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Updated: 21 दिसम्बर, 2020 02:20 PM
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कांग्रेस को नया अध्यक्ष (Congress President) मिलने में एक ही बाधा रही. और वही सबसे बड़ी मुश्किल साबित हो रही थी. लेकिन अब वो दिक्कत खत्म हो गयी है - क्योंकि राहुल गांधी (Rahul Gandhi) अब तैयार हो गये हैं. कांग्रेस जो चाहे वो जिम्मेदारी राहुल गांधी को दे सकती है. वो आगे से मना नहीं करेंगे. अच्छा हुआ मान गये. अंत भला तो सब भला.

पहले राहुल गांधी चाहते थे कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का हो, लेकिन ये ऐसा पेंच था जिस पर न गांधी परिवार में आम राय बन पाती और न ही परिवार से बाहर कांग्रेस नेताओं के बीच ही कोई राय बन पा रही थी. राहुल गांधी के राजी हुए बिना न तो कांग्रेस में संगठन चुनाव का कोई मतलब था और न ही ऐसी किसी चर्चा की.

लेकिन कांग्रेस में अब वो बात नहीं रही. सिर्फ राहुल गांधी का राजी होना ही सब कुछ नहीं है. जबरन चुप करा दिये जाने की बात और है, लेकिन सहमति बनाने में ये तरीका कारगर नहीं साबित हो रहा है. बुजुर्ग हो चुके और सीनियर नेताओं के सामने विकल्प की कमी हो सकती है, लेकिन युवा नेताओं को ऐसी किसी बात की परवाह नहीं रही, तस्वीर पहले ज्यादा धुंधली थी, अब काफी साफ हो चुकी है.

वरना, जब 10, जनपथ पर कांग्रेस की सबसे महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही हो, कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI की राष्ट्रीय प्रभारी रुचि गुप्ता को इस्तीफे के जरिये आलाकमान को मैसेज देने की जरूरत नहीं होती. वो भी तब जबकि रुचि गुप्ता को राहुल गांधी की करीबी और भरोसेमंद नेताओं में शुमार किया जाता हो.

ताज्जुब तो इस बात पर भी हुआ कि राहुल गांधी के दो बेहद करीबी नेताओं रणदीप सुरजेवाला और केसी वेणुगोपाल आखिर सोनिया गांधी की मीटिंग से दूर क्यों रहे?

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) और कमलनाथ ने मिल कर एक्शन प्लान बनाया था जिसमें सभी नेताओं के गिले-शिकवे दूर कर राहुल गांधी की ताजपोशी पार्ट 2 को आसान बनाने की कोशिश रही - लेकिन मीटिंग से जो खबरें निकल कर आयी हैं, सूत्रों के हवाले से, ऐसा तो नहीं लग रहा है कि मुश्किलों की राह के रोड़े जरा भी कम नहीं हो पाये हैं.

बताते हैं कि राहुल गांधी मीटिंग में काफी एक्टिव देखे गये - और कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी फिर से संभालने को तैयार भी नजर आये, लेकिन वो सीनियर कांग्रेस नेताओं की 'बतौर कांग्रेस अध्यक्ष काम करते हुए नजर आने' की अपेक्षाओं को यकीन दिलाते नहीं देखे गये - और यही वजह रही कि 'राहुल गांधी ही अगले अध्यक्ष बनें' की थ्योरी सभी के गले नहीं उतर रही है. राहुल गांधी के भविष्य के लिए सोनिया गांधी के सामने फिलहाल ये सबसे बड़ी मुश्किल है.

मुलाकात हुई, बात हुई - बात बनी भी क्या?

सोनिया गांधी की नजर में अहमद पटेल की खाली हुई जगह को भरने की दिशा में कमलनाथ के लिए ये मीटिंग इम्तिहान रही. मीटिंग के बाद कांग्रेस नेताओं ने तो अच्छी अच्छी बातें बतायीं, लेकिन जब सूत्रों ने ऑफ द रिकॉर्ड जानकारी देने शुरू किये तो मालूम हुआ, कमलनाथ का रिजल्ट अभी होल्ड पर रहने वाला है.

अहमद पटेल के बाद कांग्रेस के अंतरिम कोषाध्यक्ष बने पवन बंसल बताया कि सब ठीक ठाक है और दावा किया कि सभी नेताओं का कहना है कि पार्टी को राहुल गांधी के नेतृत्व की जरूरत है. G-23 के सदस्य और महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने अपडेट किया कि ऐसी और भी बैठकें होंगी - और पंचगनी या शिमला में चिंतन शिविर का आयोजन किया जाएगा.

सोनिया गांधी के सुपरविजन और कमलनाथ के संयोजन में आहूत मीटिंग में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और गुलाम नबी आजाद सहित कुल 19 कांग्रेस नेता शामिल हुए. गुलाम नबी आजाद सहति सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने वाले सात नेता भी बातचीत के लिए बुलाये गये थे.

rahul gandhi, sonia gandhi, ghulam nabi azadराहुल गांधी तो अध्यक्ष बनने के लिए तैयार हो गये हैं - कांग्रेस भी तैयार है क्या?

