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Updated: 10 जुलाई, 2019 08:18 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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राहुल गांधी को लेकर हफ्ते भर पहले खबर आयी थी कि वो अमेरिका जाने वाले हैं. अपनी मां सोनिया गांधी के साथ. बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में बताया गया वो तो पहले से ही बाहर हैं. तब के प्रोग्राम के हिसाब से राहुल गांधी को पांच जुलाई को अमेरिका रवाना होना था. 5 जुलाई को भी बजट पेश हुआ था. राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों बजट के समय संसद में मौजूद रहे. उसके बाद राहुल गांधी मुंबई और पटना की अदालतों में मानहानि के मुकदमों में पेश हुए.

राहुल गांधी की विदेश यात्रा के बारे में कोई सार्वजनिक अपडेट नहीं आया है, लेकिन अमेठी जाने को लेकर राहुल गांधी ने खुद ट्विटर पर जानकारी दी - और कुछ देर बाद पहुंच भी गये.

बताते हैं राहुल गांधी अमेठी में कार्यकर्ताओं से मिल कर हार की समीक्षा करने वाले हैं - सवाल ये है कि अमेठी में वो अपनी हार की समीक्षा कर रहे हैं या फिर कांग्रेस की हार की?

एक हारे हुए उम्मीदवार का संसदीय क्षेत्र का दौरा, वो भी देर से

राहुल गांधी अमेठी के दौरे पर पहुंच ही गये. राहुल गांधी ऐसे दौर में एक दिन के लिए अमेठी दौरा प्लान किया है जब न तो वो अमेठी से सांसद हैं, न ही कांग्रेस के अध्यक्ष. राहुल गांधी का ये दौरा महज एक कांग्रेस कार्यकर्ता के तौर पर है. अपने ट्विटर अकाउंट पर भी राहुल गांधी ने फिलहाल यही विवरण दिया हुआ है. पहले उस जगह AICC अध्यक्ष लिखा हुआ होता था.

राहुल गांधी ने एक बात बार बार साफ करने की कोशिश की है - 'मैं अब कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हूं.' फिर भी कई कांग्रेस नेता ये मानने को राजी नहीं हैं. कुछ कांग्रेस नेता तकनीकी आधार पर तो कुछ भावनात्मक तौर पर अब भी राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष की ही तरह समझते हैं.

वस्तुस्थिति जो भी हो, ये तो सिर्फ राहुल गांधी का दौरा है जिनका कहना है कि वो कांग्रेस पार्टी के एक समर्पित कार्यकर्ता हैं - और ताउम्र बने रहेंगे. तब तो इसे एक हारे हुए उम्मीदवार के अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा भी कह सकते हैं - लेकिन इतनी देर से क्यों? बड़ा सवाल यही है.

आखिर राहुल गांधी ने अब तक अमेठी से दूरी क्यों बनाये रखा?

राहुल गांधी ही नहीं, बल्कि पूरा गांधी परिवार अब तक अमेठी से दूरी बनाये हुए था. ऐसा 23 मई के बाद पहली बार देखने को मिला. 23 मई को ही आम चुनाव के नतीजे आये थे और मालूम हुआ राहुल गांधी अमेठी में 50 हजार से ज्यादा वोटों से हा गये हैं.

rahul gandhi himself displayed the difference with smriti iraniआखिर राहुल गांधी और स्मृति ईरानी में अमेठी वालों को फर्क किसने समझाया?

चुनाव नतीजे के बाद राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र के दौरे पर गये थे - लेकिन वहां जहां से पहली बार जीते हैं - वायनाड, वहां नहीं जहां पहली बार हार गये हैं - अमेठी. अमेठी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करने वाले राहुल गांधी अकेले नहीं हैं, सोनिया गांधी जब रायबरेली पहुंची तो साथ में प्रियंका गांधी वाड्रा भी गयी थीं. चलिये मान लेते हैं कि सोनिया गांधी रायबरेली से सांसद हैं, इसलिए अमेठी वाले उनके नहीं आने का उतना बुरा नहीं माने होंगे - लेकिन प्रियंका वाड्रा तो कांग्रेस महासचिव हैं और अमेठी भी उनके कार्यक्षेत्र में ही आता है.

