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Updated: 28 अप्रिल, 2021 09:15 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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देश में ऑक्सीजन की कमी न होने का सरकारी दावा झूठा क्यों लगता है - वो भी तब जबकि कुल उत्पादन के 54 फीसदी ऑक्सीजन की ही जरूरत पड़ रही है? कोविड 19 के इस महाआपदा में सबसे बड़ा सवाल यही है - और हैरानी की बात ये है कि क्राइसिस मैनेजमेंट की जगह सत्ता की राजनीति में या तो एक दूसरे पर तोहमत मढ़ी जा रही है या फिर डंडे के बल पर जबान बंद कराने की कोशिश चल रही है - राजधानी दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश तक एक जैसे ही किस्से सुनने को मिल रहे हैं.

ऑक्सीजन ही नहीं बल्कि रेमडेसिविर जैसी दवा के साथ साथ जिंकोविट और पैरासिटामॉल तक के लिए लोगों को दुकान दुकान भटकना पड़ रहा है - कालाबाजारी और जमाखोरी का आलम ये है कि NCR में ऑक्सीजन के खाली सिलिंडर के लिए लोगों को 40 से 60 हजार रुपये तक देने पड़ रहे हैं.

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो ऑक्सीजन की कमी की शिकायत को अफवाह की तरह ट्रीट कर रहे हैं और एनकाउंटर स्टाइल में ऐसे लोगों को NSA में बुक कर संपत्ति तक जब्त करने का फरमान जारी कर रहे हैं - और उनके अफसरों का भी यही हाल है. नोएडा से खबर है कि रेमडेसिविर के लिए पैर पकड़ लेने वाली महिलाओं को वहां से सीएमओ जेल भिजवाने की धमकी दे रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के फरमान पर 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटीं प्रियंका गांधी ने ट्वीट चुनौती दी है कि वो कह रही हैं कि यूपी में ऑक्सीजन की कमी है और उनकी संपत्ति जब्त कर दिखायें.

कोरोना संकट में बदइंतजामी के सवाल पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) पर पहले से ही हमलावर थे, मौके का फायदा उठाने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) तो कुछ ज्यादा ही आगे निकल गये - लेकिन जब दिल्ली हाई कोर्ट में जिरह होने लगी तो जवाब देना भारी पड़ने लगा.

आपदा में अवसर खोज अरविंद केजरीवाल मोदी सरकार के खिलाफ वैसे ही आक्रामक नजर आने लगे थे जैसे अक्सर विपक्ष प्याज (Oxygen Politics like Onion Prices) के चढ़ते दाम को लेकर सत्ता पक्ष को घेरता रहा है - और ऐसे कई वाकये हैं जब सरकारों के गिर जाने में प्याज की पॉलिटिक्स की ही सबसे बड़ी भूमिका समझी गयी है.

1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की NDA की गठबंधन सरकार तो गिरी ही थी, उसी साल दिल्ली के मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना प्याज की कीमतों को लेकर ऐसे घिरे कि बीजेपी को मुख्यमंत्री बदलना पड़ा और साहिब सिंह वर्मा को कमान सौंपी गयी. तब भी बात नहीं बनी तो बीजेपी ने सुषमा स्वराज को आजमाया लेकिन सत्ता हाथ से फिसल गयी. 1998 का साल बीजेपी पर इतना भारी पड़ा कि राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी प्याज मुद्दा बन गया और चुनाव हारने के बाद भैरों सिंह शेखावत दर्द छिपा नहीं पाये, बोले - प्याज हमारे पीछे ही पड़ा था. पहले की बात करें तो 1977-1980 में जनता पार्टी की सरकार को भी प्याज की कीमतें चुनौती बन गयी थीं - और 1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने प्याज के मुद्दे को जोर शोर से उछाला था.

केंद्र की मोदी सरकार तो मजबूत स्थिति में है, लेकिन अगले ही साल यूपी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और तब तक अगर लोग ऑक्सीजन की हालिया तकलीफ भुला नहीं पाये तो बहुत मुश्किल हो सकती है - पश्चिम बंगाल में भी आखिरी चरण की वोटिंग में कोरोना संकट की अफरातफरी बड़ा चैलेंज लगने लगा है.

