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Updated: 21 अप्रिल, 2022 09:02 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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एक विज्ञापन में बड़ी ही खूबसूरत लाइन है - 'अगर दाग लगने से कुछ अच्छा होता है तो, दाग अच्छे हैं!' मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की चेतावनी को नफरत की राजनीति से जोड़ कर देखा गया, लेकिन उसका असर तो जैसे जनहित में नजर आने लगा है.

बेशक राज ठाकरे (Raj Thackeray) ने मस्जिदों से अजान के मुकाबले लाउडस्पीकर पर पांचो वक्त हनुमान चालीसा बजाने की धमकी दे रखी हो. लेकिन असर तो मंदिरों में लगे लाउडस्पीकर पर भी वैसा ही हो रहा है - और अगर इससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो रहा है तो राजनीति का ये अंदाज भी अच्छा कहा जाना चाहिये. सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के हिसाब से रात के 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं होना चाहिये.

अब अगर राज ठाकरे की एक राजनीतिक पहल से आम आदमी की जिंदगी के लिए कुछ अच्छा हो रहा हो. किसी की नींद में खलल रुक जाता हो. ध्वनि प्रदूषण कम हो जाता हो, तो ऐसी राजनीति की तो तारीफ ही करनी चाहिये.

जिस तरह से सत्ता पक्ष के नेता वैसे तो राज ठाकरे को बीजेपी (BJP) का भोंपू साबित करने की कोशिश कर रहे थे, लगा नहीं कि सरकार धमकी को गंभीरता से लेगी - लेकिन ये क्या, असर इतना तेज हुआ है जिसकी मनसे नेता को भी शायद ही उम्मीद रही हो.

राज ठाकरे की डेडलाइन अभी दो हफ्ते दूर है, लेकिन खबर है कि मुंबई की मस्जिदों के दो तिहाई लाउडस्पीकर बंद हो गये हैं - और बाकियों की आवाज धीमी हो चुकी बतायी जा रही है. महाराष्ट्र के नासिक और अन्य शहरों में भी पुलिस की तरफ से ऐसी ही तत्परता देखी जा रही है.

वैसे राज ठाकरे की धमकी का महाराष्ट्र में असर होना तो बीजेपी की बहुत बड़ी कामयाबी ही समझी जाएगी - क्योंकि मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतारने की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की घोषणा के पीछे बीजेपी का ही हाथ माना जा रहा है.

फिर क्या समझा जाये - उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की सरकार बीजेपी की रणनीति में फंस चुकी है?

मुद्दे में है दम

लाउडस्पीकर को लेकर 90 के दशक के आखिर से ही अदालतों से आदेश आने लगे थे. अलग अलग कई उच्च न्यायालयों की तरफ लाउडस्पीकर से पैदा होने वाले ध्वनि प्रदूषण से आम आदमी को निजात दिलाने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन उस पर अमल करने में राजनीतिक नेतृत्व ने न तो दिलचस्पी ली और न ही कभी इच्छाशक्ति दिखायी. 2005 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पूरी गाइडलाइन जारी की गयी - लेकिन उस पर अमल आधे अधूरे मन से ही होता दिखा.

raj tahckeray, amit shah, uddhav thackerayपहली बार उद्धव पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं राज ठाकरे

चूंकि राज ठाकरे के तेवर पहले से ही ऐसे रहे हैं कि हर किसी को उनकी हर मुहिम में उनका राजनीतिक स्वार्थ ही नजर आता है. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राजनीतिक तौर पर अब तक फेल रहने की वजह भी यही लगती है. फिलहाल महाराष्ट्र विधानसभा में मनसे के पास सिर्फ एक विधायक है.

मनसे नेता राज ठाकरे ने 3 मई के बाद मस्जिदों से लाउडस्पीकर न उतारे जाने पर धमकी दी थी कि वो हर जगह तेज आवाज में हनुमान चालीसा का बजवाएंगे. राज ठाकरे ने ये भी कह रखा है कि जब जब मस्जिद से अजान होगी, तब तब हनुमान चालीसा बजेगा. पूरे पांच बार.

राज ठाकरे के इस बयान पर उद्धव ठाकरे ने तो कुछ नहीं कहा, लेकिन आदित्य ठाकरे ने आगे आकर अपने चाचा को महंगाई और देश के सामने छाये हुए ज्वलंत मुद्दों को उठाने की सलाह दी. आदित्य ठाकरे ने बहाने से ये आरोप भी लगाया कि ये सब महाराष्ट्र में उनके पिता की गठबंधन सरकार को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है.

महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार में सबसे असरदार हिस्सेदार एनसीपी नेता शरद पवार ने सलाह दी कि राज ठाकरे को गंभीरता से लेने की जरूरत ही नहीं है. बल्कि वो तो राज ठाकरे को भी राहुल गांधी की तरह पार्टटाइम पॉलिटिशियन ही करार दिये.

शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत तो राज ठाकरे को महाराष्ट्र का ओवैसी ही बताने लगे हैं. हालांकि, संजय राउत कहते हैं कि वो किसी का नाम नहीं लिये हैं. AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी को उनके राजनीतिक विरोधी बीजेपी के सबसे बड़े मददगार के तौर पर पेश करते रहे हैं.

राज ठाकरे ने लाउडस्पीकर का मुद्दा उठाया, इसलिए संजय राउत ने मनसे नेता को ही बीजेपी का लाउडस्पीकर बता डाला. राज ठाकरे को लेकर संजय राउत के बयान के बाद तो मनसे कार्यकर्ताओं ने शिवसेना मुखपत्र सामना के दफ्तर के बाहर धमकी भरा पोस्टर ही लगा दिया - और याद दिलाने लगे कि जैसे एक बार उनकी कार पर हमला हुआ था, वैसे ही सबक सिखाया जा सकता है.

महाराष्ट्र के सत्ताधारी गठबंधन के ऐसे बयानों के बावजूद, महाराष्ट्र में जो असर दिखायी दे रहा है वो बिलकुल अलग है. असर देख कर तो यही लग रहा है कि बयानबाजी अपनी जगह रही, लेकिन उद्धव ठाकरे सरकार ने राज ठाकरे की तरफ से उठाये गये मुद्दे को काफी गंभीरता से लिया है.

महाराष्ट्र में मुहिम, असर उत्तर प्रदेश में: लाउडस्पीकर पर चेतावनी देने के आसपास ही राज ठाकरे ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की दिल खोल कर तारीफ भी की थी - और महाराष्ट्र की पहल का असर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में देखने को मिला. बनारस में छतों पर लाउडस्पीकर लगा कर एक तरह से राज ठाकरे की मुहिम का सपोर्ट किया गया.

सिर्फ वही नहीं, यूपी सरकार ने तो फटाफट गाइडलाइन भी जारी कर दी - लाउडस्पीकर तो बजा सकते हैं, लेकिन उसकी आवाज तेज नहीं होनी चाहिये. यूपी सरकार की गाइडलाइन के मुताबिक, माइक और साउंड सिस्टम का इस्तेमाल तो किया जा सकता है लेकिन ये सुनिश्चित करना होगा कि आवाज धार्मिक परिसर से बाहर न जाये - ताकि बाकियों को किसी तरह की असुविधा न हो.

यूपी सरकार ने इसके साथ ही नयी जगहों पर माइक लगाने की अनुमति न दिये जाने की भी हिदायत दे डाली है. शोभायात्रा या धार्मिक जुलूस भी बिना अनुमति के नहीं निकाले जा सकते. ऐसी अनुमति दिये जाने से पहले आयोजक की तरफ से शांति और सौहार्द्र कायम रखने के संबंध में एफिडेविट भी जमा कराया जाएगा. और ऐसी अनुमति भी सिर्फ पारंपरिक तौर पर निकाले जाने वाले धार्मिक जुलूसों को ही मिलेगी - नये आयोजनों को अनावश्यक अनुमति न दिये जाने का निर्देश भी मिला है.

मुंबई में 70 फीसदी लाउडस्पीकर बंद: मुंबई से आ रही खबरों के मुताबिक, कम से कम 70 फीसदी मस्जिदों में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बंद हो चुका है - और बाकियों में भी आवाज धीमी हो गयी है. महाराष्ट्र के डीजीपी ने पुलिस महकमे को निर्देश दिया है कि लाउडस्पीकर को लेकर वो सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस और कानून का सख्ती से पालन किया जाये.

