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Updated: 29 मार्च, 2021 03:29 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंदिरा गांधी को याद किया है - और एक पखवाड़े के भीतर ऐसा दूसरी बार है जब उनके भाषण में नेहरू-गांधी परिवार का जिक्र हुआ है. अभी 12 मार्च को ही प्रधानमंत्री मोदी ने दांडी मार्च के सिलसिले में आयोजित एक कार्यक्रम में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तारीफ की थी - और अब बांग्लादेश दौरे में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम लिया है. ये दोनों ही मौके और नेहरू-इंदिरा की सकारात्मक लहजे में चर्चा दुर्लभ वाकयों में शुमार किया जाएगा, लेकिन ऐसा किये जाने के पीछे जो खास मकसद है उसे भी समझना दिलचस्प होगा.

नेहरू की चर्चा तो मोदी के मुंह से अब तक सरदार पटेल के प्रसंग में ही सुनने को मिलता रहा है - अगर नेहरू की जगह सरदार पटेल पहले प्रधानमंत्री बने होते तो आज देश की तस्वीर और ही होती. मोदी के शासन में अब तक जिस तरीके से पाकिस्तान के खिलाफ दो-दो सर्जिकल स्ट्राइक को प्रोजेक्ट किया गया है, 1971 के भारत-पाकिस्तान जंग का वैसे अंदाज में शायद ही कभी जिक्र हुआ हो.

क्या बांग्लादेश की जमीन से प्रधानमंत्री मोदी का इंदिरा गांधी की तारीफ करना देश की राजनीति में किसी सकारात्मक बदलाव का संकेत है?

हो सकता है, राहुल गांधी और सोनिया गांधी के मन में एक पल के लिए 'सत्यमेव जयते' जैसी फीलिंग हुई हो. कांग्रेस नेतृत्व को लग रहा हो कि 2014 से कांग्रेस के अब तक के शासन को खारिज करने को लेकर बीजेपी नेतृत्व को अपनी खास अवधारणा को लेकर कोई त्रुटि महसूस हुई हो. ये भी हो सकता है कि राहुल और सोनिया गांधी अपने साथी नेताओं के साथ चर्चा कर रहे हों कि देर से ही सही, चलो कम से कम गांधी परिवार के बलिदान और नेहरू की दूर दृष्टि का प्रधानमंत्री मोदी को अहसास तो हुआ.

अगर गांधी परिवार और कुछ कांग्रेस नेताओं के साथ साथ बीजेपी के राजनीतिक विरोधी भी एक जैसा ही सोच रहे हैं तो ये राजनीतिक समझ की बलिहारी ही कही जाएगी.

ये जरूर है कि बांग्लादेश की आजादी के जश्न में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम नहीं लेते तो थोड़ा आश्चर्य होता ही. इंदिरा गांधी भी देश की ही प्रधानमंत्री रही हैं - और नरेंद्र मोदी भी, न कि कांग्रेस और बीजेपी के. वैसे तो राहुल गांधी को भी संसद में अक्सर 'आपके प्रधानमंत्री' बोलते सुना और देखा गया है, लेकिन टोके जाने पर वो भूल सुधार भी कर लेते हैं.

ये कहना भी सतही सोच ही होगी कि बांग्लादेश की आजादी की स्वर्ण जयंती के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी का इंदिरा गांधी का नाम लेना एक रस्मअदायगी और राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा भर है. ध्यान देने पर प्रधानमंत्री मोदी के बयान के गंभीर मायने समझने की कोशिश की जा सकती है.

क्या ऐसा नहीं लगता कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ढाका में इंदिरा गांधी का नाम लेकर कोई खास संदेश देने की कोशिश की है. ये संदेश देश की राजनीति से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए कूटनीतिक ज्यादा है - और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए भी खास पैगाम है.

ढाका से इस्लामाबाद संवाद वाया इंदिरा गांधी

निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गांधी परिवार की विरासत बचाने और कांग्रेस के अस्तित्व के लिए लगातार संघर्ष कर रहे राहुल गांधी हमेशा ही सवालों के घेरे में रखते हैं. निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री मोदी पुलवामा हमले के बाद से गांधी परिवार को पाकिस्तान के नाम पर कठघरे में खड़ा करते रहे हों - और निश्चित तौर पर पूरा बीजेपी अमला कांग्रेस और गांधी परिवार को भारत-चीन तनाव के बीच हमलावर रहा हो, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मंचों से ऐसा कम ही होता है.

