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Updated: 04 मार्च, 2018 03:14 PM
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त्रिपुरा के लाल किले पर भगवा फहराने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी के नये दफ्तर पहुंचे. अमित शाह के साथ ही तमाम बीजेपी नेताओं का हुजूम भी था. मोदी ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को याद करते हुए कहा - 'हमारे कार्यकर्ताओं की रक्त का एक बूंद भी कभी बेकार नहीं जाता है.'

प्रधानमंत्री मोदी ने जीत के ऐतिहासिक मौके पर बीजेपी कार्यकर्ताओं की याद में दो मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि दी. तभी अजान भी शुरू हो गया और मोदी ने बीच में ही विजय भाषण रोक दिया - स्वाभाविक तौर पर मोदी की इस पहल की चौतरफा तारीफ हुई, भले ही ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. साथ ही, मोदी ने त्रिपुरा में बीजेपी की जीत को वास्तुशास्त्र के हिसाब से अच्छा बताया - तो क्या आने वाले दिनों में होने जा रहे सभी चुनाव बीजेपी के लिए त्रिपुरा जैसी जीत की गारंटी देते हैं?

कर्नाटक तो कांग्रेस का गुजरात है

समाज में प्रचलित मान्यताओं का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि नॉर्थ ईस्ट वास्तुशास्त्र के हिसाब से ठीक माना जाता है. मोदी ने कहा कि जब नॉर्थ ईस्ट ठीक होगा तो सब कुछ ठीक होगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी की बीजेपी वास्तुशास्त्र के इस संकेत को और अच्छे दिनों की गारंटी मानकर चल रही है.

amit shahत्रिपुरा के आगे क्या है...

तात्कालिक तौर पर अभी सबसे नजदीक कर्नाटक विधानसभा का ही चुनाव है. देखा जाये तो कर्नाटक चुनाव गुजरात का ही सिक्वल है - बस किरदारों के रोल स्वैप हो गये हैं. ऐसा आपस में विरोधी दलों का दोनों ही राज्यों में सत्ता पर काबिज होने के कारण है. गुजरात में बीजेपी सत्ता में थी और उस पर सरकार बचाने का दबाव रहा, कर्नाटक में बिलकुल वैसा ही कांग्रेस के साथ है. इस तरह देखें तो गुजरात में जैसा फायदा कांग्रेस उठाने में जुटी थी वैसी ही भूमिका में यहां बीजेपी है और उसी रास्ते पर लगातार आगे बढ़ रही है.

कर्नाटक में भी बीजेपी जोर शोर से चुनाव कैंपेन में डटी हुई है और कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार को सबसे भ्रष्ट साबित करने की मुहिम चला रही है. मोदी तो सिद्धारमैया को 'सीधा-रुपैया' सरकार का खिताब भी दे चुके हैं.

देखा जाये तो कर्नाटक में कांग्रेस बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा मजबूत है. याद कीजिए गुजरात के विधायकों के बिक जाने के डर से कांग्रेस ने उन्हें कर्नाटक में ही छुपाया जबकि हिमाचल में भी कांग्रेस की उस वक्त सरकार थी. कांग्रेस का ये कदम उसके काम भी आया. विधायक कांग्रेस के प्रति आगे भी निष्ठावान तो बने रहे. आखिर उन्हीं के बूते अहमद पटेल की राज्य सभा सीट सुरक्षित भी की जा सकी.

कर्नाटक बीजेपी से कहीं ज्यादा कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण लगता है. कर्नाटक में भी कांग्रेस का सब कुछ दांव पर लग चुका है. इसका मतलब ये नहीं कि अब मामला कांग्रेस के हाथ से निकल चुका है. कांग्रेस चाहे तो कर्नाटक को बचा सकती है.

बगैर आलाकमान के खास ध्यान दिये अगर मेघालय में कांग्रेस के नेता चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर खड़े हो सकते हैं तो फिर कर्नाटक में क्यों नहीं?

कर्नाटक और मेघालय में एक और फर्क है कि राहुल गांधी कर्नाटक पर पहले से ही ज्यादा ध्यान दे रहे हैं - और माना जा रहा है कि वो राज्य में गुजरात वाले ज्यादातर प्रयोग कर सकते हैं.

