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Updated: 27 दिसम्बर, 2020 12:07 PM
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राज ठाकरे (Raj Thackeray) की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मुंबई में अमेजन (Amazon) के दफ्तरों में तोड़ फोड़ को लेकर सुर्खियां बटोर रही है. एमएनएस का इल्जाम है कि अमेजन कंपनी मराठी अस्मिता का अपमान कर रही थी, लिहाजा राज ठाकरे स्टाइल में उसे सबक सिखाने की जरूरत पड़ गयी.

एमएनएस नेता अखिल चित्रे तो वादे के बिलकुल पक्के निकले. जो कहा सो किया. अमेजन से पहले ही बोल दिया था कि भारी कीमत चुकानी पड़ेगी - और चुकानी ही पड़ी है. एक दिन के तोड़ फोड़ में अमेजन की हेकड़ी निकल गयी और राज ठाकरे के खिलाफ आंख दिखाने के लिए कंपनी को माफी तक मांगनी पड़ गयी.

मराठी अस्मिता (Marathi Pride) की राजनीति में कुछ ही दिनों के अंतराल पर दो विपरीत फलक देखने को मिले हैं. एक, अभी अभी जिसे राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी MNS ने अमेजन के दफ्तरों में प्रदर्शित किया है - और दूसरी, वो जो कुछ दिनों पहले उद्धव ठाकरे ने मुंबई को लेकर कंगना रनौत की टिप्पणी पर बड़े ही धैर्य के साथ रिएक्ट किया था.

नरम और गरम दल, हमेशा ही राजनीतिक आंदोलनों और रूटीन की राजनीति का भी हिस्सा रहे हैं. आजादी के आंदोलन में भी एक छोर पर महात्मा गांधी बने रहे तो दूसरी छोर पर काफी दिनों तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस के तेवर देखने को मिले. बाल ठाकरे की शिवसेना में भी नरम दल और गरम दल शुरू से ही थे - और ये टू-इन-वन पैकेज खुद सीनियर ठाकरे ही रहे. जब देश में इमरजेंसी लागू हुई तो जो उनका रिएक्शन रहा वो नरम ही रहा, बाकी मुद्दों पर उनका तेवर गरम देखने को मिला. अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराये जाने को लेकर उनका बयान कि 'अगर ये काम शिवसैनिकों ने किया है तो मुझे उन पर गर्व है', भी एक मिसाल है.

बाद में ये राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे में बंट गया. एक गरम, एक नरम. अब ये तीसरी पीढ़ी में पहुंचने वाला है - आदित्य ठाकरे और अमित ठाकरे की राजनीति में. आदित्य ठाकरे, उद्धव ठाकरे के बेटे हैं और फिलहाल महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. अमित ठाकरे, राज ठाकरे के बेटे हैं जिनको पार्टी में जनवरी, 2020 में लांच किया जा चुका है - और अब स्थापित करने की कवायद चल रही है.

एमएनएस का मराठी अस्मिता को बचाने के नाम ताजातरीन शो भी अमित ठाकरे के मुख्यधारा की राजनीति में आने का दस्तक हो सकता है - सवाल ये है कि क्या वास्तव में एमएनएस ने अमेजन दफ्तर में तोड़ फोड़ कर मराठी अस्मिता को बचा लिया है - या उलटे कंपनी का फायदा करा दिया है?

राज ठाकरे के लोगों ने ये सब मराठी अस्मिता के नाम पर किया है. मराठी अस्मिता से किसी को खिलवाड़ न करने देने के लिए. अब कोई ये पूछता फिरे कि राज ठाकरे को गुस्सा क्यों आता है? पहले उसे ये समझ लेना चाहिये कि अमेजन को किसने इजाजत दी कि वो भारतीय भाषाओं में मराठी को नजरअंदाज करे.

किसका नुकसान, किसका फायदा?

मराठी अस्मिता का मुद्दा अभी कुछ ही दिनों पहले तब उठा था जब फिल्म स्टार कंगना रनौत ने मुंबई पुलिस को लेकर टिप्पणी की. जब शिवसेना की तरफ से संजय राउत ने मुंबई पुलिस का बचाव किया तो कंगना रनौत ने मुंबई को ही PoK बता दिया.

कंगना रनौत की इस टिप्पणी को शिवसेना ने तत्काल प्रभाव से मराठी अस्मिता से जोड़ दिया और महाराष्ट्र के सारे राजनीतिक दल एक तरफ हो गये. यहां तक कि कंगना रनौत को सपोर्ट कर रही बीजेपी के स्थानीय नेता भी कंगना रनौत के बयान से पल्ला झाड़ने लगे. साफ साफ कहने लगे कि मुंबई को पीओके बताये जाने वाले कंगना रनौत के बयान का वो कतई सपोर्ट नहीं करते.

