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Updated: 16 फरवरी, 2019 05:20 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि हमलावरों ने बहुत बड़ी गलती कर दी है. पुलवामा के हमलावरों से आशय सिर्फ फिदायीन आदिल अहमद डार या जैश सरगना मौलाना मसूद अजहर से ही नहीं है, ये चेतावनी उन सभी के लिए है जिनकी पुलवामा हमले को अंजाम देने में भूमिका रही है. सीआरपीएफ काफिले पर हमले के बाद आतंकवाद से निजात पाने के लिए उसकी जड़ें काटनी जरूरी हैं.

एक सर्जिकल स्ट्राइक के जरिये उरी अटैक का बदला लिया जा चुका है. अब वक्त काफी आगे निकल चुका है - और धैर्य भी जवाब दे रहा है. स्थिति हदें पार कर चुकी है. अब उतने से काम नहीं चलने वाला. अब कुछ ज्यादा कारगर वक्त की जरूरत लग रही है. इतना कारगर कि ऐसी जरूरत बार बार और इतनी जल्दी जल्दी न आन पड़े.

संसद में अपने मौजूदा कार्यकाल आखिरी भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मैंडट पर जोर दे रहे थे. आने वाले चुनावों की बात और है, फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी के पास ये मैंडेट तो है कि देश हित में कोई भी फैसला ले सकें - भले ही वो न्यूक्लियर बटन दबाने की ही बात क्यों न हो?

अच्छी कोशिशें ही कामयाबी दिलाती हैं, दिलाएंगी भी

पुलवामा अटैक के बाद भारत ने कूटनीतिक कोशिशें शुरू कर दी हैं - तमाम देशों के राजदूतों से मिल कर पाकिस्तान की कारस्तानी मजबूत तरीके से उनके सामने रखी जा रही है.

कोशिशें कामयाबी की गारंटी होती हैं. कोशिशें कभी जाया नहीं जाती हैं. ऐसी ही कोशिश कुलभूषण जाधव केस के दौरान भी हुई थी जब भारत ने जस्टिस दलवीर भंडारी का कार्यकाल बढ़ाने के लिए विश्व मंच पर पुरजोर पैरवी की. संयुक्त राष्ट्र में अपनी बात सही तरीके से रखने और हर संभव जरूरी उपाय करने का क्या नतीजा होता है ये अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित होने के मामले में देखा जा चुका है. एक बार फिर वैसी ही जोरदार कोशिश की जरूरत है.

भारत को पाकिस्तान के साथ साथ चीन के खिलाफ भी विश्व जनमत को जुटाने की महती जरूरत है. अमेरिका सहित दुनिया के ज्यादातर देश पुलवामा हमले की निंदा और आत्मरक्षा के हक का समर्थन कर चुके हैं. मसूद अजहर के मामले में सिर्फ चीन ने अपना रवैया नहीं बदला है. ध्यान इस बात पर भी देना होगा कि पाकिस्तान की मदद में भी आगे चीन ही आएगा.

कूटनीतिक कोशिशें भी सैन्य कार्रवाई से कम नहीं होतीं. चीन पाकिस्तान की तभी तक मदद करेगा जब तक उसे अपने बाजार पर खतरा नहीं दिखेगा. भारत को इस दिशा में भी सोचना चाहिये. पूर्व राजनयिक कंवल सिब्बल की राय है कि भारत को पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता रद्द कर देना चाहिये. अगर थोड़ा नुकसान भी हो तो ऐसा करके पाकिस्तान को बड़ा नुकसान पहुंचाना जरूरी है. MFN का दर्जा वापस लिए जाने के बाद ऐसे सारे एक्शन वक्त रहते ले लिए जाने चाहिये - लगे हाथ बाकी विकल्पों पर भी सोच विचार कर आगे बढ़ना चाहिये.

विकल्प हैं तो वक्त रहते इस्तेमाल भी कर लेना चाहिये

सीआरपीएफ जवानों पर हमले के बाद बदले की कार्रवाई के लिए विकल्प बहुतेरे हैं. देश गुस्से में है, इसलिए हर किसी के दिमाग में या तो सर्जिकल स्ट्राइक या फिर पाकिस्तान से सीधी जंग जैसे ही ख्याल आ रहे हैं. मगर, ठीक ऐसा ही नहीं है. पहले तो सुरक्षा बलों के पास ही ढेरों विकल्प हैं. राजनीतिक नेतृत्व का फैसला तो आखिरी विकल्प है.

narendra modiप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास देश हित में हर फैसले का मैंडेट है

पूरी तरह जंग में जाने से पहले हर विकल्प पर गंभीरता से विचार जरूरी है, लेकिन नतीजा ये जरूर होना चाहिये कि ऐसे हमलों के बारे में दुश्मन की जमात में कोई सोचे भी तो नख-शिख सिहरन होने लगे. सीधी जंग से पहले दुश्मन की रीढ़ को तोड़ना सबसे जरूरी है.

राजनीतिक नेतृत्व मजबूत है. सैन्य नेृतृत्व को खुली छूट मिल चुकी है. कूटनीतिक प्रयास जारी हैं और प्रॉक्सी वॉर भी जरूरी है - उसके आगे की तैयारी भी पहले से ही फाइनल होनी चाहिये. दुश्मन दुश्मन ही होता है.