कर्नाटक बचा लेने का कांग्रेस को सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि वो बाकी तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी को कड़ी टक्कर दे पाएगी. वैसे भी गुजरात के आजमाये हुए कांग्रेस के साथी और सिपाही मध्य प्रदेश में गश्त पर निकल ही चुके हैं. वे चिल्ला चिल्ला कर आगाह भी कर रहे हैं - 'जागते रहो, जागते रहो.'

त्रिपुरा की जीत... और अगले तीन विधानसभा चुनाव

बीजेपी के लिए त्रिपुरा की जीत असम जैसी ही है. असम की ही तरह बीजेपी ने त्रिपुरा में भी हिंदू वोटों पर फोकस किया. बांग्लादेशियों के मुद्दे पर एक जैसा स्टैंड लिया - और सबसे बड़ी बात बागी कांग्रेसियों को इकट्ठा करके चुनाव मैदान में उतार दिया. देखा जाये तो काफी बीजेपी विधायक चुनावों से पहले वाले कांग्रेसी नेता हैं. उत्तराखंड भी इस हिसाब से एक मिसाल हो सकता है. असम की ही तरह त्रिपुरा में भी बीजेपी मुख्यमंत्री का चेहरा नया नवेला लांच करने वाली है, लेकिन विधायक वही बने हैं जो कांग्रेस के टिकट पर जीतते या जमानत बचाते रहे. अब ये कांग्रेस के लिए सोचने की बात है कि वो अपने नेताओं को क्यों नहीं संभाल पा रही है.

amit shahकर्नाटक तो एक पड़ाव है

बीजेपी की जीत पर चाहे वो सीपीएम नेता सीताराम येचुरी हों या कांग्रेस के नेता एक ही जैसे आरोप लगा रहे हैं. बीजेपी के विरोधियों का कहना है कि ये चुनाव पैसे के बलबूत जीता गया है. तो बुरा क्या है और चुनाव आयोग की नजर में कुछ गड़बड़ नहीं तो गलत क्या है? ये तो बस हार का ठीकरा कहीं फोड़ने या लकीर पीटने जैसा है. अब लकीर पीटने से क्या फायदा कि बीजेपी ने पैसे उड़ाये या फिर गलत तरीके अपनाये. चुनाव में जीत जीत होती है, तरीके नहीं याद रखे जाते.

तो क्या त्रिपुरा का जोश ही आने वाले बाकी चुनावों में जीत दिलाने के लिए काफी है? बिलकुल नहीं. बीजेपी की असली मुश्किल तो अब आने वाली है... और वो मुश्किल कर्नाटक का चुनाव नहीं है! बीजेपी को 2019 से पहले राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के चुनाव जीतने होंगे.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ - इन तीनों ही राज्यों में बीजेपी की हालत वैसी ही है जैसी अमल में कांग्रेस और त्रिपुरा में माणिक सरकार की हो चुकी थी. देखा जाये तो तीनों राज्यों में बीजेपी के लिए गुजरात से भी खराब स्थिति हो चुकी है.

हालिया उप चुनावों के नतीजे बता रहे हैं कि राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीजेपी किस दौर से गुजर रही है. दोनों ही राज्यों में स्थानीय नेता और कार्यकर्ता अलग अलख जगाये हुए हैं.

तीनों ही राज्यों में एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर बढ़ चढ़ कर हावी है. कहने का मतलब ये कि अगर विपक्ष थोड़ा सूझ बूझ से काम ले तो बीजेपी को शिकस्त भी देना बहुत मुश्किल भी नहीं है. अगर राहुल गांधी डेरा डाल कर मोदी के गुजरात में बीजेपी की नाक में दम कर सकते हैं तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं?

फिर तो कहा जा सकता है कि त्रिपुरा जीत कर बीजेपी ने अपनी ही मंजिल का रास्ता मुश्किल कर लिया है. 2019 से पहले बीजेपी का असली इम्तिहान कर्नाटक नहीं, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होना है.

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