New

होम -> सियासत

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 28 अप्रिल, 2022 07:27 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
  • Total Shares

प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) और कांग्रेस दोनों को एक दूसरे की शिद्दत से जरूरत है, फिर भी आपस में तालमेल बिठा पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा - ये दोनों की जरूरत पर हावी जिद भर नहीं है, बल्कि एक दूसरे का फायदा उठाने की होड़ में अब तक भरोसे का रिश्ता न बन पाना भी है.

राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को बार बार कांग्रेस (Congress) की दुर्गति के लिए दोष नहीं दिया जा सकता. अभी तो बिलकुल भी नहीं - क्योंकि प्रशांत किशोर के साथ हफ्ता भर से ज्यादा चली बैठकों में भी राहुल गांधी उतनी ही रुचि ले रहे थे, जितनी उनकी राजनीति में होती है.

और ये बात भी प्रशांत किशोर ने जल्दी ही महसूस कर ली थी, लिहाजा वो प्रियंका गांधी के रास्ते आगे बढ़े और सीधे सोनिया गांधी को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे. ऐसी सूरत में वो प्रियंका गांधी के लिए तो महत्वपूर्ण भूमिका चाहते थे, लेकिन बाकी सीनियर नेताओं को दरकिनार कर सिर्फ सोनिया गांधी को रिपोर्ट करना चाहते थे.

अपने सलाहकारों के साथ सोनिया गांधी ने भी प्रशांत किशोर के प्रस्ताव को गंभीरता से लिया और ऐसा भी लगता है कि काफी उदार होकर स्वीकार भी किया, लेकिन कुछ हदें भी पहले से ही तय कर ली गयीं - और फिर बड़ी ही संजीदगी के साथ एक दूसरे का पूरा फायदा उठाने की भी दोनों तरफ से कोशिशें शुरू हो गयीं.

कांग्रेस चाहती थी कि प्रशांत किशोर पार्टी ज्वाइन कर लें और टीम के साथ काम करें, जैसे बाकी नेता करते रहे हैं. बल्कि कई सीनियर नेताओं के मुकाबले ज्यादा सुविधा के साथ. प्रशांत किशोर जो तय कर रखे थे, उससे कम पर मानने को राजी न थे.

कांग्रेस की ओर से कुछ अधिकार देने के साथ अपेक्षा रही कि प्रशांत किशोर चुनाव जिताने की जिम्मेदारी लें, लेकिन प्रशांत किशोर पहले अधिकार चाहते थे और जिम्मेदारी लेने से संकोच कर रहे थे - वैसे भी प्रशांत किशोर को भी मालूम तो है ही कि कांग्रेस के लिए चुनावों में जीत की जिम्मेदारी लेना कितना जोखिमभरा है.

अब सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि राहुल गांधी ने शुरुआती दौर में ही बोल दिया था कि प्रशांत किशोर कांग्रेस नहीं ज्वाइन करने जा रहे हैं. शायद राहुल गांधी ने अपने हिसाब से ठोक बजा कर प्रशांत किशोर के इरादे भांप लिये थे - और इसीलिए माना जा रहा था कि वो महत्वपूर्ण मानी जा रही मीटिंग छोड़ कर विदेश दौरे से भी हो आये थे. वैसे राहुल गांधी के विदेश दौरे को तरजीह देने का उदाहरण देने से कांग्रेस और प्रशांत किशोर के बीच बैठकों की अहमियत कम नहीं समझी जा सकती. राहुल गांधी तो चुनावी रैली छोड़ कर भी विदेश दौरे पर निकल जाते हैं - और कांग्रेस के स्थापना दिवस के महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए भी अपना दौरा नहीं टालते.

देखा जाये तो कांग्रेस के साथ बातचीत प्रशांत किशोर की तरफ से वैसी ही कोशिश रही, जैसी 2014 के आम चुनाव के बाद बीजेपी नेतृत्व के साथ हुई बतायी जाती है. बीच में मिलते जुलते कंडीशन में प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार को समझा बुझा कर जेडीयू में अपने मनमाफिक पोजीशन हासिल कर ली थी, लेकिन चल नहीं पाये.