ढाका में प्रधानमंत्री मोदी ने बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध की चर्चा करते हुए युवावस्था में अपने सत्याग्रह और गिरफ्तारी दिये जाने का भी जिक्र किया - और सोशल मीडिया पर ये ट्रेंड भी करने लगा. साथ ही, प्रधानमंत्री मोदी ने उन लोगों को भी याद किया जो बांग्लादेश की आजादी के किरदार रहे और उस खास क्षण के गवाह भी.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, 'मैं भारतीय सेना के वीर जवानों को भी याद करता हूं जो मुक्ति युद्ध में बांग्लादेश के लोगों के साथ खड़े हुए थे... आजाद बांग्लादेश के सपने का साकार करने में भूमिका निभाई - सैम मानेक शॉ, जनरल जैकब, अल्बर्ट एक्का जैसे अनगिनत वीर जिनके साहस की कथाएं हमें प्रेरित करती हैं... मुक्ति युद्ध में शामिल रहे कई भारतीय सैनिक भी आज इस कार्यक्रम में मौजूद हैं.'

प्रधानमंत्री मोदी ने खास मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी विशेष रूप से याद किया, बोले - 'आज का ये अवसर बंगबंधु के विजन और आदर्शों को याद करने का दिन है... ये समय चिरोविद्रोही को, मुक्ति युद्ध की भावना को फिर से याद करने का समय है... बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के लिए भारत के कोने-कोने से, हर पार्टी से, समाज के हर वर्ग से समर्थन था - तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधीजी के प्रयास और उनकी महत्वपूर्ण भूमिका सर्वविदित है...'

narendra modi, indira gandhi, imran khanइंदिरा गांधी का नाम लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इमरान खान को खास मैसेज दिया है - देखिये आगे क्या होता है!

प्रधानमंत्री मोदी ने इंदिरा के साथ साथ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भी स्मरण किया, '6 दिसंबर 1971 को अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था कि हम न केवल मुक्ति संग्राम में अपनी जीवन की आहूति देने वालों के साथ लड़ रहे हैं, बल्कि इतिहास को नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं.'

2014 में चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने शपथग्रहण के मौके पर ही नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के नेताओं को बुलाकर पड़ोसियों से रिश्तों को लेकर अपना स्टैंड साफ करने की कोशिश की थी. मेहामनों में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी शामिल थे - और उसके बाद भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मोदी और शरीफ को बातचीत करते देखा गया था. ये आइडिया तब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का माना गया था - और अब भी भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों में किसी बदलाव की उम्मीद जतायी जा रही है तो उसमें भी उनकी ही भूमिका देखी जा रही है.

भारत के तमाम प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान से रिश्ते तो नहीं सुधर सके, बल्कि इमरान खान को सरहद पार पहुंच कर भारत के खिलाफ घुसपैठियों की हौसलाअफजाई करते भी देखा गया. रिश्ते सबसे ज्यादा खराब फरवरी, 2019 के पुलवामा हमले के बाद हुए. बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जब विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान पाकिस्तान की सीमा में चले गये तो माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया था. हालांकि, पाकिस्तान ने तनाव को टालने का ही फैसला किया और अभिनंदन वापस भेज दिये गये.

पाकिस्तान के नेशनल डे के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इमरान खान को एक चिट्ठी भेजी थी और कहा था कि भारत पाकिस्तान के लोगों के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध चाहता है. प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान को आतंकवाद का रास्ता छोड़ने की भी नसीहत दी थी.

20 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने इमरान खान के कोरोना पॉजिटिव होने पर जल्द स्वस्थ होने की शुभकामनाएं दी थी - और फिर चिट्ठी में लिखा कि कोरोना काल मानवता के लिए बेहद मुश्किल भरा है - 'मैं आपको और पाकिस्तान की जनता को इस चुनौती से बहादुरी से निपटने की कामना करता हूं.'