1. हार की समीक्षा में क्या हासिल : अगर राहुल गांधी अपनी हार की समीक्षा करने अमेठी गये हैं तो आखिर उन्हें नयी कौन सी बात मालूम हो सकती है. अमेठी के नतीजे को लेकर फीडबैक तो राहुल गांधी को पहले ही मिल चुका है - अगर ऐसा न होता तो वायनाड से उनके चुनाव लड़ने की जरूरत ही क्या होती?

तो क्या राहुल गांधी उन बातों को वेरीफाई करने की कोशिश कर रहे हैं जिनके बारे में जान कर उन्हें वायनाड की ओर रूख करना पड़ा था?

2. राहुल से पहले प्रियंका वाड्रा की समीक्षा : राहुल गांधी कांग्रेस की हार की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं, इसलिए प्रियंका वाड्रा की तरह किसी और पर तोहमत मढ़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता. वैसे राहुल गांधी के अमेठी पहुंचने से पहले तो रायबरेली जाकर प्रियंका वाड्रा ने हार की समीक्षा तो कर ही ली है. हार की समीक्षा क्या की, ठीकरा भी कार्यकर्ताओं के सिर पर ही फोड़ दिया. प्रियंका वाड्रा का कहना रहा कि जमीनी कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस के लिए ठीक से काम नहीं किया, जो कांग्रेस महासचिव की नजर में कांग्रेस के आम चुनाव में हार की वजह बनी.

3. अमेठी दौरे के बाद क्या : वायनाड जाने से पहले राहुल गांधी ने अमेठी के लोगों की दिल खोल कर तारीफ की थी. राहुल गांधी का कहना रहा कि ये अमेठी के लोगों का दिया हुआ संस्कार ही है जिसकी बदौलत वो वायनाड का रूख कर पा रहे हैं. लगता है चुनाव बाद नतीजे अलग अलग आये तो इरादा बदल गया. वायनाड पहुंच कर राहुल गांधी बताने लगे जैसे जन्म से ही वहीं के हों.

राहुल गांधी ने अमेठी के लिए एक दिन का ही कार्यक्रम बनाया, जबकि वायनाड तीन दिन के दौरे पर गये हुए थे - साफ है अमेठी को लेकर राहुल गांधी गंभीर तो बिलकुल नहीं हैं, महज रस्मअदायगी कर रहे हैं.

अमेठीवालों के मन में सवाल तो होंगे ही!

अमेठी दौरे के साथ साथ राहुल गांधी ने ट्विटर पर एक और भी जानकारी दी - राहुल गांधी के ट्विटर पर 10 मिलियन फॉलोवर हो चुके हैं. अपने ट्वीट के माध्यम से राहुल गांधी ने बताया कि खुशी का ये मौका वो अमेठी के लोगों के साथ सेलीब्रेट कर रहे हैं. वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्विटर पर 48.5 मिलियन फॉलोवर हैं, जबकि अरविंद केजरीवाल के 15 मिलियन.

राहुल गांधी के पहुंचने से पहले ही अमेठी में पोस्टर लगे देखे गये जिस पर लिखा है - 'न्याय दो, न्याय दो, मेरे परिवार को न्याय दो, दोषियों को सजा दो' इस अस्पताल में जिंदगी बचाई नहीं, गंवाई जाती है.'

poster in amethi against rahul gandhi 'न्याय' की मांग के साथ अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ पोस्टर

पोस्टर में जिस अस्पताल का जिक्र है उसका नाम है - संजय गांधी अस्पताल. राहुल गांधी इस अस्पताल के ट्रस्टी हैं. ये पोस्टर चाहे जिस किसी ने भी लगाये या लगवाये हों, आशंका तो यही है कि राहुल गांधी के विरोधी ही होंगे. इस मामले में भी राहुल गांधी के बचाव में प्रियंका वाड्रा पहले ही कूद पड़ीं. रायबरेली के एक अस्पताल में बदइंतजामी पर सवाल उठाते हुए प्रियंका वाड्रा ने यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि राहुल गांधी के पहली बार अमेठी जाने के पहले सांसद और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी तीन बार हो आयी हैं. पहली बार तो वो चुनाव नतीजे के तीन दिन बाद ही 26 मई को पहुंची थीं जब उनके एक करीबी नेता सुरेंद्र सिंह की हत्या हो गयी थी. स्मृति ईरानी ने सुरेंद्र सिंह के शव को कंधा देकर तारीफ भी खूब बटोरी थी. दूसरी बार जब 22 जून को स्मृति ईरानी अमेठी पहुंची तो एक बीमार महिला को अपनी गाड़ी से अस्पताल भी पहुंचाया. स्मृति ईरानी 6 जुलाई को भी अमेठी गयी थीं, जब राहुल गांधी पटना कोर्ट में पेश हुए थे.