हैरानी की बात ये रही कि अलग अलग वजहों से वे दो नेता शामिल नहीं हुए जिनके बगैर बीते कई साल में शायद ही कोई मीटिंग पूरी मानी गयी हो - रणदीप सिंह सुरजेवाला और केसी वेणुगोपाल. बोले तो 12, तुगलक लेन की आंख और कान. जिनके बगैर राहुल गांधी की राजनीति अधूरी मानी जाती है. घोषित तौर पर, पूछे जाने पर, बताया तो यही गया कि रणदीप सुरजेवाला पीठ दर्द से जूझ रहे हैं - और केसी वेणुगोपाल किसी काम से दिल्ली से बाहर थे. हालांकि, मालूम हुआ कि ये आधा सच ही था.

दरअसल, रणदीप सुरजेवाला ने मीटिंग से पहले ही दावा किया था कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक ठाक है और 'मेरे सहित' 99.9 फीसदी कांग्रेस नेता चाहते हैं कि राहुल गांधी ही फिर से कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठें. सोशल मीडिया पर रणदीप सुरजेवाला के बयान की खूब खिंचायी हुई - कई ट्विटर यूजर का कहना रहा कि 100 फीसदी बीजेपी नेता भी यही चाहते हैं कि राहुल गांधी ही फिर से कांग्रेस की कमान संभालें.

मीटिंग के बाद गुलाम नबी आजाद को रणदीप सुरजेवाला के बयान पर रिएक्ट करते भी सुना गया - 'जब सब कुछ ठीक ही था तो मीटिंग बुलाई ही क्यों गई - और बुलाई भी गई तो ये पांच घंटे तक क्यों चली?'

परंपरा के मुताबिक, होता तो यही कि पवन बंसल और पृथ्वीराज चव्हाण नहीं, बल्कि, रणदीप सुरजेवाला ही मीडिया के सामने आते और बताते कि मीटिंग में क्या क्या हुआ - और तब शायद गुलाम नबी आजाद का रिएक्शन भी बाद में किसी बातचीत या इंटरव्यू में ही सुनने को मिलता.

रणदीप सुरजेवाला और केसी वेणुगोपाल को लेकर चर्चा ये है कि आलाकमान ने जानबूझ कर उनको मीटिंग से बाहर रखा - और ये चर्चा भी कोई हवा हवाई नहीं लगती है.

ऐसा इसलिए किया गया ताकि असंतुष्ट नेताओं से जो संवाद कायम करने की कोशिश की जा रही है वो निर्बाध चले. समझा ये गया कि राहुल गांधी के करीबी नेताओं के होने पर सीनियर बेझिझक अपनी बात नहीं कह पाते. अगर ऐसी कोई कोशिश होती तो राज्य सभा सांसदों वाली मीटिंग का हाल हो जाता. वो मीटिंग जिसमें कपिल सिब्बल के आत्ममंथन के सुझाव पर राजीव सातव उखड़ गये थे और बीच बीच में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी हस्तक्षेप करना पड़ा था.

सलाह किसी की भी हो, ऐसा लगता है कमलनाथ को भी लगा होगा कि अगर फिर से वैसी ही परिस्थिति बन गयी तो बात बनने की जगह बिगड़ भी सकती है. निश्चित तौर पर सोनिया गांधी और उनका मुंह देखकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा भी सहमत हुए होंगे.

पवन बंसल के मुताबिक, मीटिंग में सोनिया गांधी ने कहा, 'हम सभी एक परिवार की तरह हैं और सभी को मिलकर पार्टी को मजबूत करना है.' जब असंतुष्ट नेताओं ने अपना पक्ष रखा तो सोनिया गांधी ने भरोसा दिलाया कि वो उन सभी की जो भी फिक्र है, उसे दूर करने की कोशिश करेंगीं. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का इस बात पर ज्यादा जोर रहा कि पार्टी में आंतरिक संवाद को मजबूत किया जाना चाहिये.

जैसा कि मीटिंग के बाद कांग्रेस नेताओं ने बताया भी कि आने वाले दिनों में ऐसी और मीटिंग हुआ करेंगी, लेकिन असंतुष्ट नेताओं को अभी तक कोई उम्मीद नहीं बंधी है, ऐसा उनसे जुड़े सूत्रों ने मीडिया से बातचीत में स्वीकार किया है - और सबसे खास बात राहुल गांधी की वापसी को लेकर भी कोई सहमति देखने को मिली हो, ऐसा नहीं लगता.

अध्यक्ष पद को लेकर चर्चा क्यों नहीं हुई?

