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Updated: 09 अप्रिल, 2021 04:57 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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महाराष्ट्र के सियासी सर्कल में एक बात से हर किसी को इत्तफाक है - 'कोरोना वैक्सीन पर सियासत नहीं होनी चाहिये'. ऐसा ही बीजेपी और विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस का भी मानना है और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का भी. एनसीपी नेता शरद पवार (Sharad Pawar) के बयानों में भी ऐसी ही फीलिंग शेयर करने की कोशिश होती है, फिर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का सबसे बड़ा आधार कोरोना वैक्सीन ही बन रहा है.

कोरोना वैक्सीन को लेकर बीजेपी की केंद्र सरकार और महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार आमने सामने आ चुकी है - और ध्यान देने वाली बात है कि सरकार में मजबूत हिस्सेदार एनसीपी नेता शरद पवार न सिर्फ दूरी बनाते नजर आ रहे हैं, बल्कि इस मामले में केंद्र की मोदी सरकार के साथ खड़े दिखायी पड़ रहे हैं. सवाल उठता है कि क्या ये सब 70 साल के एनसीपी नेता अनिल देशमुख के खिलाफ सीबीआई जांच का असर है? या अनिल देशमुख को लेकर शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत के बयान के साइड इफेक्ट हैं? या फिर उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार के लिए किसी बड़े खतरे की तरफ इशारा है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि ये शरद पवार और अमित शाह (Amit Shah) की चर्चित मुलाकात को लेकर एनसीपी के इनकार और शाह के बयान से उपजे सस्पेंस का साइड इफेक्ट है?

महाराष्ट्र में किसी नये बदलाव का संकेत देती सत्ता की सियासत की असलियत जो भी हो, कोई खिचड़ी पकाने के लिए लगाई गयी आग का हल्का फुल्का धुआं तो दस्तक दे ही रहा है - और सबसे बड़ी बात ये है कि उद्धव सरकार को रिमोट कंट्रोल करने वाले शरद पवार का नया रोल निखर कर नये तरीके से सामने आने लगा है और ये पहले के मुकाबले ज्यादा साफ भी लग रहा है.

उद्धव ठाकरे के खिलाफ हैं शरद पवार या मोदी सरकार के पक्ष में?

महाराष्ट्र के सियासी हलचल कई तरह के संकेत दे रहे हैं और बीते कई मौकों पर चूक गयी बीजेपी फिलहाल सबसे ज्यादा फायदे में नजर आ रही है. अब तक तो यही देखने को मिलता रहा है कि बीजेपी के खिलाफ एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस मुश्किल घड़ियों में मजबूती से एकजुट पाये गये हैं. ऐसी परिस्थितियों में बीजेपी चाह कर भी कुछ करने की स्थिति में नहीं होती है, लेकिन अब हालात थोड़े बदले हैं.

महाराष्ट्र के राजनीतिक हालात इतने तो बदले ही हैं कि बीजेपी को अपनी विरोधी गठबंधन में थोड़ा सा ही सही, घुसपैठ का मौका तो मिल ही गया है. सीबीआई जांच तो सुशांत सिंह राजपूत मामले में भी राजनीतिक तौर पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की गठबंधन सरकार के खिलाफ ही रही और अनिल देशमुख का मामला भी करीब करीब वैसा ही है. दोनों ही मामलों में सीबीआई जांच में महत्वपूर्ण भूमिका अदलत की ही रही है. अनिल देशमुख के मामले में तो आदेश ही हाई कोर्ट ने दिया है, सुशांत केस में बिहार से नीतीश कुमार सरकार की सिफारिश पर केस को मोदी सरकार ने आगे बढ़ाया था और फिर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी. अनिल देशमुख केस में भी सीबीआई जांच पर रोक लगाने से मना कर सुप्रीम कोर्ट ने एक तरीके से मुहर ही लगायी है.

sharad pawar, amit shah, uddhav thackerayबीजेपी की पसंद तो सरकार गिराना है, नापंसद न तो उद्धव ठाकरे हैं न शरद पवार

अनिल देशमुख के खिलाफ लगे आरोपों को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर माना है. अनिल देशमुख के एनसीपी का ही नेता होने के बावजूद शरद पवार ने भी आरोपों को गंभीर प्रकृति का ही माना था, लेकिन जांच के पक्ष में कभी नहीं रहे. शरद पवार ने अपने खिलाफ ईडी की जांच को तो अपने राजनीतिक कदम से न्यूट्रलाइज कर दिया था, लेकिन न तो सुशांत केस में और न ही अनिल देशमुख के मामले में सीबीआई जांच को लेकर वैसा कोई रास्ता नहीं निकाल पाये.