ये हाल तब है जब ऑक्सीजन का अच्छा स्टॉक है

ताज्जुब तो इस बात को लेकर है कि जब देश में ऑक्सीजन के रोजाना उत्पादन के आधे की ही खपत है तो ऑक्सीजन के लिए सड़कों पर लोगों को वैसे ही परेशान हाल क्यों देखने को मिल रहा है जैसे 2020 में लॉकडाउन के बाद लोग सड़कों पर नजर आ रहे थे. भूखे प्यासे. बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं के साथ पैदल ही निकल पड़े. कोई ठेले पर पूर परिवार बिठाये तो कोई रिक्शा तो कोई साइकल से ही.

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि ऑक्सीजन और बेड के लिए लोग 1000 किलोमीटर तक का सफर जैसे तैसे पूरा करने को मजबूर हो रहे हैं. जगह जगह से आ रही ऐसी कहानियां भले ही मिसाल बन रही हों, लेकिन ये नाकाम राजनीतिक नेतृत्व और उसकी अक्षम सरकारी व्यवस्था के मुंह पर तमाचा ही लगती हैं.

arvind kejriwal, narendra modiबीजेपी की राजनीति में एक बार फिर उलझ गये हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दावा है राज्य में न तो ऑक्सीजन की कमी है, न ही कोविड 19 के इलाज के लिए जरूरी दवाइयों की. योगी आदित्यनाथ ने तो रेमडेसिविर जैसी दवाई मरीजों को मुफ्त में देने का ऐलान कर रखा है. ये बात भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हवाले से ही आई है कि यूपी में कोविड 19 के मरीजों को भर्ती करने से कोई भी अस्पताल मना नहीं करेगा - चाहे वो सरकारी हो या निजी अस्पताल.

जिस अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण का काम चल रहा है और उसके नाम पर अगले साल योगी आदित्यनाथ लोगों के बीच जाकर वोट मांगने वाले हैं, वहीं से एक पति-पत्नी को इलाज के लिए 850 किलोमीटर का सफर तय कर पश्चिम बंगाल पहुंचना पड़ा.

अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 50 साल के लालजी यादव और 48 साल की उनकी पत्नी रेखा को एंबुलेंस से पश्चिम बंगाल के हुगली जाने का फैसला तब करना पड़ा जब छह अस्पतालों ने ऑक्सीजन की कमी बता कर अपने यहां भर्ती करने से मना कर दिया.

बीजेपी भले ही फैजाबाद को अयोध्या बना दे और राम मंदिर निर्माण का क्रेडिट ले, लेकिन यूपी के मरीज को उस पश्चिम बंगाल में इलाज मुमकिन हो पाया है जहां वो तमाम दुर्व्यवस्थाओं की बात कर आसोल पोरिबोर्तन लाने का वादा कर रही है. अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, लालजी की स्थिति तो गंभीर है, लेकिन रेखा की सेहत में सुधार दर्ज किया गया है.

ऐसी ही एक खबर नोएडा से आयी है जिसे दोस्ती की मिसाल के तौर पर लोग शेयर कर रहे हैं. ये किस्सा रंजन और उनके दोस्त देवेंद्र का है. नोएडा में रह रहे रंजन को कोरोना वायरस के संक्रमण के बाद ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी लेकिन आस पास कहीं कोई उम्मीद नहीं नजर आयी. ये खबर जब बोकारो में रह रहे उनके दोस्त देवेंद्र को पता चली तो वो ऑक्सीजन के जुगाड़ में लग गये और जल्दी ही इंतजाम भी कर लिये. अब मुश्किल ये थी कि बोकारो से ऑक्सीजन नोएडा पहुंचे तो कैसे?

देवेंद्र ने दोस्त के लिए हिम्मत दिखायी और कार से ही 1400 किलोमीटर का सफर करीब 24 घंटे में तय कर नोएडा पहुंच गये - रंजन को ऑक्सीजन तो मिला ही दोस्त के इस काम ने हौसलाअफजाई जो की वो तो अलग ही है.

ये तो उन लोगों के किस्से हैं जो काफी मशक्कत के बाद ऑक्सीजन और बेड के इंतजाम में सफल रहे हैं, लेकिन आगरा से खबर आयी है कि वहां के एक ही अस्पताल में 8 लोगों की ऑक्सीजन के अभाव में मौत हो गयी है.

