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Updated: 13 फरवरी, 2020 10:21 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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दिल्ली चुनाव में जीत के जोश से भरपूर आम आदमी पार्टी बिहार चुनाव (Bihar Election 2020) को लेकर फीडबैक जुटाने लगी है. आप के बिहार यूनिट के अध्यक्ष शत्रुघ्न साहू का कहना है कि तैयारियों को लेकर उन्हें आलाकमान से निर्देश मिल चुका है, लेकिन AAP सांसद संजय सिंह का कहना है कि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को लेना - और अभी उसका इंतजार है. दिल्ली की सत्ता में अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) की आम आदमी पार्टी की वापसी में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) का बड़ा रोल माना जा रहा है - और वो भी बिहार को लेकर मन ही मन कुछ बड़ा प्लान कर रहे हैं.

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ चुनाव प्रचार कर और प्रशांत किशोर को जेडीयू से निकाल कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों के कॉमन दुश्मन बन चुके हैं. केजरीवाल और प्रशांत दोनों ही मानते हैं कि नीतीश कुमार (Nitish Kumar with BJP support) उनके खिलाफ जो भी कदम बढ़ा रहे हैं वो बीजेपी से रिश्ते मजबूत करने की कोशिश है.

अरविंद केजरीवाल और प्रशांत किशोर दोनों की ही बिहार को लेकर किसी भी प्लान की सीमाएं तय हैं. नीतीश कुमार के साथ बीजेपी डटी हुई है - और ऐसे में प्रशांत किशोर, नीतीश कुमार के खिलाफ कोई भी लामबंदी करते हैं या रणनीति बनाते हैं तो उसके सफल होने की कम ही संभावना लगती है - उसके कारण भी साफ हैं.

खुद को आजमाने का ख्याल तो ठीक है

अरविंद केजरीवाल ने बुराड़ी सीट पर आम आदमी पार्टी को रिकॉर्ड जीत दिलाकर नीतीश कुमार से आधा बदला तो ले ही लिया है. बुराड़ी सीट बीजेपी ने गठबंधन के तहत जेडीयू को दी थी और अमित शाह के साथ नीतीश कुमार ने साझा रैली कर अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगा था.

नीतीश कुमार ने बुराड़ी के मंच से अरविंद केजरीवाल से सवाल भी पूछा था कि दिल्ली में किया ही क्या है? नीतीश कुमार ने पूर्वांचल के लोगों को धोखा देने का भी अरविंद केजरीवाल पर इल्जाम लगाया था, लेकिन बुराड़ी के लोगों ने आप उम्मीदवार को 85 फीसदी वोट देकर फैसला सुना दिया कि सारे आरोप बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित हैं.

बीजेपी से रिश्ता निभाने के चक्कर में नीतीश कुमार ने अरविंद केजरीवाल से अपनी गहरी दोस्ती तोड़ ली है. नीतीश कुमार के लिए ये कोई नयी बात नहीं है. बीजेपी से रिश्ता तोड़ कर वो लालू प्रसाद से हाथ मिला चुके हैं और फिर महागठबंधन छोड़ कर फिर से NDA में शामिल हो चुके हैं.

अरविंद केजरीवाल की ही तरह बीजेपी के साथ बने रहने के लिए नीतीश कुमार ने 2015 में मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलाने वाले प्रशांत किशोर को जेडीयू से बाहर कर दुश्मनी मोल ली है. समझने वाली बात ये है कि प्रशांत किशोर और अरविंद केजरीवाल फिलहाल साथ साथ हैं - और नीतीश कुमार दोनों के फिलहाल कॉमन दुश्मन बन चुके हैं.

16 फरवरी को अरविंद केजरीवाल तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं - और उसके दो दिन बाद 18 फरवरी को प्रशांत किशोर ने बिहार जाने का कार्यक्रम बना रखा है. प्रशांत किशोर ने बिहार जाने का प्लान पहले ही बना रखा था. जब नीतीश कुमार ने नागरिकता कानून पर उन्हें हद में रहने की सलाह दे रहे थे तो प्रशांत किशोर का कहना था कि वो पट्ना पहुंच कर जवाब जरूर देंगे. तभी अगले ही दिन नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने प्रशांत किशोर को बाहर किये जाने की घोषणा कर दी.

arvind kejriwal, nitish kumar, prashant kishorप्रशांत किशोर और अरविंद केजरीवाल पर बिहार में अकेले भारी पड़ेंगे नीतीश कुमार

प्रशांत किशोर नागरिकता कानून पर गैर बीजेपी मुख्यमंत्री को विरोध के लिए ललकार रहे थे. कांग्रेस पर तो प्रशांत किशोर के ललकारने का असर भी हुआ और उसके बाद ट्विटर पर उन्होंने राहुल गांधी को टैग कर धन्यवाद भी दिया. माना जा रहा था कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की जीत पक्की करने के लिए प्रशांत किशोर आप नेता को चुप रहने की सलाह देकर खुद आवाज बुलंद किये हुए हैं - और दोनों अपने मिशन में कामयाब भी हो चुके हैं. अब दोनों की नजर अपने कॉमन गोल पर है - बिहार विधानसभा चुनाव.

अगर भविष्य के किसी प्लान को लेकर बिहार चुनाव में हाथ आजमाने का इरादा है, फिर तो ठीक है - लेकिन अगर अरविंद केजरीवाल और प्रशांत किशोर एक साथ या अलग अलग नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री न बनने देने का इरादा रखे हुए हैं तो आगे चल कर निराशा हाथ लग सकती है.

