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Updated: 03 सितम्बर, 2019 01:06 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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अरसे से एक आम धारणा बनी हुई है कि मॉब लिंचिंग की घटनाओं में शिकार सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोग होते हैं - लेकिन देश के कई हिस्सों में हाल फिलहाल 'बच्चा चोर' बताकर किसी को भी पकड़ कर पिटाई कर देना और अगर कोई बचाने वाला न हो तो पीट पीट कर मार डालने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं.

आखिर ये सब क्या हो रहा है? संभल में तो ऐसी ही बेकाबू भीड़ ने बच्चा चोरी के नाम पर एक मंदबुद्धि व्यक्ति को पीट-पीटकर मार ही डाला. आलम ये है कि पुलिस के तमाम अफसर लोगों को ऐसी अफवाहों से बचने की सलाह दे रहे हैं.

मॉब लिंचिंग का सबसे चर्चित केस रहा - राजस्थान के अलवर में पहलू खान की भीड़ द्वारा पीट पीट कर हुई हत्या. 14 अगस्त, 2019 को ही अलवर कोर्ट से खबर आयी कि पहलू खान केस में सभी आरोपी बरी हो गये हैं. फिर दिल्ली के जेसिका लाल केस की तरह लोग कहने लगे कि पहलू खान को भी किसी ने नहीं मारा! जो केस चला उसके मुताबिक पहलू खान को गोरक्षकों के एक ग्रुप ने पीट पीट कर मारा डाला था - ये तो सच रहा, लेकिन पुलिस ने जिन लोगों को आरोपी बना कर पेश किया वे साफ साफ बच गये क्योंकि पुलिस अदालत को ये समझा नहीं सकी कि पकड़े गये आरोपी ही हत्यारे हैं. आखिर पहलू खान के हत्यारे कौन थे या हैं? हत्यारे जो कानून के बताये जाने वाले लंबे हाथ की पकड़ के बाहर हैं.

सवाल ये उठता है कि क्या पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ सबूत नहीं जुटाये या फिर किसी को भी पकड़ कर अदालत में पेश कर दिया और वे सबूतों के अभाव में या संदेह का फायदा उठाकर छूट गये?

पुलिसवालों के कामकाज, उनकी ड्यूटी, लाइफस्टाइल और परिवारों पर एक सर्वे आया है. सर्वे में बहुत सारी बातें हैं जो हैरान जरूर करती हैं - लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है - मुस्लिम समुदाय को लेकर पुलिसवालों की पहले से गढ़ी हुई सोच. भला पुलिसकर्मी किसी समुदाय विशेष के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त कैसे हो सकते हैं - और अगर ऐसा है तो ये बड़ी चिंता की बात है!

मॉब लिंचिंग का नया फॉर्म

मॉब लिंचिंग का कहर एक बार फिर बढ़ने लगा है. देश के कई हिस्सों से लोगों के भीड़ की हिंसा के शिकार होने की खबरें लगातार आ रही हैं. ऐसी घटनाएं दिल्ली और एनसीआर के साथ साथ उत्तर प्रदेश बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश से भी दर्ज करायी जा रही हैं.

police arrest alleged mob lynchersUP की बुलंदशहर पुलिस ने इन 12 लोगों को 'बच्चा चोर' बता कर मॉब लिचिंग के आरोप में गिरप्तार किया है

पहले ऐसी घटनाएं गोहत्या के नाम पर होती रही हैं, इन दिनों ट्रेंड थोड़ा बदला है जिसमें किसी को भी पकड़ उसे बच्चा चोर बता दिया जा रहा है और फिर आस पास भीड़ जुट जाती है. उसके बाद तो स्थिति बेकाबू हो जाती है. अगर किसी ने दखल दी या पुलिस बुला ली तो ठीक वरना मौत निश्चित है. सबसे ज्यादा ये मामले यूपी के विभिन्न इलाकों से आ रहे हैं - लखनऊ, कानपुर, रायबरेली, फतेहपुर, बहराइच, मेरठ, बलुंदशहर, बागपत, हापुड़ और अलीगढ़ हर जगह एक जैसा ही हाल हो चला है.

यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सभी जिले के पुलिस प्रमुखों को बच्चा चोर बता कर भीड़ को उकसाने वाले या ऐसे कारनामों में शामिल अपराधियों के खिलाफ NSA के तहत कार्रवाई करने का आदेश दिया है.

1. संभल में एक पुल के नीचे एक शव पड़ा देखा गया. पुलिस ने अपनी तरफ से पता कर लिया कि वो एक मंदबुद्धि व्यक्ति था और पुल से गिरने से उसकी मौत हो गयी. पुलिस अभी केस दर्ज करने ही वाली थी कि एक वायरल वीडियो से मालूम हुआ कि कुछ लोग उस युवक को मारते-पीटते घसीटते हुए गांव से बाहर ले जा रहे हैं. पता चला वो शख्स पुल से गिरने से नहीं बल्कि भीड़ की पिटाई से जान गवां बैठा.

2. अमरोहा में एक महिला ने 40 साल के एक मंदबुद्धि शख्स पर अपने 6 साल के बच्चे को छीन कर ले जाने का आरोप लगाया. ये सुनते ही लोगों की भीड़ जमा हो गयी है और उसे पीट पीट कर मार डाला.

3. मुरादाबाद मंडल के रामपुर, अमरोहा और संभल जिलों से बच्चा चोरी के शक में तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दिये जाने का मामला भी सामने आया है.