प्रशांत किशोर बिहार और बंगाल चुनावों में कैंपेन के दौरान बाहरी और स्थानीयता का मुद्दा उछाल कर पूरा फायदा उठा लेते हैं, लेकिन अपनी बात आने पर शायद भूल जाते हैं कि मुख्यधारा की राजनीति में वो बिलकुल बाहरी हैं - और पॉलिटिक्स में कभी ऐसा नहीं हुआ कि लेटेरल एंट्री को भी उतनी ही तवज्जो मिले.

विचारधारा न सही, अवसरवादिता भी नहीं चलेगी

अगर प्रशांत किशोर को लगता है कि वो भी ज्योतिरादित्य सिंधिया, मुकुल रॉय या हिमंत बिस्वा सरमा जैसे हैं, तो अपने बारे में बहुत बड़ी गलतफहमी पाल रखी है - और जितना जल्दी ये भूल कर हकीकत स्वीकार कर लेंगे आगे की चीजें उतनी ही आसान हो जाएंगी.

prashant kishor, rahul gandhiकांग्रेस क्या किसी भी पार्टी में अहमद पटेल कोई यूं ही नहीं बन सकता!

बेशक राजनीति में फायदेमंद चीजों को बिजनेस की तरह ही तरजीह मिलती है, लेकिन अगर कोई सियासत को भी कारोबार जैसा ही समझता है, तो शॉर्ट कट तरीके से सब कुछ हासिल नहीं कर सकता. अगर ऐसे कुछ मिल भी जाता है तो उसका एक लेवल होगा और ऊपर से नकेल भी कसी रहेगी.

प्रशांत किशोर को बाकी सेलीब्रिटी की तरह ही राजनीति में भाव मिल रहा है, लेकिन जो पहले से राजनीति में है, वो किसी बाहरी व्यक्ति से बहुत कुछ शेयर करने में झिझक महसूस करता है. चूंकि प्रशांत किशोर चुनावी प्रबंधन के काम से जुड़े हैं, इसलिए उनके हिस्से में कुछ ज्यादा मिल सकता है - लेकिन एक झटके में सब कुछ कभी नहीं मिलने वाला है.

खरीद बिक्री हर जगह नहीं चलती: जैसे 2015 के बिहार चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच फंसे पेंचों को सुलझाया करते थे, बंगाल में शुभेंदु अधिकारी को मनाने के लिए उनके घर तक पहुंच गये थे - और उसी दौरान लेफ्ट के छोटे छोटे नेताओं को भी टीएमसी में लेने की कोशिश कर रहे थे.

ऐसे ही एक नेता के घर जाकर प्रशांत किशोर के आदमी उसे समझाने लगे कि वो अब तक किराये के मकान में रहते हैं और उनके पास गाड़ी तक नहीं है - फिर ऑफर दिये कि अगर वो ममता बनर्जी को ज्वाइन कर लें तो ये सब सही हो जाएगा - और उस नेता के रिएक्शन के बाद प्रशांत किशोर की टीम को मुंह छिपाने की जगह नहीं बची थी, लेकिन उनका तो बिजनेस ही ऐसा है, ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. उस नेता ने सीधे सीधे कह दिया कि निकल जाओ - 'कम्युनिस्ट को खरीदा नहीं जा सकता.'

प्रशांत किशोर के खिलाफ ऐसी ही दलीलें पेश की जा रही हैं. जिसने कोई चुनाव न लड़ा हो, जिसकी अपनी कोई विचारधारा न हो - जो किसी भी पार्टी के लिए पैसे लेकर काम करने के लिए हरदम तैयार रहता हो.

अगर प्रशांत किशोर की कोई विचारधारा नहीं है तो अब तक अरविंद केजरीवाल की ही कोन सी विचारधारा लगती है - और उसी हिसाब से प्रशांत किशोर भी अवसरवादिता की राजनीति करना चाहते हैं. चुनाव लड़ना भी कहां जरूरी है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 10 साल के कार्यकाल में चुनाव लड़ने के नाम पर तो राज्य सभा का ही चुनाव लड़े थे.

