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Updated: 22 फरवरी, 2020 08:11 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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अयोध्या (Ayodhya) से पहले उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने दिल्ली दौरा प्लान किया. 7 मार्च को महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार के 100 दिन पूरे हो रहे हैं - और मौके का जश्न अयोध्या में मनाया जाना तय हुआ है. माहौल अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का है, उद्धव ठाकरे बीजेपी को पूरा मुद्दा अकेले लूट लेने का मौका नहीं देना चाहते हैं.

उद्धव ठाकरे चाहते हैं कि सरकार के 100 दिन सभी गठबंधन साथी मिल कर मनायें, लेकिन शर्त है कि जगह अयोध्या ही हो. संजय राउत ने तो यहां तक कह दिया है कि वो राहुल गांधी को भी जश्न में साथ देखना चाहेंगे. गजब हाल है, अरविंद केजरीवाल पहले से ही बीजेपी के वोट बैंक में सेंधमारी की ताक में हैं और उद्धव ठाकरे वो काम कांग्रेस और NCP को साथ लेकर करना चाहते हैं.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के तीन महीने बाद उद्धव ठाकरे दिल्ली पहुंचे और एक ही झटके में उन सभी से मुलाकात कर डाली जो उनके तात्कालिक सियासी मतलब की पूर्ति करते हैं - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, (Narendra Modi and Amit Shah) लालकृष्ण आडवाणी और सोनिया गांधी (Sonia Gandhi). बेटे और अब कैबिनेट साथी बन चुके आदित्य ठाकरे भी इस दौरान उद्धव ठाकरे के साथ थे.

सबसे मिलने और बातचीत के बाद उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे और संजय राउत के साथ मीडिया के सामने आये और बोले - CAA यानी नागरिकता संशोधन कानून से किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है. CAA पर उद्धव ठाकरे का ये बयान काफी महत्वपूर्ण है और ये शिवसेना का राजनीतिक स्टैंड भी है जिसमें अपनी छवि बचाने, वोट बैंक बचाये रखने के साथ ही बीजेपी से टकराव टालना भी है, लेकिन सबसे मुश्किल चुनौती है - कांग्रेस के साथ रिश्ता कायम रखना उद्धव ठाकरे के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है.

पहले दिल्ली, फिर अयोध्या!

अमित शाह और उद्धव ठाकरे में आमना सामना तो 7 दिसंबर, 2019 को एयरपोर्ट पर भी हुआ था, लेकिन दिल्ली जैसी मुलाकात नहीं हुई थी. तब डीजीपी कांफ्रेंस करने में हिस्सा लेने प्रधानमंत्री पहुंचे तो मुख्यमंत्री होने के नाते उद्धव ठाकरे भी पहुंचे - और गृह मंत्रालय का कार्यक्रम होने के नाते उस दौरान अमित शाह भी वहां मौजूद थे.

दिल्ली की मुलाकात उससे आगे की बातों के लिए रही, वैसे उद्धव ठाकरे ने पहली मुलाकात बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी से महाराष्ट्र के बारे बातचीत हुई और केंद्र सरकार ने हरसंभव मदद का भरोसा दिया है. प्रधानमंत्री मोदी के साथ साथ उद्धव ठाकरे अमित शाह से भी मिले और दोनों मुलाकातों को लेकर बोले, 'मैंने NRC और CAA के मुद्दे पर भी उनसे बातचीत की... उन्होंने मुझे आश्वस्त किया है. CAA से किसी को डरने की जरूरत नहीं है, जहां तक NRC की बात है तो वो पूरे देश में लागू नहीं होने जा रहा है... CAA के नाम पर मुसलमानों के अंदर डर फैलाया जा रहा है.'

अव्वल तो अमित शाह से उद्धव ठाकरे की मुलाकात महाआघाड़ी के अस्तित्व में आने से पहले ही होनी थी, लेकिन मातोश्री में अमित शाह का इंतजार ही किया जाता रहा - और गठबंधन टूट ही गया. हो सकता है अमित शाह संपर्क फॉर समर्थन मुहिम की तरह ठाकरे परिवार से एक और राजनीतिक मुलाकात के लिए मातोश्री पहुंचे होते तो सूबे की राजनीतिक तस्वीर कुछ और ही होती.

