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Updated: 04 मार्च, 2019 06:17 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
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गुजरात का मुख्‍यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी के साथ तत्‍कालीन यूपीए सरकार ने बेशक ज्‍यादती की होगी. गुजरात दंगों को लेकर भले ही उनके साथ भेदभावपूर्ण कार्रवाई की गई होगी. 'खून का सौदागर' जैसेे आरोप दागे गए होंगे. 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान मोदी का बेशक उनकी पत्‍नी को लेकर मजाक बनाया गया होगा. पिछले पांच साल के दौरान उन पर कई बार निजी हमले हुए होंगे. लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं, कि मोदी जी प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए राजनीतिक हिसाब बराबर करने के लिए संवेदनशील मौके पर असंवेदनशीलता का परिचय दें.

'स्मार्ट इंडिया हैकाथॉन 2019' के लिए इंजीनियरिंग के छात्रों के साथ प्रधानमंत्री की एक वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी. इस कार्यक्रम में एक छात्रा ने पीएम मोदी को एक प्रोग्राम के बारे में बताया जो उन्होंने Dyslexia से पीड़ितों बच्चों के लिए बनाया था. वो बच्चे जिन्हें पढ़ने-लिखने में परेशानी महसूस होती है. छात्रा ने कहा, "हमारे पास डिस्लेक्सिया से पीड़ितों बच्चों के लिए एक आइडिया है. ये वो बच्चे होते हैं जो लिखने और समझने में काफी धीमे होते हैं, लेकिन उनकी इंटेलिजेंस और रचनात्मक क्षमता काफी अच्छी होती है. हम यह फिल्म 'तारे जमीन पर' में देख चुके हैं.'

लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी ने छात्रा को बीच में रोकते हुए पूछा कि 'क्या ये प्रोग्राम 40-50 साल के बच्चे के लिए भी फायदेमंद होगा?' इतना कहते ही छात्र जोर जोर से हंसने लगे. छात्रा ने 'हां' में जवाब दिया. लेकिन मोदी यही नहीं रुके. उन्होंने कहा कि 'फिर तो ऐसे बच्चों की मां बहुत खुश होगी.' पीएम मोदी की इस बात पर फिर से सभी छात्र हंसने लगते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने ये चुटकी खास तौर पर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी पर ली थी. यानी मोदी जी को न तो समय ही याद रहा और न ही मामले की गंभीरता. बस डिस्लेक्सिया का नाम सुनते ही राहुल गांधी पर तंज कसना याद रहा. प्रधानमंत्री का ऐसा कर जाना उम्मीद से बाहर है. डिसलेक्सिया जैसी गंभीर डिसएबिलिटी पर हो रही एक गंभीर चर्चा के बीच उनके दिमाग में राहुल गांधी कैसे आ सकते हैं?

चुनावी माहौल है, पार्टियों का एक दूसरे पर कीचड़ उछालना भी जोरों पर है. ऐसे में नेताओं के सुर कई बार बेसुरे होते दिखे हैं. पर इन्हीं कोशिशों में वो कब मर्यादा लांघ जाते हैं उन्हें खुद पता नहीं चलता. लेकिन इस बार तो प्रधानमंत्री से दो गलतियां एक साथ हुई हैं. पहले तो राहुल गांधी का मजाक उड़ाना और दूसरा एक डिसेबिलिटी के प्रति असंवेदनशील होना. नेताओं का असंवेदनशील होना निराशाजनक है. और प्रधानमंत्री का तो और भी ज्यादा. खासतौर पर तब जब भारत के 15 प्रतिशत बच्चे डिस्लेक्सिया से पीड़ित हों. 2013 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय मान्यता प्राप्त स्कूलों में 228,994,454 डिस्लेक्सिक बच्चे पड़ते हैं.

narendra modi mocks rahul gandhiइनके चेहरे के भाव दिल की बात खुद बता रहे हैं

लेकिन कहते हैं कि मजाक करने का अधिकार उन्हीं को हो जो मजाक सह सके. ऐसे में बीजेपी को तो किसी की मजाक उड़ाने का कोई हक ही नहीं बनता. अमित शाह को कांग्रेस नेता बीके हरिप्रसाद ने 'सुअर का जुकाम' कहा था तो बीजेपी नेताओं को बड़ा बुरा लगा था. यानी मजाक भी आप ही बनाएं और बुरा भी आप ही मानें. नेताओं को समझना चाहिए कि बेवक़्त की ट्रोलिंग अच्छी नहीं लगती.

अब इस बात पर मोदी जी को कोई उनके संस्कारों की दुहाई दे रहा है तो कोई इसे चुनावी हथकंडा कह रहा है. लेकिन एक बात जो साफ साफ नजर आती है वो ये कि मोदी जी कुछ भी करें, दिमाग मेें सिर्फ चुनाव और विपक्ष ही घूमता है. जिन डिस्लेक्सिक बच्चों को लेकर उन्होंने राहुल गांधी पर तंज कसा, वो बच्चे बहुत तेज नहीं तो कम से कम संवेदनशील तो होते हैं, लेकिन मोदी जी तो उतने भी नहीं लगते.

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पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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