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Updated: 16 जून, 2019 01:54 PM
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प्रियंका वाड्रा से उम्मीदें हद से ज्यादा कर ली गयी थीं. प्रियंका वाड्रा में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अक्स देखा जाता रहा है - और उनसे वैसे ही करिश्मे और चमत्कार की अपेक्षा होने लगी थी. एकबारगी तो प्रियंका वाड्रा इस इम्तिहान में फेल हो गयी हैं - लेकिन ये तो कोई वजह नहीं कि वो आगे भी कामयाब नहीं होंगी. जब कांग्रेस नेतृत्व राहुल गांधी को इतनी बार आजमा सकता है - तो प्रियंका दो अभी अभी दाखिल ही हुई हैं. ये ठीक है कि प्रियंका वाड्रा के साथ 'प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः' वाला हाल हुआ है - लेकिन ये अभी शुरुआत है. अभी लंबा सफर बाकी है.

कांग्रेस को खड़ा करने में चुनौतियों की तुलना राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के हिसाब से करें तो कई फर्क हैं. कांग्रेस की विरोधी बीजेपी के लिए देखें तो राहुल गांधी के मुकाबले प्रियंका वाड्रा आसान टारगेट हो सकती हैं.

प्रियंका की कमजोरी, मुश्किलें और चुनौतियां

अगर प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस नेतृत्व मिल कर पार्टी की कमान संभालने का फैसला करते हैं - तो ऐसी कई चुनौतियां हैं जो राह की मुश्किलें बन सकती हैं.

1. रॉबर्ट वाड्रा सबसे बड़ी कमजोरी : प्रियंका वाड्रा ने रॉबर्ट वाड्रा को खुला सपोर्ट और राजनीति की औपचारिक शुरुआत साथ साथ ही की थी, जाहिर ये आगे भी जारी रहेगा और ये उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है. प्रियंका वाड्रा के मुख्यधारा की राजनीति में आने की एक बड़ी वजह रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मामले भी रहे. रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मामलों को राजनीति से प्रेरित मानते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने फ्रंटफुट पर आकर जंग लड़ने का सामूहिक फैसला किया.

कहने को तो 2014 के आम चुनाव और हरियाणा विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी नेता रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ एक्शन लेने और जेल भेजने तक की बातें करते रहे - लेकिन पांच साल ऐसा कुछ नहीं हुआ. थोड़ी बहुत शुरुआत हुई भी तो आम चुनाव के ऐन पहले.

priyanka gandhi's weak pointप्रियंका गांधी की राजनीति की राह में रॉबर्ट वाड्रा कमजोर कड़ी हैं

बीजेपी नेतृत्व ने जिनकी जगह जेल में है उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचाने का चुनावों में फिर से वादा कर रखा है. मुमकिन है, ये मुद्दा तब और तूल पकड़े जब हरियाणा विधानसभा के लिए चुनाव हों - प्रियंका वाड्रा का ये सबसे कमजोर पक्ष है और बड़ा चैलेंज भी.

2. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा चैलेंज : फर्ज कीजिये प्रियंका वाड्रा कमान संभाल लेती हैं तो कांग्रेस को खड़ा करने के लिए सीधे सीधे सत्ताधारी बीजेपी नेतृत्व से दो-दो हाथ करना होगा. कांग्रेस को लोगों से कनेक्ट करने के लिए बीजेपी को उन मुद्दों पर घेरना होगा जो उसकी कमजोरी है. राफेल जैसे मुद्दे पर तो कतई नहीं. बीजेपी की कमजोरी भ्रष्टाचार नहीं है, राहुल गांधी के सलाहकार ये बात कभी समझ ही नहीं पाये - रोजगार और आर्थिक मुद्दे तो राफेल से बेहतर ही रहते और बीजेपी को बचाव में आना पड़ता.