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का मुद्दा ऐसा है कि कांग्रेस खुले तौर पर इसके विरोध में है, लेकिन शिवसेना केंद्र की मोदी सरकार के साथ शुरू से ही खड़ी है. संसद में बीजेपी का साथ देने पर कांग्रेस नेतृत्व की नाराजगी उद्धव ठाकरे तक पहुंचायी भी गयी थी.

ऐसा लगता है उद्धव ठाकरे CAA पर बीजेपी नेतृत्व से पहले तो टकराव नहीं चाहते. वैसे भी टकराव की स्थिति में शिवसेना बीजेपी के निशाने पर आ जाएगी और अपने वोट बैंक को जवाब देना होगा कि कैसे वो हिंदुत्व के मुद्दों से पीछे नहीं हटी है. ये ठीक है कि शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन को ये समझाने की कोशिश हो रही है कि उसमें सिर्फ मुसलमान नहीं हैं, लेकिन बाकी जगह तो साफ तौर पर बंटवारा देखा जा सकता है.

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कांग्रेस के शासन वाली पंजाब सरकार ने तो CAA के खिलाफ प्रस्ताव भी पारित कर दिया है और प्रियंका गांधी वाड्रा विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस एक्शन के शिकार पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर रही हैं. ऐसे में सवाल तो है कि उद्धव ठाकरे कांग्रेस को कैसे समझाएंगे - जब दिल्ली में पत्रकारों से मिले तो उद्धव ठाकरे से पूछ लिया गया. उद्धव ठाकरे कोई स्पष्ट जवाब तो नहीं दे पाये, लेकिन इतना जरूर बोले की कांग्रेस के साथ उनकी बातचीत है, इसलिए महाराष्ट्र में शांति है. साथ में जोड़ा भी, 'गठबंधन सरकार में शामिल सहयोगी दलों के बीच कोई टकराव नहीं है - हम पांच साल सरकार चलाएंगे.'

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके अशोक चव्हाण फिलहाल उद्धव सरकार में मंत्री हैं और वो कई बार कह चुके हैं कि जब तक उनकी पार्टी सरकार में है तब तक महाराष्ट्र में CAA लागू नहीं होने देंगे. उद्धव ठाकरे ने दिल्ली में सोनिया गांधी से भी मुलाकात की और सूत्रों के हवाले से पता चला है कि महाराष्ट्र सरकार के अब तक के फैसलों सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हुई है. सिर्फ CAA ही नहीं, NRC-NPR, भीमा-कोरेगांव और सावरकर पर राहुल गांधी के बयान से विवाद ऐसे मुद्दे रहे हैं जिन पर कांग्रेस और शिवसेना अलग अलग मोड़ पर खड़े देखे गये हैं - फिर भी उद्धव ठाकरे कहते हैं कि सरकार पांच साल चलेगी तो हिम्मत की दाद देनी होगी.

चुनावी सीजन न होने के कारण राहुल गांधी का मंदिर दर्शन कार्यक्रम जारी नहीं रहना लगता है शिवसेना को ठीक नहीं लग रहा है. संजय राउत की बातों से तो ऐसा ही लगता है, 'सरकार के 100 दिन पूरे होने के मौके पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अयोध्या जाएंगे और भगवान राम का आशीर्वाद लेंगे... हम चाहते हैं कि हमारे गठबंधन सहयोगी भी इस दौरान साथ आएं... राहुल गांधी भी कई मंदिरों में जाते रहते हैं.'

साथ रहने या आगे निकल जाने की कवायद चल रही है?

छत्रपति शिवाजी महाराज की 390वीं जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में महाराष्ट्र के सभी दिग्गज मौजूद थे और मौके का फायदा उठाते हुए उद्धव ठाकरे ने समझाने की कोशिश की कि कैसे महाराष्ट्र में शिवसेना, NCP और कांग्रेस ने साथ आने में देर कर दी. फिर समझाया भी कि देर से आये लेकिन दुरूस्त आये और आगे भी साथ साथ बने रहेंगे.