नीतीश के खिलाफ चेहरा कौन होगा?

राजनीति के मैदान में औपचारिक एंट्री से पहले जो स्थिति अरविंद केजरीवाल की रही, एक छोटी सी राजनीतिक पारी खेल कर भी प्रशांत किशोर उससे जरा भी बेहतर स्थिति में नहीं हैं. किसी दौर में अरविंद केजरीवाल को भी एक भरोसेमंद चेहरे की जरूरत थी और वो महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि से अन्ना हजारे को रामलीला मैदान तक लाने में सफल रहे - बाकी काम आगे आगे होता गया. प्रशांत किशोर जेडीयू में नीतीश के बाद नंबर दो की स्थिति में भले ही रहे, लेकिन अपनी कोई राजनीतिक जमीन तैयार करने का कोई मौका उन्हें नहीं मिल पाया. शुरू शुरू में पटना यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव में वो कमाल जरूर दिखाये लेकिन ऐसे विवादों में फंसे कि आम चुनाव में प्रचार के काम से ही उन्हें दूर कर दिया गया. तब प्रशांत किशोर ने कुछ नौजवानों से बातचीत में समझाने की कोशिश की थी कि अगर वो किसी को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बना सकते हैं तो बिहार के नौजवानों को मुखिया और विधायक भी बनवा सकते हैं. जेडीयू में प्रशांत किसोर के विरोधियों ने एक साथ मिल कर प्रशांत किशोर पर हमला बोल दिया. कोई चारा न देख प्रशांत किशोर अपने क्लाइंट के कैंपेन में जुट गये. आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने का क्रेडिट मिलने के बाद उद्धव ठाकरे को भी महाराष्ट्र में बीजेपी के खिलाफ डटे रहने के लिए मानसिक मजबूती देने में प्रशांत किशोर के दिमाग का ही खेल माना जाता है. अरविंद केजरीवाल से पहले से वो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं जहां वो 2021 में तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश में जुटी हैं.

प्रशांत किशोर अगर अरविंद केजरीवाल को बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ प्रोजेक्ट कर आगे बढ़ना चाहते हैं तो पहले ही नतीजे का अंदाजा पहले ही लगा लेना चाहिये - अगर बिहार में अरविंद केजरीवाल गुड-गवर्नेंस का मॉडल लेकर भी जाते हैं तो उनका हाल भी वैसा ही होगा जैसा असर महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड से लेकर दिल्ली तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हो रहा है - हो सकता है उससे से भी बुरा हो. अरविंद केजरीवाल आप का पंजाब और गोवा में आजमा चुके हैं - और हरियाणा में चुनाव लड़ने की घोषणा करके भी रस्मअदायगी के लिए स्थानीय नेताओं के भरोसे मैदान छोड़ कर नतीजे भी देख चुके हैं. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली का चुनाव जरूर जीत लिया है लेकिन दिल्ली से बाहर अभी कोई भी बड़ी उम्मीद पालना ठीक नहीं रहेगा.

नीतीश कुमार को अमित शाह बिहार में एनडीए का नेता घोषित कर चुके हैं - ये दोनों ही पक्षों की आपसी मजबूरी है. नीतीश को भी मालूम है कि मौजूदा हालात ऐसे हैं कि बगैर बीजेपी के सपोर्ट के वो खड़े नहीं रह सकते और बीजेपी भी अभी तक नीतीश कुमार के मुकाबले कोई नेता नहीं तैयार कर पायी है.

ऐसा में बड़ा सवाल यही उठता है कि नीतीश कुमार के मुकाबले विपक्ष का चेहरा कौन होगा?

बिहार में वो गठबंधन अब भी है जिसकी बदौलत नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे. नीतीश कुमार के छोड़ कर चले जाने के बाद महागठबंधन में आम चुनाव के दौरान उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी सहित कई नेता जुड़े थे, लेकिन अब वे भी साथ छोड़ चुके हैं. अभी की स्थिति यही है कि आरजेडी और कांग्रेस दोनों महागठबंधन में साथ हैं. आरजेडी ने तेजस्वी यादव को पार्टी का मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर रखा है. कांग्रेस के पास भी अभी कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो नीतीश के मुकाबले तेजस्वी को पास कर खड़ा किया जा सके.

अगर आम आदमी पार्टी को भी प्रशांत किशोर गठबंधन में शामिल होने के लिए मना लेते हैं तो नये तरह की मुश्किलें होंगी. लालू यादव से गले मिलने पर सफाई देने वाले अरविंद केजरीवाल भला तेजस्वी यादव से हाथ मिलाने को कैसे सही ठहराएंगे - और नीतीश भी तो पूछेंगे ही कि जिस भ्रष्टाचार के आरोप पर उन्होंने महागठबंधन को छोड़ा उसी से केजरीवाल ने हाथ मिला लिया है.

2015 में मोदी-शाह के खिलाफ प्रशांत किशोर चुनाव मुहिम में इसलिए कामयाब रहे क्योंकि लालू प्रसाद के जंगलराज के साये में ही सही, सुशासन का एक भरोसेमंद चेहरा नीतीश कुमार उनके पास थे - वही नीतीश कुमार इस बार सामने होंगे.

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Arvind Kejriwal, Prashant Kishor, Nitish Kumar

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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