मैंडेट है, न्यूक्लियर बटन दबाने का भी

पुलवामा अटैक के बाद सुरक्षा बलों को पूरी छूट मिली हुई है. आगे की स्ट्रैटेजी सैन्य नेतृत्व को खुद तय करनी है. अब तक काफी कुछ तय भी हो चुका होगा. बस, सही वक्त का इंतजार होगा. सही जगह भी तय हो चुकी होगी. जाहिर ये ऑपरेशन पहले के मुकाबले थोड़ा मुश्किल होगा.

निश्चित तौर पर पाकिस्तान भी अपनी ओर से तैयारियों में जुटा ही होगा. ऐसा भी तो नहीं कि वो तैयारी नये सिरे से करेगा. जो कुछ हुआ है वो तो नेतृत्व के स्तर का ही प्लान है. फिर तो आगे की भी तैयारी किया ही होगा. मगर, फर्क क्या पड़ता है?

पाकिस्तान ने ओसामा बिन लादेन को भी छिपाने में कोई कसर बाकी तो नहीं रखी थी. आखिर अमेरिका की नजरों से अरसे तक तो बचा कर रखा ही था. मगर, कब तक मुमकिन हो पाता? आखिरकार अमेरिका ने पाकिस्तान में घुस कर बदला ले लिया - और फौजी हुकूमत नींद में ही ख्याली पुलाव पकाता रहा.

उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक के जरिये भारत ने भी बदला लिया था. अब कुछ बड़ा करने की जरूरत होगी. भारत को भी ओसामा की ही तरह मसूद अजहर को ढूंढ निकालना है. पाकिस्तान ने ओसामा को एबटाबाद में रखा था, मसूद अजहर को बहावलपुर में. जरूरी नहीं कि अब भी वो वहीं हो. ओसामा एक्शन से सबक लेते हुए पाकिस्तान ने मसूद अहजर को कहीं और छिपाने की कोशिश कर रहा होगा? लेकिन कब तक कोई किसी की खैर मना सकता है? मसूद अजहर तो मिल ही जाएगा?

सीआरपीएफ जवानों के हत्यारे आदिल अहमद डार ने तो खुद को खत्म ही कर लिया, उसके समझा-बुझा और ब्रेन वॉश कर फिदायीन बनाने वाले भी जल्द ही मिल जाएंगे. मसूद अहजर ने जिस कमांडर को अफगानिस्तान से कश्मीर भेजा है वो भी सुरक्षा बलों के हत्थे चढ़ने ही वाला है. कब तक और किस बिल में छिपा रह सकता है?

बड़ा सवाल ये है कि मसूद अजहर भी मिल जाये तो क्या? एक मसूद अजहर मार दिया जाएगा, किसी और नाम से दूसरा तैयार हो जाएगा. देखा जाये तो ये तो मैसेंजर हैं. ये तो पाकिस्तानी फौज, जो आज भी असली हुकूमत है, और ISI के डिजाइन, मॉडल और प्रोडक्ट के मार्केटिंग एक्जीक्युटिव हैं. ये तो पाक फौज और उसकी खुफिया एजेंसी के इशारों पर जगह जगह डेमो देते रहते हैं.

ये ठीक है कि मसूद नासूर बन चुका है. 1999 में उसे जो जीवनदान मिला कि वो आउट होने का नाम ही नहीं ले रहा. लेकिन कब तक चलेगा, मैच तो खत्म होने के लिए ही होते हैं. अब तो हालत ये है कि सिर्फ मसूद के खात्मे से खेल खत्म नहीं होने वाला.

उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक काफी था. अब उतने भर से काम नहीं चलने वाला. अब तो कुछ बड़ा करने की जरूरत है.

जंग आखिरी ऑप्शन है. बड़े लक्ष्य के साथ सर्जिकल स्ट्राइक अब भी चलेगा ही काफी है. अब सर्जिकल स्ट्राइक का दायरा बड़ा रखना जरूरी होगा ताकि मसूद अहजर को पालने पोसने वाले भी न बच सकें.

और इसके लिए न्यूक्लियर बटन दबाने से भी संकोच की जरूरत नहीं है. पांच साल बीत चुके हैं, अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी देश के 'मन की बात' सुननी चाहिये.

संसद में मौजूदा कार्यकाल के आखिरी भाषण में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का बड़ा हिस्सा मैंडेट पर फोकस रहा. मैंडट तो है ही. दुनिया को भी पता है कि मैंडेट मोदी के साथ है. अब इससे बड़ी बात क्या होगी कि राहुल गांधी भी मैंडेट के साथ हैं - और अरविंद केजरीवाल भी. यहां तक कि अमेरिका भी आत्मरक्षा के लिए हक की बात कर रहा है.

और मैंडेट यही कह रहा है कि अब आर-पार वाले आत्मविश्वास के साथ मैंडेट का सम्मान करते हुए मोदी सरकार मसूद अजहर नहीं उसके आकाओं को भी नेस्तनाबूद करने के बारे में सोचकर आगे बढ़ना चाहिये - और आखिर में कोई विकल्प नजर न आये तो ध्यान रहे - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास न्यूक्लियर बटन दबाने का भी मैंडेट है.

अब सिर्फ बदला लेने से काम नहीं चलने वाला. दुश्मन ऐसी जुर्रत फिर न कर सके वैसा कुछ बड़ा करने की जरूरत है - ऐसे एक्शन की जरूरत है कि दोबारा वो ऐसी कोई जुर्रत न कर सके.

ये ठीक है कि हमारा न्यूक्लियर प्रोग्राम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है - लेकिन अगर वक्त पर उसका इस्तेमाल नहीं किये तो क्या अचार डालेंगे या सिरका बनाएंगे?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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