जब मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र की शिवसेना सरकार को चैलेंज करते हुए कंगना रनौत में मुंबई का कार्यक्रम बनाया, तभी बीएमसी ने उनके दफ्तर में तोड़ फोड़ शुरू कर दी - और कंगना रनौत के केंद्र सरकार की तरफ से मिली सिक्योरिटी के साथ पहुंचने के पहले ही चलते भी बने.

गुस्से में लाल कंगना रनौत ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को जी भर कर तू-तड़ाक किया, लेकिन न तो उद्धव ठाकरे की तरफ और न ही शिवसेना से की तरफ कोई अभिलाक्षणिक प्रतिक्रिया प्रदर्शित की गयी.

कुछ ही दिन बाद जब मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के लोगों को संबोधित कर रहे थे तो इतना ही कहा कि वो बोल नहीं रहे हैं, इसका कतई ये मतलब न निकाला जाये कि उनके पास जवाब नहीं है. बाद में भी सीधे सीधे कोई जवाब तो नहीं दिया लेकिन बीजेपी नेतृत्व को कंगना रनौत के बहाने खूब खरी खोटी सुनाया था.

मराठी अस्मिता को लेकर ये उद्धव ठाकरे की प्रतिक्रिया रही - और अभी अभी उसी मुद्दे को लेकर राज ठाकरे का रिएक्शन भी देखने को मिला है. दोनों ही मामलों की बारीकी को समझना जरूरी है.

मुंबई को पीओके कहे जाने को लेकर बवाल तब शुरू हुआ जब बयानबाजी और बहस ने धीरे धीरे गंभीर रूप ले लिया. अमेजन के मामले में सीधे तौर पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. बल्कि, ये तो मुद्दा खोज कर उठाया और उकसाया गया है - और उसके साथ राजनीतिक तरीके से नहीं बल्कि गुंडई से पेश आया गया है.

अमेजन को लेकर मराठी अस्मिता वाले विवाद की शुरुआत भी दिलचस्प है. खबरों के मुताबिक, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की तरफ से अमेजन को एक पत्र लिख कर कहा गया था कि वो अपने ऐप में मराठी भाषा में भी खरीदारी का विकल्प देने का इंतजाम करे. फिर एमएनएस की तरफ से 'मराठी नहीं तो अमेजन नहीं' मुहिम चलायी जाने लगी - और एक दिन कुछ जगह अमेजन के पोस्टर फाड़ दिये गये. जेफ बेजोस की कंपनी अमेजन को राज ठाकरे के बारे में लगता है ठीक से जानकारी नहीं थी और उसने अदालत का रुख कर लिया.

अदालत में मामला पहुंचते ही आदेश जारी हो गया - राज ठाकरे 5 जनवरी को हाजिर हों! जैसे ही राज ठाकरे और एमएनएस के नेताओं को नोटिस मिला वे आपे से बाहर हो गये. सीधे सीधे धमकी दे डाली की अमेजन को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. और फिर अपनी स्टाइल में कीमत भी वसूलने लगे.

बाद में अमेजन को भी राज ठाकरे और उनके पार्टी के आगे अपनी औकात समझ में आयी और धमकी देने वाले अखिल चित्रे के नाम पत्र लिख कर बताया कि वो जल्द से जल्द मराठी भाषा को अपने ऐप में जोड़ने जा रहे हैं, लेकिन उसके लिए प्रोग्रामिंग और दूसरे इंतजामों के लिए उनको वक्त चाहिये होगा.

अमेजन के प्रतिनिधियों और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नेताओं के बीच मुंबई में एक मीटिंग हुई जो करीब 20 मिनट तक चली. अमेजन इंडिया की तरफ से उनकी लीगल टीम ने मीटिंग में हिस्सा लिया.

amazon letter to mna leaderअमेजन की तरफ से MNS नेता अखिले चित्रे को भेजा गया पत्र

एमएनएस की तरफ से इस मुहिम का नेतृत्व कर रहे अखिल चित्रे ने बताया कि पार्टी की तरफ से अमेजन के सामने तीन प्रस्ताव रखे गए - एक, अमेजन अपने ऐप पर मराठी भाषा को भी जगह दे. दो, एक लिखित कंफर्मेशन मेल भेजे - और एमएनएस प्रमुख के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को लेकर अमेजन राज ठाकरे से माफी मांगे.

क्या बात है! अगर किसी को किसी राजनीतिक दल के नेता से कोई शिकायत है तो वो अदालत न जाये. मतलब, अगर वो अदालत जाता है तो ये उस नेता की अवमानना का मामला बनेगा - और अदालत की अवमानना की ही तरह माफी मांग लेने पर उसे सजा से मुक्ति मिल सकती है.

ये एक राजनीतिक दल के नेता का व्यवहार है - और राहुल गांधी हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को तानाशाही राजनीति के लिए कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करते हैं.

