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Updated: 14 सितम्बर, 2016 08:03 PM
आलोक रंजन
आलोक रंजन
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नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड भारत दौरे पर आ रहे हैं. उनका ये दौरा 15 से 18 सितम्बर तक है. प्रचंड ने अगस्त में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना. इनके प्रधानमंत्री बनने के बाद खबर ये आ रही थी कि वो पहली यात्रा चीन की करेंगे लेकिन जब नेपाल सरकार ने सभी अफवाहों को नकारते हुए भारत दौरे का ऐलान किया तो ये उम्मीद बनने लगी कि भारत-नेपाल संबंधों में सुधार आ सकता है, जो इस समय खराब दौर से गुजर रहे हैं.

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नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड 15 सितंबर को आएंगे भारत

नेपाल-भारत संबंध की दृष्टि से पिछला साल अच्छा नहीं रहा था. इस दौरान आपसी शक और भ्रम ज्यादा बढ़ा है. भारत और नेपाल इस दौरे से काफी उत्साहित हैं. प्रचंड के अनुसार इस दौरे का मुख्य मकसद ये है कि नेपाल-भारत संबंधों में विश्वास का माहौल कायम हो जो पिछले कुछ समय से खटास में चल रहा है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्योते पर वे भारत आ रहे हैं और ऐसे समय जब भारत के रिश्ते चीन से कुछ मुद्दे पर असहज चल रहे हैं, भारत इस विजिट को बहुत गंभीरता से ले रहा है. नेपाल साउथ एशिया का एक महत्वपूर्ण देश है जहां भारत अपना हित देख रहा है. नेपाल और भारत के सम्बन्ध काफी पुराने और ऐतिहासिक हैं. दोनों ओपन बॉर्डर साझा करते हैं. 

हाल के वर्षो में देखें तो चीन नेपाल में बड़ी तेजी से अपनी जड़ें जमा रहा है. वो वहां पर काफी तेजी से रोड नेटवर्क का विस्तार कर रहा है. अस्पतालों का निर्माण कर रहा है. चीन ने नेपाल की पूर्ववर्ती ओली सरकार के साथ कई समझौते भी किए थे. जिसके अनुसार उसके तिब्बत रेल नेटवर्क को काठमांडू तक लाना है. इसके साथ चीनी इंडस्ट्री के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने और पेट्रोलियम उत्पाद का निर्यात चीन में करना. जाहिर है ये सब भारत के लिए कहीं से भी स्वीकार्य नहीं है. 

चीन साउथ एशिया में अपने प्रभुत्व को बढ़ाना चाहता है ताकि भारत के बढ़ते हुए कद को रोका जा सके. अगर हम देखें तो चीन भारत को घेरने में सफल भी हो पा रहा है. जहां एक ओर पाकिस्तान में 46 बिलियन डॉलर मूल्य के आर्थिक कॉरिडोर का निर्माण करा रहा है, रोड और पोर्ट में अपनी भागीदारी बढ़ा रहा है वहीं दूसरी ओर वो श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव में भी इन्वेस्टमेंट द्वारा अपने पहुंच और पावर को मजबूत कर रहा है.  

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भारत और नेपाल के संबंधों में पिछले कुछ समय से खटास चल रही है और जिसकी शुरुआत नए संविधान से हुई थी. नेपाल के तराई क्षेत्र के लोगों ने इसे भेदभावपूर्ण करार दिया था. भारतीय मूल के नेपाली नागरिक मधेसी के विरोध के बावजूद संविधान को 2015 में अंगीकार कर लिया गया था. इसके बाद आंदोलन हिंसक हो गया था और आंदोलनकारियों ने नेपाल-भारत के बॉर्डर को बंद कर दिया था. इसी ब्लॉकेड के दौरान नवम्बर 2015 में भारतीय सशस्त्र सीमा बल के 13 जवानों को नेपाल में पकड़ लिया गया था जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया था. इस घटना के कारण भी दोनों देशो में काफी तनातनी हुई थी. मधेसी आंदोलन के दौरान सामानों की सप्लाई में काफी असर पड़ा था और नेपाल में जरूरी चीजों की किल्लत हो गई थी. उस समय की ओली सरकार ने इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार माना था. अभी नेपाल में मधेसी लोगों के हित को लेकर संविधान में संशोधन पर बहस चल रही है. खबरों की मानें तो नजीजे सकारात्मक आने की उम्मीद है. 

ओली जुलाई 2016 में नेपाल के प्रधानमंत्री पद से हटे थे. उनकी चीन से बढ़ती हुई नजदीकियों को लेकर नेपाल में काफी हाय-तौबा मची थी. उसे नेपाली मीडिया ने 'पुअर टेस्ट' कहा था. उस दौरान उनके द्वारा लिए गए कुछ भारत विरोधी कदम जैसे मई 2016 में राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी की भारत यात्रा स्थगित करना और दिल्ली से राजदूत को वापस बुलाना को मीडिया ने गलत कहा था. अप्रैल 2015 में भीषण भूकंप के बाद तबाह नेपाल को संवारने की बजाय उस समय के प्रधानमंत्री ओली भारत-चीन स्पर्द्धा की दीवार खड़ी करने में लग गए थे. 

2008 से लेकर अभी तक नेपाल में कुल 9 बार नए प्रधानमंत्री बनाये गए हैं. प्रचंड दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं. अगर देखें तो पता चलेगा की वहां सरकारों में कितनी अस्थरिता है. गौर करें तो जो भी सरकार भारत के खिलाफ मत रखती है वो ज्यादा समय तक सत्ता में अपने को काबिज़ नहीं रख पाती है. समीक्षकों का मानना है की प्रचंड ने इसीलिए भारत दौरे को प्राथमिकता दी. 

प्रचंड पहली बार 2008 में पीएम बने थे, तब भारत को प्रचंड को लेकर उतना उत्साह नहीं था. उनका ट्रैक रिकॉर्ड भी भारत के प्रति दोस्ताना नहीं था. इस बार वो भारत से सम्बन्ध को लेकर पॉजिटिव रुख दिखा रहे हैं. प्रचंड की सरकार नेपाली कांग्रेस और मधेसी दलों के संगठन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक मधेसी फ्रंट के सपोर्ट पर टिकी है, जिनका भारत से अच्छा संबंध रहा है और शायद यही कारण है कि वो इस मौके को छोड़ना नहीं चाहते. हालांकि दहल ने नेपाली संसद की अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समिति से कहा है कि वह भारत से कोई नया एग्रीमेंट नहीं साइन करेंगे, बल्कि पुराने समझौतों के समीक्षा पर गौर करेंगे. 

भारत और नेपाल दोनों चाहते हैं की दोनों देशों के संबंध सुधरे. मई 2014 के बाद से मोदी सरकार की ये नीति रही है कि नेपाल से संबंध सुधरें और इसी दिशा में भारत प्रयास भी कर रहा है. अब देखना ये है की क्या प्रचंड का दौरा भारत-नेपाल के संबंधों में गरमाहट लाने के लिए ऐतिहासिक होता है या नहीं.

लेखक

आलोक रंजन आलोक रंजन @alok.ranjan.92754

लेखक आज तक में सीनियर प्रोड्यूसर हैं.

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