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Updated: 04 मई, 2018 09:52 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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दलितों को रिझाने के मामले में जो कीचड़ बीजेपी नेता अब तक राहुल गांधी पर उछालते रहे, उसके छींटे पलट कर उन्हीं पर पड़ने लगे हैं. राहुल गांधी के दलितों के घर जाने और खाना खाने को बीजेपी दलित टूरिज्म बताती रही है, लेकिन मामला अब उल्टा पड़ने लगा है.

ये सब तब हो रहा है जब बीजेपी नेता और मंत्री दलित आबादी में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर अमल करने की कोशिश कर रहे हैं. 14 अप्रैल से शुरू हुए बीजेपी के ग्राम स्वराज अभियान का आखिरी दिन 5 मई है. आखिरी दौर आते आते अभियान सुर्खियां भी खूब बटोर रहा है, लेकिन बीजेपी नेताओं के बयान और हरकतों की वजह से.

दलित भोज पर विवादों का सिलसिला

ग्राम स्वराज्य अभियान के तहत सत्ताधारी बीजेपी के मंत्रियों और नेताओं को उन गांवों में कम से कम दो रातें गुजारने का फरमान मिला था जहां दलितों की आबादी 50 फीसदी या उससे ज्यादा है. इसके लिए देश भर में 20 हजार से ज्यादा गांवों की लिस्ट बनायी गयी थी. नेताओं ने अपनी ओर से कोशिश में तो कमी नहीं दिखायी, लेकिन उनकी एक्टिविटी बीजेपी की मुश्किलें बढ़ाने लगी.

dalit dinnerदलित भोज ने बढ़ाई बीजेपी की फजीहत

मालूम नहीं ये जय श्रीराम नारे का असर है या कुछ और? जय श्रीराम जपते जपते बीजेपी नेता इस कदर राम मय होते जा रहे हैं कि खुद को ही भगवान श्रीराम समझने लगे हैं. एक दलित के घर खाना खाने के बाद योगी सरकार के मंत्री राजेंद्र प्रताप सिंह की बातों से तो ऐसा ही लगता है.

दलित भोज के बाद प्रसन्न होकर राजेंद्र प्रताप सिंह बताने लगे कि उन्होंने वही काम किया है जो राम ने शबरी के बेर खाकर किया था. अपनी वाहवाही लूटने में राजेंद्र सिंह ने बीजेपी का कबाड़ा कर दिया, 'रामायण में राम और शबरी बातचीत का वर्णन किया गया है. आज जब मैं यहां आया, तब ज्ञान की मां ने मुझे भोजन दिया.' सिर्फ इतना ही नहीं राजेंद्र सिंह ने समझाया कि वो क्षत्रिय हैं, धर्म और समाज की रक्षा करना उनका कर्तव्य है जिसे वो निभा रहे हैं.

कुछ ऐसी ही वाहवाही लूटते हुए योगी ही सरकार की एक और मंत्री ने पार्टी की सरेआम फजीहत कराई. योगी की मंत्री अनुपमा जायसवाल से उनके साथी मंत्री सुरेश राणा के दलित भोज के बारे में पूछा गया था. बताते बताते वो भी बता गयीं कि किस तरह सारी रात मच्छर काटते रहते हैं फिर भी बीजेपी नेता दलितों के घर रात गुजार रहे हैं.

dalit dinnerप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उम्मीदों पर पानी फेरते बीजेपी नेता

वैसे तो सुरेश राणा का भी दावा यही है कि जो कुछ उनके डिनर में परोसा गया था उसे गांव वालों ने घर में ही बनाया था. दूसरी तरफ दलित परिवार का कहना रहा कि मेहमानों की खातिरदारी के लिए अचानक रात के 11 बजे उन्हें जगाया गया. पहले से उन्हें इस बारे में कोई खबर नहीं रही. सुरेश राणा अपनी सफाई में जो भी दलील दें लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि तमाम तरह के व्यंजन और चमकते प्लेट और चम्मच गांव में पलक झपकते कैसे जुटा लिये गये. पूरे वाकये की किसी को भनक तक न लगती अगर सोशल मीडिया पर दलित भोज की तस्वीरें वायरल न हुई होतीं.

ये ड्रामा नहीं तो क्या है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कई साल से सामाजिक समरसता अभियान चला रहा है जिसका स्लोगन है - एक मंदिर, एक श्मशान और एक कुआं. बावजूद इसके बाद नहीं बन पा रही. ऊना से लेकर सुल्तानपुर तक दलितों के खिलाफ हिंसा तो कहीं घोड़ी चढ़ने से रोकने तो कहीं मूंछ रखने पर बवाल. मुश्किल ये है कि ये सारी ही घटनाएं उन्हीं राज्यों में होती हैं जहां बीजेपी सत्ता में है.

हाल फिलहाल का बवाल तो एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर के बाद शुरू हुआ. जब कांग्रेस ने विरोध शुरू किया तो एनडीए के कई सांसद प्रधानमंत्री के पास शिकायत लेकर पहुंच गये. उसी दौरान बीजेपी के पांच सांसदों ने योगी सरकार द्वारा दलितों के साथ भेदभाव बरतने को लेकर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख डाली.

दलितों के मसले को लेकर बीजेपी की बागी सांसद सावित्री बाई फूले एक बार फिर गुस्से का इजहार कर रही हैं. दलित भोज को बीजेपी की ही सांसद सिर्फ राजनीति चमकाने की कवायद बता रही हैं. बीजेपी सांसद ने इसे दलितों को अपमानित करने का उपक्रम बता डाला है.

फूले की ही तरह उत्तर पश्चिम दिल्ली से सांसद उदित राज भी दलित भोज को दिखावा मान रहे हैं और उनका कहना है कि इससे दलितों का भला नहीं होने वाला.

बात यहीं तक होती तो थोड़ी बहुत गुंजाइश भी रहती, खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत भी बीजेपी नेताओं की हरकतों से खासे खफा बताये जाते हैं. अंग्रेजी अखबार डेक्कन क्रॉनिकल की एक रिपोर्ट के मुताबिक भागवत ने संघ और वीएचपी नेताओं के कार्यक्रम में इस दलित भोज को ड्रामा बताते हुए बंद करने को कहा. भागवत का कहना रहा कि बेहतर होता दलित समुदाय के लोगों से बातचीत की जाती, बनिस्बत इस तरह के दिखावे के. फिर तो राहुल गांधी और मायावती को कौन कहे, जब संघ प्रमुख भागवत की भी राय भी वैसी ही है.

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मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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