मीटिंग में राहुल गांधी काफी एक्टिव दिखे, फिर भी उनकी टीम और उनके कामकाज से चिढ़े हुए नेताओं के मन में अभी कोई खास उम्मीद नहीं जगी है. सोनिया गांधी ने ये मीटिंग इसीलिए बुलायी थी ताकि राहुल गांधी के सामने कहीं जितेंद्र प्रसाद जैसे विरोध की स्थिति न बन जाये, जैसा कि उनके साथ हो चुका है.

वैसे रणदीप सिंह सुरजेवाला और केसी वेणुगोपाल के मीटिंग से दूर रहने का फायदा ये हुआ है कि असंतुष्ट नेताओं ने काफी हद तक खुल कर अपनी बात भी रखी है - ऐसा नेताओं का कहना रहा कि कांग्रेस में अब बुजुर्गों और सीनियर नेताओं की पूछ नहीं रही और ऐसे नेताओं को अब किसी काम का नहीं समझा जाता. ये सुनने के बाद राहुल गांधी को खुद सफाई देनी पड़ी क्योंकि ये उन पर ही सीधा हमला था.

मीटिंग से छन छन कर आयी खबरों के मुताबिक, राहुल ने माना कि वो गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, भूपिंदर सिंह हुड्डा जैसे नेताओं का काफी सम्मान करते हैं क्योंकि वे उनके पिता राजीव गांधी के दोस्त हैं - और उन सभी का कांग्रेस को कायम रखने में काफी योगदान भी है. राहुल गांधी ने ऐसे नेताओं को भरोसा दिलाया कि ऐसी कोशिश होगी कि उनके मन में ऐसे ख्याल न आयें. राहुल गांधी ने अपनी पहली ताजपोशी के वक्त भी ऐसा ही दावा किया था - और समझाने की कोशिश की थी कि कांग्रेस में न तो कोई मार्गदर्शक मंडल बनाया जाता है और न ही बीजेपी की तरह लालकृष्ण आडवाणी जैसे बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार कर दिया जाता है. राहुल गांधी ने तब सबको साथ लेकर चलने का वादा किया था, लेकिन गुजरते वक्त के साथ न तो वो खुद को खड़ा रख पाये न ही ऐसे वाकयों को.

मीटिंग के दौरान कुछ नेताओं ने राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने की गुजारिश की. राहुल गांधी ने कोई भी जिम्मेदारी संभालने के लिए हामी तो भरी लेकिन अध्यक्ष पद पर चर्चा ये कहते हुए टाल दी कि चुनावी प्रक्रिया के दरम्यान ये मुद्दा छोड़ना ही बेहतर होगा.

राहुल गांधी की बात अपनी जगह है, लेकिन सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने वाले नेताओं की डिमांड तो कांग्रेस के अध्यक्ष की कुर्सी ही रही है. ऐसे नेताओं की शिकायत भी यही रही है कि जिन मुद्दों को वे उठा रहे हैं उस पर कोई चर्चा ही नहीं होती.

ये ठीक है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान इस बात पर चर्चा से परहेज ठीक होगा कि राहुल गांधी को ही अध्यक्ष बनना चाहिये, लेकिन इससे इतर अध्यक्ष पद को लेकर सामान्य चर्चा तो हो ही सकती है. एक अपडेट ये है कि कांग्रेस के चुनाव प्राधिकरण के प्रमुख मधुसूदन मिस्त्री ने वोटर का डाटा बेस और उनके पहचान पत्र का काम काफी हद तक पूरा कर लिया है.

ये मीटिंग और भी सार्थक हो सकती थी अगर सारी बातें छोड़ कर अध्यक्ष पद को लेकर ही चर्चा हुई होती. मीटिंग में जिन सात नेताओं को बुलाया गया था उनको अपनी पूरी बात खुल कर कहने के लिए छोड़ दिया गया होता तो संभव था बाहर निकल कर गुलाम नबी आजाद ये नहीं कहते कि मीटिंग बुलाने और पांच घंटे तक चर्चा की जरूरत ही क्या थी? ये तो साफ साफ बता रहा है कि गुलाम नबी आजाद के मन में जो बातें भरी हुई हैं उनको बाहर आने का मौका नहीं मिला है. वरना, वो भी पवन बंसल और पृथ्वीराज चव्हाण की तरह ही बात करते होते.

अच्छा तो यही होगा कि कमलनाथ और थोड़ी हिम्मत दिखायें और सोनिया गांधी को समझायें कि शुरुआत हो चुकी है, लेकिन अगली मीटिंग में असंतुष्ट नेताओं की भड़ास पूरी तरह बाहर निकल सके ऐसे इंतजाम किये जायें. हो सके तो सुरजेवाला और वेणुगोपाल जैसे और भी नेता लगते हों तो उनको भी एक-दो मीटिंग से बाहर रखा जाये.

अगर कमलनाथ ऐसा कर पाते हैं तो उनका भविष्य भी उज्ज्वल रहेगा - क्योंकि उनका भविष्य भी अब राहुल गांधी और राहुल गांधी का कांग्रेस के भविष्य पर निर्भर करता है.

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