपी पहनकर आंदोलन में हिस्सा लिया था. तात्कालिन कांग्रेस जो खुद कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रही थी, लोकपाल विधेयक को पास करने के बावजूद 2014 में बुरी तरह से हारी. माना जाता है कि इस विरोध ने यूपीए सरकार की लुटिया डुबोने में मदद की थी. हालांकि, अभी तक मोदी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए एक लोकपाल की नियुक्ति को अंतिम रूप देने की स्थिति में नहीं है. राज्यों में भी इस अधिनियम का क्रियान्वयन भी बहुत ही खराब है.

Anna Hazare, Protest, lokpalअन्ना को राजनीति से दूरी बनाने के बजाए उसका हिस्सा बनना चाहिए था

हालांकि अन्ना हजारे के जुलूस ज्यादातर शांतिपूर्ण ही होते हैं. लेकिन फिर सरकार ने किसी भी तरह के अनहोनी से बचने के लिए कानून-व्यवस्था का सारा बंदोबस्त किया है. सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई है कि अन्ना हजारे के समर्थकों को दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए ट्रेन कैंसिल किए जा सकते हैं और दूसरे ट्रांसपोर्ट के माध्यमों को बाधित किया जा सकता है. हालांकि ये कोरी अफवाह ही है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि अभी के समय के हिसाब से अन्ना हजारे ने इस मुद्दे को उठाने में देरी कर दी. क्योंकि संसद में नरेंद्र मोदी सरकार बहुमत में है तो अन्ना को शुरुआत से ही सरकार से बात करके लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए बातचीत करनी चाहिए थी. उधर सुप्रीम कोर्ट भी सरकार पर लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया को तेज करने के लिए दबाव डाल रही है, इस बात को देखते हुए अन्ना हजारे सरकार पर अधिक दबाव बना सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया इससे लोग उलझन में हैं.

अन्ना का ये नया आंदोलन 20 लोगों पर निर्भर करता है. भले ही ये 20 लोग जाने माने चेहरे नहीं हैं, लेकिन फिर भी लोगों के बीच इनकी खासी पकड़ है. उन्होंने कथित तौर पर नए सदस्यों से एक हलफनामे पर हस्ताक्षर भी कराए हैं जिसमें लिखा है कि वे राजनीति में शामिल नहीं होंगे. यह अजीब बात है कि हजारे ने अपने नए समर्थकों की राजनीति से दूरी ऐसे समय में बना ली है जब देश के विकास की दिशा में और आगे बढ़ने के लिए नए विचारों की बहुत ही ज्यादा आवश्यकता है. आखिर राजनीति की सफाई उसका हिस्सा बनकर ही की जा सकती है, उससे दूरी बनाकर नहीं.

इसके बजाय अन्ना हजारे को ये करना चाहिए था कि वो भ्रष्टाचार विरोधी अपने इस अभियान से दागी लोगों को दूर रखते. भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी इस दूसरी लड़ाई में अन्ना हजारे को वही समर्थन नहीं मिलेगा, लेकिन हां उनकी विश्वसनीयता पर किसी को कोई शक नहीं इसमें भी दो राय नहीं है. सभी लोग अन्ना के इस अनिश्चितकालीन अनशन का समर्थन नहीं करेंगे. अपनी प्रतिष्ठा को देखते हुए, हजारे को अपनी मांगों पर चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगना चाहिए.

अन्ना हजारे का व्यक्तित्व ऐसा है कि जब वो बोलेंगे तो लोग उनकी बात को सुनेंगे. लेकिन भूख हड़ताल जैसी धमकियों से उनका काम नहीं हो पाएगा.

(ये लेख तेजिंदर सिंह बेदी ने DailyO के लिए लिखा था)

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