हिम्मत और दोस्ती के किस्से के बीच नोएडा के सीएमओ डॉक्टर दीपक ओहरी ने संवेदनहीना का नमूना पेश किया है. नोएडा प्रशासन का दावा है कि रेमडेसिविर इंजेक्शन की कोई कमी नहीं है, लेकिन जब कुछ मरीजों के परिवार वालों ने बार बार लौटाए जाने पर सीएमओ के पैर पकड़ लिये तो वो पुलिस बुलाकर जेल भिजवाने की धमकी देने लगे.

लेकिन ये सब करने की लोगों को जरूरत क्यों पड़ रही है, जबकि देश में एक दिन में होने वाली ऑक्सीजन की खपत का डबल उत्पादन होता है?

सरकारी बयान के मुताबिक, '12 अप्रैल, 2021 को देश में 3842 MT (मीट्रिक टन) मेडिकल ऑक्सीजन की खपत हुई थी' - और रोजाना ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता 7127 MT है.

ऐसे देखें तो देश में जरूरत से 50 हजार टन ज्यादा मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पातन हो सकता है - मतलब, उत्पादन क्षमता के महज 54 फीसदी ऑक्सीजन की ही खपत हो पा रही है. मतलब, जितने ऑक्सीजन की खपत है उसके डबल उत्पादन की क्षमता है.

फिर तो कोई शक नहीं ये प्रबंधन में खामी का नतीजा है - और ये कमी राष्ट्रीय स्तर पर तो है ही, राज्यों में कुछ ज्यादा ही है. खासकर वहां जहां बीजेपी के विरोधी दलों की सरकारें हैं और सबसे बड़ी मिसाल तो दिल्ली ही है.

दिल्ली हाई कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सुनवाई के दौरान बार बार दिल्ली में मिस-मैनेजमेंट की तरफ तो ध्यान दिला रहे थे, लेकिन वो भूल जा रहे थे कि बिलकुल वैसा ही हाल उत्तर प्रदेश में भी है और पूरे देश में है जिसकी केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बनती है.

दिल्ली पर भारी पड़ रही राजनीति

हालात तो यूपी से भी बुरे दिल्ली में दिखायी पड़ रहे हैं - यहां ऑक्सीजन का अभाव तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुद ही महसूस कर रहे हैं, लेकिन बाकी इंतजामों को लेकर जो वो बढ़ चढ़ कर दावे कर रहे थे, फेल नजर आ रहे हैं.

दिल्ली जैसा ही ही हाल पूरे एनसीआर में है. जमाखोरी और कालाबाजारी के चलते एनसीआर में भरे की कौन कहे, खाली सिलिंडर तक नहीं मिल पा रहे हैं. भरे को तो भूल ही जाइए, आलम ये है कि खाली सिलिंडरों के लिए 40-60 हजार तक की कीमत वसूली जाने लगी है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में हर तरफ से निराशा हाथ लगने के बाद लोग पंजाब का रुख करने लगे हैं. दिल्ली और आसपास के लोग मोहाली के अस्पतालों में पहुंचने लगे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली और गुड़गांव में रहने वाले कम से कम 25 लोग वहां भर्ती होकर अपना इलाज करा रहे हैं.

दिल्ली सरकार की तरफ से हाई कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर बताया गया है कि अस्पताल को कितनी ऑक्सीजन दी गई है. हालांकि, जजों के लिए फाइव स्टार होटल में 100 कमरों का कोविड केयर सेंटर बनाने के मामले में अरविंद केजरीवाल सरकार की खूब फजीहत हुई है. राजनीतिक विरोधी तो हमलावर हैं ही, अदालत ने भी खूब खरी खोटी सुनायी है. हाई कोर्ट की बेरुखी को देखते हुए आखिरकार दिल्ली सरकार को आदेश वापस लेने पड़े हैं.

दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान उस वक्त अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गयी जब एक वकील ने अदालत से अपने एक रिश्तेदार के लिए आईसीयू बेड की मांग कर डाली.

वकील ने अपने एक रिश्तेदार की हालत और आईसीयू बेड की जरूरत बताते हुए अदालत से कहा कि जितनी जल्दी हो सके इंतजाम कराने की कोशिश की जाये, लेकिन अदालत ने भी हाथ खड़े कर दिये - 'हमें इस वक्त आपके साथ सहानुभूति है, हम क्या करें अस्पताल में आईसीयू बेड नहीं है.'

