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Updated: 29 जनवरी, 2019 04:22 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
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1857 में हुए देश के पहले स्‍वतंत्रता संग्राम में सिंधिया राजघराने की क्‍या भूमिका थी? क्‍या सिंधिया राजघराने ने देश से गद्दारी करके अंग्रेजों का साथ दिया था? क्‍या सिंधिया राजघराने की वजह से ही रानी लक्ष्‍मीबाई को अंग्रेजों ने घेर कर मार दिया था? भारतीय इतिहास के इस विवादास्‍पद पहलू पर कम ही चर्चा हुई है. लेकिन, मणिकर्णिका ने इतिहास के इस अध्‍याय को बेबाक ढंग से देश के सामने ला दिया है. सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी सुविख्‍यात वीर रस की कविता 'बुंदेले हर बोलो के मुंह हमने सुनी कहानी थी...' में जो बात दबे स्‍वर में कही थी, उसे कंगना ने फिल्‍म में खुलकर कहा है.

फिल्‍म के इस सीन का दिलचस्‍प पहलू है, इसका सोशल मीडिया पर वायरल होना. और वह भी 2019 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में. कांग्रेस कुछ बड़ा कर सके इसके लिए जहां प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का मोर्चा दिया गया है तो वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को दी गई है. उसी पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में जहां रानी लक्ष्‍मीबाई ने अंग्रेजों को नाको चने चबवाए. दिल्ली से भाजपा के प्रवक्ता तेजिंदर पाल बग्गा ने फिल्‍म के इस सीन को ट्विटर पर शेयर करके उन्‍होंने ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को टैग किया है. और साथ में हैशटैग के साथ 'देशद्रोही सिंधिया' भी लिखा है. एक ऐसे समय में जब एक्‍सीडेंटल प्राइम मिनिस्‍टर और उरी फिल्‍म का भाजपा राजनीतिक फायदा उठा रही है, तो उसी कड़ी में मण‍िकर्णिका का एक सीन भी सियासत के मैदान में आ गया है.

तजिंदर पाल बग्गा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मणिकर्णिका, कांग्रेससाफ है कि तजिंदर पाल बग्गा के ट्वीट के बाद दिक्कत ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ साथ कांग्रेस को भी होगी

क्‍या है सीन में: इस सीन में जयाजीराव सिंधिया अपने सिंहासन पर बैठे हुए हैं और तभी रानी लक्ष्मी बाई आती हैं. और उन्हें राजद्रोही और कायर कहती हैं. इस पर जयाजीराव कहते हैं कि, लक्ष्मी बहन मेरे खिलाफ कई तरह की अफवाहें उड़ाई जा रही हैं. कौन कहता है कि मैं अंग्रेजों की तरफ हूं. आप चाहो तो मेरा किला रख लो जब तक ये दंगे खत्म नहीं होते, मैं लंदन चला जाता हूं.' इसपर लक्ष्मीबाई फिर कहती हैं कि, मातृभूमि यानी कि मां. जो अपनी मां का सौदा कर ले वो मर चुका है, और मैं मुर्दों पर तलवार नहीं उठाती. निकल जाओ यहां से.

गौरतलब है कि सिंधिया राजवंश का इतिहास हमेशा ही संदेह के घेरों में रहा है. माना जाता है कि, वीरता और बहादुरी के लिए जानी जाने वाली रानी लक्ष्मी बाई से जयाजीराव सिंधिया ने गद्दारी की थी. जयाजीराव सिंधिया ग्वालियर के महाराज थे. जिन्होंने अंग्रेजों का समर्थन किया था. कई इतिहासकारों का मत है कि उन्होंने अंग्रेजों के साथ मिलकर एक कूटनीति तैयार की और सेना को रानी लक्ष्मीबाई के खिलाफ भड़काया और जब अंग्रेज सैनिक रानी से लड़ने आए, तब ग्वालियर की सेना ने रानी को अकेला छोड़ दिया.

तजिंदर पाल बग्गा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मणिकर्णिका, कांग्रेस  सिंधिया राजवंश हमेशा ही विवादों में रहा है

इतिहासकारों से इतर साहित्यकारों ने भी इस घटना का वर्णन किया है. मगर वो अलग बात है कि इस मुद्दे को हमेशा ही देश की जनता से छुपाया गया और उसे इससे दूर रखा गया. सिंधिया राजवंश धोखेबाज था या नहीं यदि इसका अंदाजा लगाना हो तो हमें सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता झांसी की रानी का अवलोकन करना चाहिए. हालांकि, यह कविता ही रानी लक्ष्‍मीबाई की वीरता को समर्पित है, लेकिन इसमें सिंधिया की भूमिका का भी जिक्र है. पहले 7 पंक्तियां रानी की बहादुरी की:

सिंहासन हिल उठे राजवंषों ने भृकुटी तनी थी,

बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सब ने मन में ठनी थी.

चमक उठी सन सत्तावन में, यह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी.

अब आते हैं कविता के उस भाग पर, जिसके बारे में न तो कभी हमें पढ़ाया गया और न ही कभी हमने पूरी कविता पढ़ने की सोची. कविता के इस भाग में कवियत्री ने रानी के साथ हुए छल का जिम्मेदार सिंधिया राजवंश को ठहराया है और कहा है कि:

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अँग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,

विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार.

अँग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

इस मामले में जिसमें एक फिल्म के सीन से तेजिंदर पाल बग्गा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके पूरे राजवंश पर अंगुली उठाई है, जबकि वो ये बात भूल गए कि जिस भाजपा के लिए वे नेतागिरी कर रहे हैं उसकी संस्‍थापक सदस्‍य राजमाता विजयाराजे सिंधिया हैं, जिनकी जयंती का शताब्‍दी वर्ष पार्टी मना रही है. इतना ही नहीं, इसी राजघराने की एक और संतान वसुंधरा राजे राजस्‍थान भाजपा की नेता हैं और अभी हाल तक मुख्‍यमंत्री रही हैं.

बहरहाल जो रानी के साथ हुआ वो इतिहास था, और इस बात में कोई शक नहीं है कि आज जो भी हो रहा है वो राजनीति है. एक ऐसी राजनीति जिसका उद्देश्य एक पार्टी की हार और दूसरी पार्टी की जीत है. बात जब जीत हार की आएगी तो पार्टियां एक दूसरे की पोल भी खोलेंगी और कपड़े भी उतरेंगी.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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