वैसे राज ठाकरे और राहुल गांधी में कई कॉमन बातें भी हैं. दोनों ही राजनीति में बार बार फेल हो चुके हैं. दोनों ही नये सिरे से संभल कर खड़े होने के लिए अलग अलग तरकीबें निकाल कर नये तरीके से खड़े होने की कोशिश करते हैं - और सबसे बड़ी बात दोनों ही धुन के पक्के हैं और सही उसे ही मानते हैं तो उनके मन में होता है. चाहे लोग लाख समझायें कि जो वे कर रहे हैं वो गलत है, किसी को भी फर्क नहीं पड़ता.

लेकिन राजनीति का तकाजा देखिये कि राहुल गांधी की पार्टी कांग्रेस महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार में हिस्सेदार है और राज ठाकरे का एक एमएलए हर मौके पर न्यूट्रल बने रहने के लिए संघर्षरत रहता है.

तो ये रहा मराठी अस्मिता को लेकर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का अपना अपना तौर तरीका - अब जरा ये समझने की कोशिश करते हैं कि एमएनएस के अमेजन के खिलाफ एक्शन से कंपनी को फायदा हुआ या नुकसान?

एमएनएस और राज ठाकरे को मालूम होना चाहिये कि ये बाजार है - और अमेजन बिजनेस करने ही भारत पहुंचा है. बिजनेस को विस्तार देते हुए वो ऑनलाइन मार्केटिंग वाली कंपनियों को काफी डैमेज किया है. अमेजन वो हर तरीका अपना रहा है जिससे बाजार पर उसकी पकड़ मजबूत होती चली जाये और लॉकडाउन के दौरान तो लोगों की मजबूरी भी रही है.

गूगल की तरह अमेजन के पास भी पहले सब कुछ अंग्रेजी में ही था, लेकिन बिजनेस बढ़ाने के लिए वो हिंदी में काम शुरू किया ताकि उन लोगों तक भी पहुंचा जाये जो अंग्रेजी की वजह से उससे नहीं जुड़ पा रहे हैं या उन तक अमेजन खुद अपनी पहुंच नहीं बना पा रहा है.

अगर राज ठाकरे कोई मुहिम नहीं भी चलाते तो भी अमेजन देर सबेर मराठी में अपना काम शुरू करता ही. मराठी ही नहीं उसे बिजनेस करना है इसलिए हर भारतीय भाषा में वो सुविधायें देने की कोशिश करता - और अगर उसे लगे कि कस्टमर सपोर्ट में भोजपुरी और मैथिली बोलने वालों की जरूरत है तो वो भी करता ही.

जिसे राज ठाकरे और उनकी पार्टी मराठी अस्मिता से जोड़ कर पेश रहे हैं - वो तो अमेजन का बाजार है. देखा जाये तो एक तरीके से राज ठाकरे ने मराठी अस्मिता के नाम पर अमेजन का बाजार और कारोबार बढ़ाने में मदद ही की है - और बिसनेस के हिसाब से ये सीधा फायदा या कहें शुद्ध मुनाफा है और कुछ नहीं.

क्या अमित ठाकरे को रीलांच किया जा रहा है

महाराष्ट्र की राजनीति में आदित्य ठाकरे तो स्थापित हो गये, लेकिन अमित ठाकरे सीन में कहीं नहीं दिखाई दे रहे हैं. जनवरी, 2020 में हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अधिवेशन में अमित ठाकरे को बाकायदा पार्टी की सदस्यता दिलायी गयी - और शिक्षा को लेकर अमित ठाकरे ने संकल्प लिये. तय हुआ था कि शिक्षा सम्मेलन का नेतृत्व अमित ठाकरे ही करेंगे.

aditya thackeray, amit thackerayआदित्य ठाकरे और अमित ठाकरे की डिनर पर एक मुलाकात महाराष्ट्र में काफी चर्चित रही

अमित ठाकरे को लांच करने के साथ ही एमएनएस का नया झंडा भी लांच किया गया था. साल बीतने जा रहा है, लेकिन अभी तक अमित ठाकरे को लेकर कोई उल्लेखनीय चीज सामने नहीं आयी है. बीच बीच में महाराष्ट्र से जुड़े मुद्दों पर एमएनएस की तरफ से रिएक्शन आते रहे हैं. मसलन, कंगना रनौत पर भी महिला मोर्चा की तरफ से और योगी आदित्यनाथ के फिल्म सिटी प्रोजेक्ट को लेकर राज ठाकरे की तरफ से - लेकिन ये सब प्रासंगिक बने रहने की कोशिश भर लगती है.

2006 में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनायी थी - और 2009 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटें जीती भी थी, लेकिन 2019 में पार्टी के पास महज एक विधायक है. जाहिर है एमएनएस नेतृत्व के मन में छटपटाहट तो होगी ही - और अगर कोई ठोस राजनीतिक कार्यक्रम न हो तो छटपटाहट भी अमेजन जैसी घटना के रूप में ही दिखेगी भी.

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