बहरहाल, बीजेपी को कठघरे में खड़ा करने से पहले कांग्रेस को लोगों के बीच जाना होगा और बताना होगा कि पार्टी खत्म नहीं हुई है और उसके पास भी पब्लिक वेलफेयर प्रोग्राम हैं. न्याय स्कीम को किसी ने खराब नहीं कहा, लेकिन वो गलत वक्त पर लांच होने के कारण पिट गयी.

3. कांग्रेस को विपक्ष का नेता बनना होगा : सोनिया गांधी ने 10 साल तक कांग्रेस को सत्ता में बनाये रखा - और विपक्ष उनके साथ बना रहा. सोनिया के लिए मुश्किल होता अगर वो खुद प्रधानमंत्री बनी होतीं - लेकिन कांग्रेस के बहुमत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री पद ठुकरा कर सोनिया ने विपक्ष में अपने प्रति भरोसा बढ़ा दिया. मनमोहन सिंह जैसे नेता को प्रधानमंत्री बनाने के साथ ही सोनिया गांधी ने बहुत सारी मुश्किलें एक ही झटके में खत्म कर ली.

राहुल गांधी लगातार मशक्कत के बावजूद खुद को विपक्षी खेमे में फिट नहीं कर पाये. ज्यादातर सीनियर नेता राहुल गांधी से कतराते रहे. कांग्रेस नेताओं का प्रधानमंत्री पद राहुल गांधी के लिए रिजर्व रखा जाना भी उन पर भारी पड़ा. नतीजा ये हुआ कि सोनिया गांधी को फिर से मोर्चे पर लौटना पड़ा है.

अब अगर प्रियंका वाड्रा को कांग्रेस की कमान संभालनी है तो या तो उन्हें खुद को साबित करना होगा कि विपक्षी दल कांग्रेस की अगुवाई स्वीकार करें - या फिर उन्हें भी प्रियंका वाड्रा जैसा कोई बीच का रास्ता निकालना होगा या जैसे इंदिरा गांधी ने चौधरी चरण सिंह के साथ खेल खेला और राजीव गांधी ने चंद्रशेखर को सपोर्ट देने और वापस लेने में कॉपी-पेस्ट किया वैसी कोई तरकीब निकालनी होगी.

राहुल गांधी ने प्रियंका वाड्रा को चुनावों में पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी थी - लेकिन असली जिम्मेदारी तो अमेठी की ही थी. पूर्वी उत्तर प्रदेश को लेकर तो कई बार लगा कि प्रियंका वाड्रा 2019 नहीं बल्कि 2022 के विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रही हैं और शायद यही वजह रही कि अमेठी के मामले में उतनी गंभीरता नहीं दिखायी जितनी जरूरत थी.

होना तो ये चाहिये था कि प्रियंका वाड्रा को सबसे ज्यादा ध्यान अमेठी पर ही देना चाहिये था. स्मृति र्ईरानी का गुजरात से आकर गांधी परिवार के गढ़ में 3 लाख वोट हासिल कर लेना बहुत बड़ी बात थी. ये कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा अलर्ट था. किसी भी खुफिया अलर्ट जैसा लेकिन सरेआम. ये तो नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस नेतृत्व ने अमेठी सीट को बहुत हल्के में ले लिया क्योंकि ऐसा होता तो राहुल गांधी वायनाड से जन्म का रिश्ता बनाने के चक्कर में नहीं पड़ते. फिर भी प्रियंका वाड्रा के लिए मुख्य फोकस अमेठी होना चाहिये था. अगर अमेठी में राहुल गांधी हारे नहीं होते तो मौजूदा हालात बेहतर होते. 2014 से पहले तो अमेठी में कांग्रेस नेताओं के लिए चुनाव लड़ना किसी तफरीह जैसा ही रहता होगा - चुनौती तो पहली बार स्मृति ईरानी ने दी थी. नतीजा सामने है.

अभी तो कांग्रेस के लिए पूरा देश अमेठी जैसा ही हो चुका है - अव्वल तो प्रियंका गांधी वाड्रा के नये अवतार का इंतजार करना होगा, फिर देखना होगा कि वो कांग्रेस के लिए कितना उपयोगी साबित होती हैं.

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