प्रशांत किशोर की छवि अब भी एक पेशेवर कारोबारी की ही है, जो सिर्फ पैसे के लिए काम करता है. पहले तो कुछ शर्तें भी हुआ करती थीं, लेकिन अब तो वो भी नहीं रहा. जैसे बाकी क्षेत्रों में ठेके पर काम होते हैं, प्रशांत किशोर भी ठेकेदारी करते हैं. बस फील्ड अलग चुना है. बाकी ठेकों में तो काफी कुछ पारदर्शी भी है, लेकिन प्रशांत किशोर का काम ऐसा बिलकुल नहीं लगता.

वो काम के लिए किससे कितनी फीस लेते हैं, किसी को नहीं मालूम. जो पेमेंट होता है, उस पैसे का सोर्स क्या है? क्या वो लोगों के पैसे होते हैं, जो दान या टैक्स के रूप में किसी और काम के लिए दिये गये होते हैं और इस्तेमाल कहीं और होता है? ऐसे पैसे तो सार्वजनिक हितों के लिए होते हैं, लेकिन फायदा किसी एक को मिलता है, जिसके पास खर्च करने का अधिकार हासिल होता है - और उसी पैसे के बल पर वो फिर से खर्च करने का अधिकार हासिल कर लेता है.

ऐसे तमाम सवाल हैं. बेशक एक निश्चित दायरे में ऐसी डील के अधिकार मिले हुए हैं, करीब करीब वैसे ही जैसे दो एडल्ट को निजी तौर पर साथ रहने का अधिकार मिला हुआ है, लेकिन प्रशांत किशोर का बिजनेस सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़ा है और उसमें किसी भी सूरत में लोकहित आड़े नहीं आना चाहिये.

मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स यूं ही नहीं हो सकती: किरण बेदी से लेकर शशि थरूर तक पॉलिटिक्स में बाहर से टपक पड़ने तमाम उदाहरण देखने को मिले हैं, लेकिन किसी को भी एक हद से आगे बढ़ते नहीं देखा गया है.

किरण बेदी का शुरू से ही बड़ा नाम रहा. पहली महिला आईपीएस अफसर से लेकर कानून और व्यवस्था के मामले में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक को नही बख्शने वाली अफसर के रूप में. अन्ना हजारे के साथ रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में भी काफी एक्टिव रहीं, लेकिन जब बीजेपी नेतृत्व ने अचानक से पार्टी ज्वाइन करा कर दिल्ली में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया तो कार्यकर्ताओं में इतना गुस्सा भर गया कि बीजेपी को चुनाव से पहले ही हार का आभास हो गया था.

शशि थरूर भी उसी यूनाइटेड नेशंस में काम किया करते थे, जहां से एक अलग फील्ड में प्रशांत किशोर के पास भी काम करने का अनुभव रहा है. शशि थरूर संयुक्त राष्ट्र महासचिव का भी चुनाव लड़ चुके हैं - और उनके चुनाव कैंपेन को देखें तो पाते हैं कि कैसे निजी तौर पर वो चीन के नेतृत्व को भी अपने रास्ते में आड़े न आने के लिए मना चुके थे. मतलब, ये कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम कर चुका वैसा कोई नेता तब कांग्रेस के पास नहीं था जब उनको विदेश राज्य मंत्री बनाया गया.

शशि थरूर के अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के अनुभव की बदौलत उनको कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं मिला. शशि थरूर का कार्यकाल भी छोटा ही रहा, लेकिन उनके कैबिनेट मंत्री एसएम कृष्णा रहे - जो एक बार भारत की जगह उसी संयुक्त राष्ट्र में किसी और मुल्क का भाषण बांच रहे थे.

अरुण शौरी पत्रकारिता के क्षेत्र में उच्चतम स्तर पर काम कर चुके थे. किताबें भी कई लिखी और अपनी फील्ड में हर संभव उम्दा काम किये, लेकिन जब एनडीए सरकार में मंत्री बनाया गया तो दर्जा राज्य मंत्री का ही मिला, कैबिनेट रैंक नहीं.

प्रशांत किशोर को लगता है कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ पहली बार में ही सीधे मुख्यमंत्री बन गये - और फिर मोदी तो सीधे प्रधानमंत्री भी बन गये. ये सही है कि न नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बनने से पहले विधायक थे, न प्रधानमंत्री बनने से पहले सांसद ही. केंद्र में मंत्री बनने का तो सवाल ही नहीं था - लेकिन मोदी और योगी दोनों ही ने जमीन पर काम किया था. लोगों के बीच बने रहे. ऐसा बिलकुल नहीं कि किसी बाहरी दुनिया से राजनीति में आये और देखते देखते लोगों के चहेते बन गये.