NIA की गिरफ्त में आये सचिन वाजे के जरिये 100 करोड़ रुपये महीने की वसूली वाली अनिल देशमुख के खिलाफ परमवीर सिंह की चिट्ठी से मचे बवाल के बाद सबसे पहले शरद पवार ने ही मोर्चा संभाला था, लेकिन तभी संजय राउत ने जो बयान दिया वो शिवसेना नेृतृत्व के खिलाफ चला गया. वैसे तो उद्धव ठाकरे ने संजय राउत पर तत्काल नकेल कस कर शरद पवार को मैसेज देने की कोशिश की, लेकिन नुकसान शायद ज्यादा हो चुका था. ये भी हो सकता है कि शरद पवार अपनी नयी चाल के लिए पहले से ही ऐसे किसी नाजुक मौके की तलाश में रहे हों. उद्धव ठाकरे ने संजय राउत को हटाकर शिवसेना सांसद अरविंद सावंत को पार्टी का मुख्य प्रवक्ता बना दिया है. संजय राउत कुछ ही महीने पहले शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता बनाये गये थे.

हो सकता है संजय राउत ने शिवसेना नेतृत्व के इशारे पर ही बयान दिया हो कि अनिल देशमुख को गठबंधन सरकार में गृह मंत्रालय जयंत पाटिल और दिलीप वलसे पाटिल जैसे एनसीपी नेताओं के इनकार कर देने के बाद बनाना पड़ा. संजय राउत तो यही समझाने की कोशिश कर रहे थे कि अनिल देशमुख न तो शिवसेना की पसंद रहे और न ही शरद पवार के. संजय राउत की तरफ से अनिल देशमुख की संदेहास्पद छवि ऐसे मौके पर गढ़ने की कोशिश की गयी जब उद्धव ठाकरे और शरद पवार दोनों ही सौ करोड़ की वसूली को लेकर बैकफुट पर आ गये थे और देवेंद्र फडणवीस ज्यादा ही आक्रामक हो चले थे.

अब कोरोना वैक्सीन को लेकर शरद पवार के केंद्र सरकार के पक्ष में खड़े हो जाने से पूरा मामला गंभीर लगने लगा है और ऐसी चर्चाएं चल पड़ी हैं कि पश्चिम बंगाल चुनाव के तत्काल बाद कहीं महाराष्ट्र में तो नहीं 'खेला होबे' का माहौल बन रहा है!

कोरोना वैक्सीन की बात तो अभी की है, लेकिन शरद पवार को तो पहले भी केंद्र की मोदी सरकार के साथ खड़े देखा गया है. शरद पवार अगर उद्धव ठाकरे के खिलाफ अभी नजर आ रहे हैं तो पहले कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ भी जा चुके हैं, जबकि वो पार्टी भी तो गठबंधन में हिस्सेदार है.

चीन के मुद्दे पर राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ रहे और जब सोनिया गांधी ने सर्वदलीय बैठक में सवालों की बौछार की तो भी शरद पवार ने खुली मुखालफत की. देश का रक्षा मंत्री रहे होने के चलते शरद पवार की बातों को काफी गंभीरता से लिया गया और मोदी सरकार ने काफी राहत भी महसूस की होगी.

लेकिन राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ शरद पवार के मोदी सरकार का साथ देने और उद्धव ठाकरे के खिलाफ बोलने में बड़ा फर्क है. राहुल गांधी और सोनिया गांधी की सेहत पर शरद पवार के बयानों से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला, लेकिन उद्धव ठाकरे के सामने तो सरकार बचाये रखने का ही संकट खड़ा हो जाएगा.

असल में, महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने कह दिया था कि राज्य में कोरोना वैक्सीन की भारी कमी हो गयी है. जब ये बात कही तभी ये भी बोल दिया कि महाराष्ट्र सरकार के पास कोरोना वैक्सीन का ज्यादा से ज्यादा तीन दिनों का स्टॉक है. साथ ही, राजेश टोपे ने कोरोना वैक्सीन की ज्यादा खुराक मुहैया कराने की भी केंद्र सरकार से मांग की.

राजेश टोपे के बयान के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन कहने लगे कि महाराष्ट्र सरकार तो वैक्सीन लगाने में भी कई राज्यों से पीछे चल रही है. फ्रंट वर्कर्स को वैक्सीन लगाने के मामले में हर्षवर्धन ने पंजाब और दूसरी गैर बीजेपी सरकारों का भी नाम लिया था और दावा किया कि कई राज्यों में वैक्सीन लगाये जाने की रफ्तार महाराष्ट्र के मुकाबले ज्यादा है. हर्षवर्धन ने जिन सरकारों के नाम लिये बीजेपी की ही हैं. उद्धव ठाकरे की मुश्किल ये है कि बाकी राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में कोरोना कहीं ज्यादा ही खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है. उद्धव ठाकरे अब युवाओं को भी वैक्सीन लगाये जाने की सुविधा और अनुमति देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील कर रहे हैं.