राहुल गांधी की ये कोशिश अमेठी के लोगों से फिर से कनेक्ट होने की लगती है. अगर वायनाड से पहले ही एक चक्कर अमेठी का लगा लिये होते तो राहुल गांधी को लेकर अमेठी में अलग भावना होती.

राहुल गांधी अमेठी ऐसे समय पहुंचे हैं जब कांग्रेस देश भर में चुनौतियों से जूझ रही है - और खुद भी वो मानहानि आधा दर्जन मुकदमे में जगह जगह पेशी देते फिर रहे हैं. कांग्रेस के पास व्यावहारिक तौर पर कोई अध्यक्ष नहीं है. कर्नाटक की गठबंधन सरकार ऑपरेशन लोटस की शिकार होकर झूल रही है. मध्य प्रदेश में भी कमलनाथ आक्रांत हैं और सरकार चलती रहे इसके लिए हर संभव कोशिशों में जुटे हैं. राजस्थान का नंबर कब आ जाएगा किसी के लिए भी अंदाजा लगा पाना मुश्किल हो रहा है. ये कांग्रेस की खुशकिस्मती है कि अमित शाह और वसुंधरा राजे वैसे रिश्ते मेंटेन नहीं करते जैसा बीएस येदियुरप्पा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष के साथ बनाये हुए हैं.

आखिर राहुल गांधी के दौरे को लेकर अमेठी के लोगों के मन में सवाल तो होंगे ही - वैसे क्या क्या सवाल हो सकते हैं?

1. क्या राहुल गांधी को अमेठी के लोगों से दूर चले जाने का दुख हो रहा है - और उसी की वजह से वो मिलने पहुंचे?

2. क्या राहुल गांधी अमेठी के लोगों से नाराज थे कि वोट नहीं दिये और उन्हें गांधी परिवार के गढ़ में ही हार का मुंह देखना पड़ा? अगर ये वजह है तो क्या राहुल गांधी को अपनी गलती का एहसास हो चुका है?

3. क्या राहुल गांधी यूपी में होने जा रहे उपचुनावों को लेकर अमेठी के बहाने सूबे के लोगों को कोई संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं?

4. क्या राहुल गांधी का ये दौरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाराणसी पहुंच कर आने वाले चुनावों के सिलसिले में विपक्ष को 'पेशेवर निराशावादी' करार देने के बाद खुद को मैदान में बने होने का एहसास कराने का प्रयास है?

5. क्या राहुल गांधी का ये दौरा खेद प्रकट करने जैसा है - और अगर ऐसा है तो क्या अमेठी के लोग राहुल गांधी को माफ कर देंगे?

सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते. ऐसा कहा करते हैं, ये भी जरूरी नहीं कि हर मामले में ये बात लागू ही हो. भूले तो राहुल गांधी भी किसी सुबह ही थे - और तब से न जानें कितनी शामें गुजर चुकी हैं, अमेठीवालों की इंतजार करते करते - लेकिन वो लौटे बहुत देर से. खुशी से लौटे हैं या मजबूरी में लौटना पड़ा है ये समझना तो थोड़ा मुश्किल है - लेकिन लौटे हैं ये सच है. ऐसे ही एक बार केजरीवाल भी इस्तीफा देकर भाग खड़े हुए थे. जब उन्हें भगोड़ा कहा जाने लगा तो पूरी दिल्ली में घूम घूम कर माफी मांगने लगे - लोगों ने माफी भी ऐसी दी जैसी दुनिया में कम लोगों को ही मिली होगी - क्या राहुल के साथ भी अमेठी के लोग ऐसा ही करेंगे?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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