4. गाजियाबाद में एक महिला अपने पोते को लेकर चप्पल खरीदने बाजार गयी थी. अचानक लोग उसे बच्चा चोर बोल कर पीटने लगे. भीड़ में से ही किसी ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस के आने पर मालूम हुआ कि लोगों ने महिला को बच्चा चोर इसलिए समझ लिया क्योंकि बच्चा का रंग उससे अलग गोरा था.

5. मेरठ में पुलिस ने मॉब लिंचिंग के आरोप में 15 लोगों को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार लोगों में 10 वे भी शामिल हैं जिन्होंने एक महिला को बच्चा चोर बता कर हमला बोल दिया था. 5. शामली में रस्सी बेच रहीं पांच महिलाओं को लोगों की भीड़ ने घेर कर पीट दिया. पुलिस के मुताबिक ये महिलाएं गुजरात के सूरत से रस्सी और खिलौने बेचने आई थीं.

ये सभी घटनाएं वैसी ही हैं जैसी गोहत्या के नाम पर होती हुई दर्ज की जाती रही हैं. हर घटना में कोई अफवाह फैला रहा है और फिर भीड़ पीटना शुरू कर दे रही है - जिसका अंत मौत तक हो सकती है. आखिर जिन घटनाओं को मुसलमानों के खिलाफ मॉब लिंचिंग बतायी जाती है, उनमें भी तो कोई लोग ऐसे ही पीट पीट कर मार दिये जाते हैं.

कहते हैं भीड़ के पास कोई दिमाग नहीं होता. भीड़ के पीछे हर बार कोई एक दिमाग होता है जो उसे भड़का कर अपने मंसूबों को अंजाम देता है. मॉब लिंचिंग की पुरानी और ताजा घटनाएं दोनों ही एक जैसी लगती हैं - किसी न किसी इंसान के खिलाफ, न कि किसी मुसलमान के खिलाफ. मुसलमानों के खिलाफ अगर कोई नयी सोच सामने आयी है तो वो मॉब लिंचिंग में शामिल लोगों से कहीं ज्यादा खतरनाक है - और ये है पुलिसवालों का पूर्वाग्रह.

ऐसी सोच वाले भला क्या इंसाफ दिलाएंगे?

एक एनजीओ कॉमन कॉज और CSDS यानी सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज ने देश भर के पुलिसकर्मियों पर एक सर्वे कराय है जिसे जस्टिस जे चेलमेश्वर ने हाल ही में एक कार्यक्रम में रिलीज किया है.

सर्वे में शामिल पुलिसकर्मियों की राय से मालूम होता है कि अगर कोई भीड़ गोकशी के मामले में किसी आरोपी को सजा देती है तो ये स्वाभाविक बात है. ठीक वैसे ही, सर्वे बताती है, जैसे भीड़ का बलात्कार के मामलों में भीड़ की सजा एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है.

सबसे ज्यादा ताज्जुब तो ये जान कर होता है - 'देश के हर दो पुलिसवालों में से एक पुलिसकर्मी मानता है कि मुस्लिमों का अपराध की तरफ स्वभाविक तौर पर झुकाव होता है.' आतंकवादी गतिविधियों के इल्जाम से बड़ी संख्या में आरोपियों के छूट जाने के मामलों से इसे समझने की कोशिश की जा सकती है.

ये सर्वे रिपोर्ट 33 हजार पुलिसकर्मियों और उनके परिवारवालों से बातचीत के आधार पर तैयार की गयी है. ये रिपोर्ट पुलिस फोर्स की संख्या और काम करने के हालात को लेकर तैयार की गई है. देश के 21 राज्यों में हुए इस सर्वे में 12 हजार पुलिसकर्मी और 11 हजार पुलिसकर्मियों के परिवारवाले शामिल किया गये हैं.

2016 में टाउनहाल कार्यक्रम में एक सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, 'रात भर असामाजिक काम में लिप्त रहने वाले कई लोग गोरक्षा का लबादा पहनकर समाज में इज्जत पाना चाहते हैं. अगर इनका डॉजियर तैयार हो तो 70 फीसदी लोग ऐसे निकलेंगे जिनका गोरक्षा से कोई मतलब नहीं है... वे रात में असामाजिक काम करते हैं... वे गोरक्षा के नाम पर दूसरों को प्रताडि़त करते हैं...'

हो सकता है राज्य सरकारों ने प्रधानमंत्री की सलाह पर कोई ऐसा डॉजियर तैयार कराया हो, लेकिन अभी तक कभी सामने तो आया नहीं है. वैसे अब तो डॉजियर तैयार करने वाले ही शक के घेरे में आ चुके हैं. जब डॉजियर तैयार करने वाला पहले से ही ये मान कर चल रहा हो कि गोरक्षा ने नाम पर मॉब लिंचिंग करने वाले एक तरीके से इंसाफ ही कर रहे हैं, फिर क्या फायदा!

अब अगर पहलू खान के केस की जांच करने वाले पुलिसवालों की भी सोच ऐसी ही रही होगी तो भला क्या उम्मीद की जाये?

ये सर्वे निश्चित तौर पर कई बातें सामने ला रहा है. फिर भी सारे के सारे पुलिसवालों के बारे में ऐसी धारणा बना लेना तो वैसी ही बात होगी जैसा पुलिस वाले मुस्लिम समुदाय को लेकर बना चुके हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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