अरविंद केजरीवाल के मामले में भी ऐसा ही कहा जा सकता है. क्योंकि राजनीति में आने से पहले वो लोगों के बीच काम कर रहे थे. कई मुहिम भी चलायी थी. देश में बड़ा आंदोलन किया - और लोगों का विश्वास जीता फिर राजनीति में आये.

सब कुछ फटाफट हासिल करने की तमन्ना

थोड़ा ध्यान से देखें तो कांग्रेस के साथ भी प्रशांत किशोर की बातचीत उसी मोड़ पर टूटी है, जहां बीजेपी के साथ खत्म हो गयी थी. तब की बातों को याद करें तो कांग्रेस में भी प्रशांत किशोर वही रुतबा और वही अधिकार चाहते थे.

नीतीश कुमार की अपनी अलग मजबूरी रही होगी, इसलिए प्रशांत किशोर की बात मान लिये थे. प्रशांत किशोर के लिए तब जेडीयू में उपाध्यक्ष पद का सृजन हुआ था - लेकिन आगे क्या हुआ? प्रशांत किशोर दो कदम भी ढंग से चल नहीं पाये थे.

अब इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि जेडीयू में प्रशांत किशोर को 2019 के चुनाव कैंपेन से भी दरकिनार कर दिया गया था. ये बात भी प्रशांत किशोर ने खुद ही ट्वीट कर बतायी थी. कह रहे थे सीनियर नेताओं से सीख रहे हैं. कटाक्ष अच्छा किया था, लेकिन टिक कहां पाये - जेडीयू में तो एक ही पावर सेंटर रहा, कांग्रेस में तो दर्जन भर खड़े हो जाते. अलग अलग तरीके से.

अहमद पटेल की जगह कोई कैसे ले सकता है: हो सकता है प्रशांत किशोर को लगता होगा कि जो काम अहमद पटेल करते रहे, वो खुद भी तो कर ही सकते हैं. कुछ काम के अनुभव तो हैं ही, लेकिन अहमद पटेल मुख्यधारा की राजनीति में थे - और धीरे धीरे अपना कार्यक्षेत्र जरूरत के मुताबिक निर्धारित कर लिये थे. प्रशांत किशोर को ऐसा क्यों लगता है कि अहमद पटेल सिर्फ डील और फंड का इंतजाम किया करते थे?

सोनिया गांधी ने प्रशांत किशोर के लिए एम्पॉवर्ड एक्शन ग्रुप का गठन किया था, लेकिन वो ग्रुप का सदस्य न होकर उसे हेड करना चाहते थे. भला सोनिया गांधी किसी बाहरी व्यक्ति को पहली बार में ही इतनी बडी जिम्मेदारी कैसे दे देतीं. ले देकर जो बचा खुचा है, वहीं तो कांग्रेस का सरमाया है. भला वो किसी ऐसे शख्स से कैसे शेयर कर लें जिसके कांग्रेस के तमाम विरोधियों से संबंध हों.

आखिर समझाने वाले तो सोनिया गांधी को ये भी समझाये ही होंगे कि प्रशांत किशोर बीजेपी नेतृत्व के संपर्क में बिलकुल नहीं है, ये गारंटी कौन दे सकता है. नीतीश कुमार का भी तो यही कहना था कि वो बीजेपी नेता अमित शाह के कहने पर ही प्रशांत किशोर को जेडीयू में लिये थे.

जब इंदिरा गांधी के जमाने से कांग्रेसी रहे कमलनाथ या दिग्विजय सिंह और अशोक गहलोत जैसे नेता जीतोड़ कोशिश के बावजूद अहमद पटेल की जगह नहीं ले पा रहे हैं, तो प्रशांत किशोर की क्या बिसात?

इन्हें भी पढ़ें :

गांधी परिवार और प्रशांत किशोर मिले ही थे बिछड़ जाने को!

Prashant Kishor के लिए कांग्रेस का माहौल जेडीयू से कितना अलग होगा

Prashant Kishor से कांग्रेस और गांधी परिवार को ये 5 फायदे हो सकते हैं

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय