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Updated: 16 जुलाई, 2015 03:45 PM
जावेद एम अंसारी
जावेद एम अंसारी
  @javed.m.ansari.33
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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की इफ्तार पार्टी में शामिल नहीं होने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फैसला चौंकाने वाला नहीं है. अलबत्ता, अगर मोदी इस पार्टी में शामिल होते तो फिर जरूर हैरानी होती. प्रधानमंत्री को करीब से जानने वाले इससे वाकिफ होंगे. यह शायद मोदी का एक खास ट्रेंड है. पिछले साल भी उन्होंने इसमें हिस्सा नहीं लिया था. तब वह मुंबई दौरे पर थे.

इस बार प्रधानमंत्री बुधवार को शाम सात बजे पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक के कारण इफ्तार पार्टी में हिस्सा नहीं ले सके. यह बैठक जहां हुई उससे बमुश्किल एक किलोमीटर दूर ही राष्ट्रपति ने हर साल की तरह इस बार भी राजनीतिज्ञों, राजनयिकों और सिविल सोसाइटी के सदस्यों के लिए इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था.

नरेंद्र मोदी की यह शैली है. मोदी ऐसे किसी भी मौके पर यह संदेश देने से नहीं चूकते कि वह नेहरू के धर्मनिरपेक्ष मॉडल में विश्वास नहीं करते. मोदी की नजर में ऐसे आयोजन केवल 'प्रतीकात्मक' हैं. वहीं, उदारपंथी राजनीति का मानना है कि इफ्तार पार्टी भले ही सांकेतिक है लेकिन दूसरे धर्म और विश्वास को मानने वालों के त्योहार में शामिल होना एक अच्छा संदेश देता है. यह कहना गलत नहीं होगा कि लगभग सभी पार्टियों ने ऐसे मौकों का राजनैतिक इस्तेमाल किया है. इसमें मोदी की पार्टी भी शामिल है.

मोदी और उनके राजनैतिक सहयोगियों का मानना है कि इस तरह की 'प्रतीकात्मक' राजनीति की शुरुआत जवाहर लाल नेहरू ने की लेकिन लाल बहादूर शास्त्री के कार्यकाल में इसे बंद कर दिया गया. 1970 के दशक के मध्य में इफ्तार का आयोजन फिर से शुरू किया गया और तब से हर साल इसे आयोजित किया जाता रहा है. यहां तक कि बीजेपी के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस परिपाटी को जारी रखा. वाजपेयी ने न केवल 7 आरसीआर पर लोगों को आमंत्रित किया बल्कि कई दूसरी इफ्तार पार्टियों में भी हिस्सा लिया. एक मौके पर वाजपेयी को 2003 में विदेश जाना था, तब उन्होंने शहनवाज हुसैन को इफ्तार पार्टी की मेजबानी की जिम्मेदारी सौंपी.

यहां यह विषय नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इफ्तार पार्टी में शामिल नहीं होकर सही किया या नहीं. मेरा अपना मत है कि उन्हें इसमें हिस्सा नहीं लेने का पूरा अधिकार है. उनके करीब के लोगों के अनुसार मोदी 'प्रतीकात्मक' राजनीति में विश्वास नहीं करते, यह बात गले नहीं उतरती. अगर इफ्तार में हिस्सा नहीं लेने का यह सही कारण है तो फिर 'गुरुपर्व' में शामिल होने पर वह क्या कहेंगे. प्रधानमंत्री इस तरह के विषयों पर दो अलग-अलग स्टैंड नहीं ले सकते.

इफ्तार पार्टी की आलोचना अक्सर इस बात के लिए की जाती है कि यह केवल राजनीतिक फोटो शो बन कर रह गया है. लेकिन मोदी ने राष्ट्रपति की इफ्तार पार्टी से अलग रहकर जो राजनैतिक संदेश देने की कोशिश की है, वह निश्चित तौर पर एक विवादित फैसला है.

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लेखक

जावेद एम अंसारी जावेद एम अंसारी @javed.m.ansari.33

लेखक इंडिया टुड ग्रुप से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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