महाराष्ट्र के गृह मंत्री दिलीप वलसे पाटिल ने यूं तो बयान ऐसा दिया है जैसे वो राज ठाकरे की राजनीति को ही नकार रहे हों, लेकिन असलियत में वो तो मनसे नेता की बातों पर अमल सुनिश्चित करते नजर आ रहे हैं. महाराष्ट्र पुलिस को राज्य की कानून व्यवस्था बनाये रखने में सक्षम बताते हुए, पाटिल कहते हैं, अगर किसी आदमी या संगठन से नफरत का माहौल राज्य में बनता है तो उस पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन लगे हाथ ये भी बताते हैं कि अजान से जुड़ी गाइडलाइंस सरकार जल्दी लेकर आएगी. ये भी बताते हैं कि डीजीपी और मुंबई पुलिस कमिश्नर को लाउडस्पीकर के संबंध में एक संयुक्त नीति बनाने का निर्देश दिया गया है.

जिस तरीके से राज ठाकरे की धमकी का असर देखा जा रहा है, लगता तो यही है कि अगर मुद्दे में दम हो तो सरकार को झुकना ही पड़ता है. भले ही महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार को या फिर केंद्र की भारी बहुमत वाली मोदी सरकार ही क्यों न हो. कृषि कानूनों के मामले तो मोदी सरकार का रवैया भी वैसा ही रहा.

क्या उद्धव ठाकरे बीजेपी की चाल में फंस गये?

उद्धव ठाकरे के बीजेपी के साथ शिवसेना का गठबंधन तोड़ लेने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में बने रहने के लिए एक मजबूत पार्टनर की जरूरत रही है. बीजेपी नेताओं की तरफ से अक्सर उद्धव सरकार के गिरने के दावे किये जाते रहे हैं - और अक्सर उसमें एनसीपी की भूमिका को संदेहास्पद दिखाने की कोशिश रही है.

जैसे ही शरद पवार दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर लेते हैं, ऐसी बातें और जोर शोर से चर्चाओं में छा जाती हैं. कई तरह की थ्योरी चलने लगती है. समझा जाता है कि बीजेपी एक साथ दोनों से मोलभाव कर सकती है. बीजेपी को मतलब तो बस इसी बात से है कि चाहे जैसे भी मौजूदा सरकार गिर जाये.

ऐसे में कभी बीजेपी और शिवसेना की सरकार के कयास लगाये जाते हैं तो कभी बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन सरकार की. जब भी ऐसी बातें होती हैं एनसीपी और शिवसेना दोनों ही एक्टिव हो जाते हैं और बीजेपी की दाल नहीं गल पाती.

मौका देख कर बीजेपी ने महाराष्ट्र गठबंधन के खिलाफ राज ठाकरे का इस्तेमाल करने का फैसला किया. असल में राज ठाकरे में घाट घाट का पानी पीकर थक चुके हैं - और उनको पार्टी के साथ साथ बेटे अमित ठाकरे को भी स्थापित करना है. मुश्किल है कि ये सब करने के लिए पहले खुद को ही खड़ा करना होगा. मौजूदा माहौल में बीजेपी के अलावा और किसी से ऐसी मदद तो मिलने से रही.

जिस तरीके से राज ठाकरे की मुहिम के बाद महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार हरकत में आयी है, भविष्य में उद्धव ठाकरे के सामने मुश्किलें बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं. ये भी लगता है कि बीजेपी अपनी तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्लोगन 'सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास' को हकीकत में भी लागू होते दिखाने की कोशिश कर रही है.

यूपी में योगी आदित्यनाथ सरकार ने जो आदेश दिये हैं वो किसी समुदाय विशेष के लिए न होकर सबके लिए है. जो आदेश मस्जिदों के लिए लागू होगा, मंदिरों पर भी उन्हीं दिशानिर्देशों का पालन होगा. जो गाइडलाइन मुस्लिम समुदाय के धार्मिक आयोजनों के लिए बनी है, वही हिंदुओं के लिए भी है.

दिल्ली में एमसीडी के बुलडोजर अभियान में भी ऐसा समभाव दिखाने की कोशिश की गयी - अगर मस्जिद के अवैध कब्जे पर बुलडोजर चला तो मंदिर को भी नहीं बख्शा गया. फिर तो महाराष्ट्र में ऐसे ही पब्लिक इंटरेस्ट के मुद्दे खोज कर उद्धव ठाकरे की चुनौतियां आगे भी बढ़ायी जा सकती हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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