वैसे तो शरद पवार अक्सर उद्धव सरकार के बचाव में खड़े देखे जाते रहे हैं, लेकिन अभी जो कुछ भी बोला है वो साफ तौर पर शिवसेना नेतृत्व के खिलाफ ही जाता है. दिलचस्प बात ये है कि वैक्सीन को लेकर विरोधाभासी बयान एनसीपी खेमे से ही आया है. स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे जहां महाराष्ट्र में वैक्सीन का स्टॉक खत्म होने की बात कर रहे हैं, वहीं शरद पवार का कहना है कि राज्य सरकार को केंद्र सरकार की तरफ से पूरा सहयोग मिल रहा है.

मुलाकात से भी बड़ी मुलाकात की बातें

मामला इतना भी गंभीर नहीं होता अगर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शरद पवार से गुजरात की मुलाकात को लेकर पूछे गये सवाल पर बयान देकर सस्पेंस न बढ़ा दिया होता - “हर बात सार्वजनिक नहीं की जा सकती!”

ये ऐसा राजनीतिक बयान है जो मुलाकात हुई या नहीं की परवाह न करते हुए कहीं आगे बढ़ कर इशारे कर रहा है. अमित शाह के बयान के आगे संजय राउत का उस चर्चित मुलाकात को अफवाह बताना और एनसीपी की तरफ से साफ मुकर जाने की बात की भी कोई अहमियत नहीं रह जाती है. एनसीपी की तरफ से कहा गया, 'ऐसी कोई मुलाकात नहीं हुई है, ये बीजेपी की साजिश है.'

मुलाकात को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर में भी कयासों की ही बात रही. फिर चर्चाओं का दौर चल पड़ा कि गुजरात के ही एक उद्योगपति ने पहले बारामती में शरद पवार से मुलाकात की और बाद में उनके ही गेस्ट हाउस में अमित शाह की पवार और प्रफुल्ल पटेल के साथ मुलाकात हुई. आधिकारिक तौर पर अमित शाह के राजनीतिक बयान के अलावा उस मुलाकात को लेकर किसी ने पुष्टि नहीं की.

मुलाकात हुई हो या न हुई हो, लेकिन ये तो साफ है कि मुलाकात की बात भर ने ही महाराष्ट्र की राजनीति में जो बवंडर मचाया है कि हर किसी की कुर्सी हिचकोले खा रही है - और उद्धव ठाकरे भी अलर्ट मोड में आ गये हैं.

जैसे अनिल देशमुख के खिलाफ सीबीआई जांच के इर्द गिर्द ताजा मुलाकात की चर्चा है, ऐसे ही एक और गुपचुप मुलाकात खासी चर्चित रही. तब देवेंद्र फडणवीस और संजय राउत एक होटल में मिले थे. वो तब की बात है जब बिहार चुनाव के बीच सुशांत सिंह राजपूत केस की जांच सीबीआई शुरू कर चुकी थी. उस मुलाकात को लेकर बताया गया था कि संजय राउत सामना के लिए एक इंटरव्यू के सिलसिल में देवेंद्र फडणवीस से मिले थे, हालांकि, अब तक वो इंटरव्यू देखने, सुनने या पढ़ने को तो नहीं ही मिला है.

महाराष्ट्र और बिहार की राजनीति में ऐसा कोई कनेक्शन है कि दोनों में से किसी एक की भी चर्चा दूसरे के जिक्र के बगैर पूरी नहीं होती. सचिन वाजे के एनआईए के हत्थे चढ़ने के साथ ही बीजेपी ने गठबंधन में सेंध तो लगा ही डाली है, करीब करीब वैसे ही जैसे 2017 में बिहार की 18 महीने पुरानी महागठबंधन सरकार बीजेपी की चपेट में आ गयी थी. तब तत्कालीन डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव सीबीआई जांच के फेरे में आ गये और दोनों तरफ के संकटमोचक बीजेपी नेतृत्व से संपर्क साधने में जुट गये. जैसे ही नीतीश कुमार को अपने सूत्रों से पक्की जानकारी मिली कि लालू प्रसाद तो उनको ही ठिकाने लगाने के चक्कर में है, फटाफट पाला बदल कर बीजेपी से हाथ मिला लिया और एनडीए में वापसी कर ली.

महाराष्ट्र में भी कुछ कुछ ऐसा ही खेल चल रहा है. बीजेपी ने गठबंधन में ऐसी सेंध लगायी है कि दोनों हाथ में थोड़े थोड़े लड्डू आ चुके हैं - देखना है कि शरद पवार का रिमोट कंट्रोल काम करता है कि उद्धव ठाकरे मेन स्वीच तक पहुंच जाते हैं!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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