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ढाका से इंदिरा गांधी का नाम लेकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को कुछ प्रत्यक्ष और कुछ परोक्ष पैगाम भी भेजा है - और ये सब निकट भविष्य में नये रूप लेते भी देखने को मिल सकता है - क्योंकि हाल की कुछ घटनाएं तो ऐसे ही इशारे कर रही हैं.

इशारों को अगर समझें - इमरान खान और जनरल बाजवा!

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को मोदी की चिट्ठी और ट्विटर पर कोरोना पाजिटिव होने पर 'गेट वेल सून' वाले मैसेज के अलावा भी ऐसे कई वाकये दर्ज किये गये हैं जो भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में आने वाले दिनों में सकारात्मक बदलाव का इशारा करते हैं. ये वाकये दोनों ही मुल्कों की तरफ से किसी खास डिप्लोमेसी की गंभीर कोशिशों की तरफ इशारा करते हैं.

करीब दो साल बाद, भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी जल वार्ता हो रही है. भारत के अधिकारियों और पाकिस्तान के इंडस वाटर कमिश्नर सैयद मेहर आलम की नुमाइंदगी में आठ सदस्यों की एक टीम बातचीत कर रही है.

ऐसा तब हो रहा है जब भारत-पाक सरहद पर दोनों तरफ से संघर्ष विराम का पूरी तरह पालन हो रहा है. 25 फरवरी को ही दोनों देशों के DGMO यानी मिलिट्री ऑपरेशंस के डायरेक्टर जनरल ने एक साझा बयान जारी करके अचानक LoC पर संघर्षविराम की घोषणा की थी.

प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा के एक दिन पहले ही, आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे ने पाकिस्तान की जमीन पर लांच-पैठ सहित आतंकी ढांचा की बात कही थी, लेकिन ये भी बताया कि बीते 5-6 साल में पहली बार सरहद पर शांति देखने को मिली है, 'मुझे ये बताते हुए गर्व महसूस हो रहा है कि पूरे मार्च महीने में, एक अकेली घटना को छोड़ कर नियंत्रण रेखा पर एक भी गोली नहीं चली - करीब पांच-छह साल में ये पहला मौका है, जब LoC पर शांति रही है.' हाल ही में पाकिस्तानी फौज के चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा ने भी कश्मीर राग और दूसरी बातों के साथ साथ ये भी कहा था कि दोनों मुल्कों को पुरानी बातें भुलाकर आगे बढ़ना चाहिये.

द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और पाकिस्तान के बीच पर्दे के पीछे बातचीत चल रही है और उसमें संयुक्त अरब अमीरात की भी भूमिका मानी जा रही है - हालांकि, अभी तक इस बारे में किसी भी तरफ से कोई आधिकारी बयान सामने नहीं आया है.

एक इंटरव्यू में UAE के मंत्री आदिल जुबैर ने भी कहा था कि सऊदी अरब पूरे इलाके में शांति चाहता है और उसके लिए प्रयास भी चल रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों खास कर भारत-पाक कूटनीति में दिलचस्पी रखने वाले जानकारों को भी ऐसा लग रहा है और मीडिया से बातचीत में ऐसे इशारे कर रहे हैं.

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो जम्मू-कश्मीर से लेकर भारत और चीन के बीच भी मध्यस्थता को आतुर देखे जाते रहे, लेकिन भारत का हमेशा ही एक ही स्टैंड रहा कि किसी भी तीसरे पक्ष के द्विपक्षीय मामलों में दखल देने की जरूरत नहीं है. वैसे कुछ विशेषज्ञ जो बाइडन के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी व्यावसायिक हितों को देखते हुए दक्षिण एशिया में शांति कायम रखने के प्रयासों का हिस्सा भी समझा जा रहा है.

ये तो साफ साफ समझ में आ रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने नये सिरे से पाकिस्तान को आपसी रिश्तों को बेहतर करने के लिए मोटिवेट करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश से इंदिरा गांधी का नाम लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने इमरान खान को 1971 के जंग की याद दिलाने की कोशिश की है - मतलब, बेहतर यही होगा कि आगे से कोई ऐसी वैसी कोशिश न हो, वरना अगली बार सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक का दायरा आगे बढ़ कर वो रूप भी ले सकता है जैसा इंदिरा गांधी ने 50 साल पहले पेश किया था.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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