दिल्ली में ऑक्सीजन संकट को लेकर हाई कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई है, 'आपका सिस्टम पूरी तरह फेल है, किसी काम का नहीं है. सिस्टम ठीक कीजिये... अगर आपके अफसर स्थिति को नहीं संभाल सकते तो बताइये, हम केंद्र के अधिकारियों को लगाएंगे - लोगों को हम मरने नहीं दे सकते.'

अब ये सवाल तो उठेगा ही कि आखिर दिल्ली में बार बार कोरोना बेकाबू क्यों हो जाता है?

पिछले साल भी अरविंद केजरीवाल ऐसे ही दावे करते रहे - और जब नहीं संभाल पाये तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को कमान अपने हाथ में लेनी पड़ी थी. ये अरविंद केजरीवाल ही है जो तब कह रहे थे कि कोरोना संकट में अमित शाह से उनको बहुत कुछ सीखने को मिला है, लेकिन जो कुछ भी वो सीखे थे वो साल भर बाद ही क्यों भूल गये?

असल बात तो ये है कि यूपी, पंजाब और गोवा चुनावों की तैयारी कर रहे अरविंद केजरीवाल को लगा कि ऑक्सीजन के मुद्दे पर केंद्र की मोदी सरकार को घेरा जा सकता है - और एक बार अपने मकसद में कामयाब हो गये तो चुनावों में भाषण अच्छा हो जाएगा, लेकिन वो भूल गये कि किससे पंगा ले रहे हैं.

जब दिल्ली के दो अस्पतालों की तरफ से बारी बारी हाई कोर्ट में ऑक्सीजन को लेकर गुहार लगायी गयी तो दिल्ली सरकार को भी पक्ष रखने के लिए पेश होना पड़ा. दिल्ली सरकार के वकील भी वे सारी बातें ही कह रहे थे जो अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बुलायी मुख्यमंत्रियों की बैठक में मुद्दे उठा रहे थे. बैठक में अरविंद केजरीवाल के अपना भाषण लाइव करने पर प्रधानमंत्री ने टोका और प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताया तो वो माफी भी मांग लिये.

पहले तो दिल्ली सरकार के वकील हाई कोर्ट में ऐसी दलीलें पेश किये कि केंद्र सरकार ही घिरने लगी थी, लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता शुरू से ही ऑक्सीजन के मसले पर दिल्ली सरकार के प्रबंधन पर सवाल उठाते रहे. तुषार मेहता का बार बार इसी बात पर जोर रहा कि दिल्ली को ऑक्सीजन की कमी नहीं है, बल्कि उसका प्रबंधन ठीक से नहीं हो पा रहा है, इसलिए ज्यादा दिक्कत है.

सुनवाई के क्रम में एक ऑक्सीजन सप्लायर का झूठ उजागर हो गया और अदालत ने कहा कि उसे तुरंत कस्टडी में लिया जा सकता है. अदालत ने सप्लायर को लताड़ भी लगायी कि लोग मर रहे हैं और उसे सिर्फ फायदा समझ आ रहा है.

नतीजा ये हुआ कि केजरीवाल सरकार का ऑक्सीजन कुप्रबंधन कोर्ट को समझ आ गया और वो चेतावनी दे दिया कि अगर अब भी नहीं सुधरे तो केंद्र को टेकओवर करने के लिए आदेश देना पड़ेगा - मतलब, एक बार फिर केजरीवाल सरकार के सामने 2020 जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है.

अगर अरविंद केजरीवाल ने ऑक्सीजन के नाम पर राजनीति शुरू की है तो अमित शाह तो उनके गुरु ही हैं क्योंकि उनसे सीखने की बात तो खुद केजरीवाल ही कबूल कर चुके हैं. चुनावों पर नजर के साथ साथ अरविंद केजरीवाल को एक खुन्नस और रही - दिल्ली में एलजी को सारे अधिकारी देने वाले केंद्र सरकार के कानून को लेकर और उसी का बदला लेने के लिए अरविंद केजरीवाल पैंतरेबाजी कर रहे थे, लेकिन मुंहकी खानी पड़ी है.

बहरहाल, अब तो केंद्र सरकार ने गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरेटरी ऑफ दिल्ली (संशोधन) बिल 2021 संसद से पास कराने के बाद नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है. NCT बिल गृह मंत्रालय के नोटिफिकेशन के बाद 27 अप्रैल से प्रभावी हो गया है - अब उप-राज्यपाल अनिल बैजल को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से ज्यादा शक्तियां हासिल हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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