उद्धव ठाकरे बोले, 'मैं कहता हूं कि हमने कई साल बर्बाद कर दिये. एक साथ आने में कई साल लग गये, लेकिन कोई बात नहीं. मैं पूरे महाराष्ट्र से ये वादा करना चाहता हूं कि अब हम एक साथ आ गये हैं. हम मिलकर सभी अच्छे काम करेंगे. ये मेरा वादा है.'

आगे बोले, 'मैं छत्रपति शिवाजी महाराज के जन्म स्थान पर ये शपथ लेता हूं.'

उद्धव ठाकरे के इस शपथ के मतलब तो साफ ही हैं. पहला तो यही है कि मिलकर बीजेपी को फिर से सरकार बनाने से रोकना है और ये साथ बने रहने पर ही संभव है. आगे बढ़ कर शपथ लेते हुए उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी नेतृत्व को साथ साथ चलने का भरोसा तो दिलाते ही हैं, आगाह भी कर रहे हैं कि उनके बगैर ये मुमकिन भी नहीं है.

ये सब तो यही संकेत देता है कि कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिल कर उद्धव ठाकरे बीजेपी को काउंटर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं - और साथ ही साथ कांग्रेस और एनसीपी को पीछे पीछे चलने के लिए मजबूर किये रखना चाहते हैं.

एक तरफ उद्धव ठाकरे सरकार की तरफ से किसानों, कर्मचारियों और गरीबों के हित में फैसले लेकर वोट बैंक मजबूत कर रहे हैं, दूसरी तरफ साथियों पर दबाव बनाने की भी कोशिश कर रहे हैं - कभी अपने एक्शन से मैसेज देकर तो कभी उनकी बात मानकर.

ऐसा ही एक मसला भीमा-कोरेगांव हिंसा की जांच का है. महाराष्ट्र सरकार की तरफ से जब बताया गया कि एल्गार परिषद और भीमा-कोरेगांव हिंसा का मामला केंद्र को सौंपा जा रहा है तो शरद पवार ने खुल कर नाराजगी जतायी. बाद में एनसीपी मंत्रियों की बैठक बुलाकर मामले की राज्य स्तर पर एसआईटी जांच साथ साथ कराने का फैसला भी करा लिया.

जब उद्धव ठाकरे को लगा कि मामला ज्यादा बिगड़ सकता है तो नये सिरे से समझाने की कोशिश की, 'एल्गार परिषद का मामला और भीमा कोरेगांव... दो अलग-अलग मामले हैं. भीमा कोरेगांव का मामला मेरे दलित भाइयों से जुड़ा हुआ है. इस जांच को केंद्र के हाथ में नहीं दिया जा सकता है - और इसे केंद्र को नहीं सौंपा जाएगा... एल्गार परिषद के मामले को केंद्र सरकार देख रही है.'

उद्धव ठाकरे के आत्मविश्वास और कांग्रेस और NCP के संभल कर रहने की एक बड़ी वजह भी है - कांग्रेस और NCP विधायकों में सत्ता का लालच. कांग्रेस के उद्धव सरकार में शामिल होने की वजह तो महाराष्ट्र के उसके विधायकों का दबाव ही है. ये बात सोनिया गांधी तक भी पहुंचा दी गयी थी कि महाराष्ट्र के नेता तो सरकार में शामिल होना चाहते ही हैं, विधायकों को कोई रास्ता न दिखा तो पार्टी भी छोड़ सकते हैं. NCP विधायकों पर भी यही बात लागू होती है. चुनाव से पहले दोनों दलों के नेता किस तरह बीजेपी-शिवसेना में गये सबने देखा ही - क्योंकि तब सभी मान कर चल रहे थे कि गठबंधन सरकार की सत्ता तो तय है.

मुख्यमंत्री होने की वजह से उद्धव ठाकरे के पास प्रतिकूल परिस्थियों में सरकार बचाने का ये विकल्प भी बचा हुआ है. उद्धव ठाकरे बीजेपी नेतृत्व से भी रिश्ता सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि बिहार की तरह अगर महाविकास आघाड़ी छोड़ने की नौबत आयी तो हल्का फुल्का ही सही एक प्लान बी तैयार तो रहे, लेकिन उद्धव ठाकरे को मालूम है कि महाराष्ट्र में बीजेपी के पास देवेंद्र फडणवीस हैं - और अभी वो खुद नीतीश कुमार नहीं बन पाये हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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