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Updated: 18 जुलाई, 2021 11:20 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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देश के प्रधानमंत्री के साथ हुई हर मुलाकात महत्वपूर्ण होती है - और जब ये किसी विपक्षी नेता (Opposition Unity) से तो हर किसी के कान खड़े हो ही जाते हैं. वो भी तब जब उस नेता के साथ मुलाकात हो जो सत्ताधारी दल के गठबंधन साथी को छीन कर अपने साथ सरकार बना लिया हो - और अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री के खिलाफ विपक्षी नेताओं को एकजुट कर मोर्चा खड़ा करने की कोशिश कर रहा हो.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार (Sharad Pawar) का मिलना तब तो और भी अहम हो जाता है जब उसका सीधा कनेक्शन महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार से जुड़ता हो. वो भी ऐसे दौर में जब गठबंधन पार्टनर कांग्रेस का महाराष्ट्र अध्यक्ष खुलेआम बोल रहा हो कि उद्धव सरकार का रिमोट तो शरद पवार के पास ही रहता है - और शिवसेना का विधायक उद्धव ठाकरे को फिर से बीजेपी के साथ हाथ मिला लेने की सलाह दे रहा हो.

राजनीति में किरदार बदल जाते लेकिन उसके निहितार्थ एक जैसे ही निकाले जाते हैं - शरद पवार से पहले जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी, तो स्वाभिविक तौर पर ऐसे ही कयास लगाये जाने लगे थे.

अच्छी बात ये है कि जब भी शरद पवार और प्रधानमंत्री मोदी मिलते हैं, दोनों ही तरफ से मुलाकात की तस्वीरें शेयर की जाती हैं - और कम से कम एक मुद्दा तो बता ही दिया जाता है, ये बात अलग है कि बाद में खबर आती है कि मुद्दा तो मुलाकात का औपचारिक विषय था, बातें तो ज्यादा इधर उधर की ही हुईं. जैसे महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार बनने से पहले वाली मुलाकात का विषय किसानों की समस्याएं थी, लेकिन पता चला राजनीतिक गठबंधन की गंभीर चर्चा हुई थी.

शरद पवार ने प्रधानमंत्री के साथ ताजा मुलाकात की वजह सहकारिता से जुड़े मुद्दे बताये हैं, बाकी बातों के लिए सही मौके का इंतजार करना होगा. बिलकुल वैसे ही जैसे प्रशांत किशोर के ज्वाइन करते वक्त नीतीश कुमार उनको जेडीयू का भविष्य बताते हैं - और अरसा बाद बताते हैं कि वो तो ऐसा अमित शाह के कहने पर किये थे. तभी तो जब नीतीश कुमार ने निकाल दिया तो प्रशांत किशोर ने भी बोल दिया कि वो अपने मन से तो कुछ कर नहीं रहे हैं.

बीती बातें अपनी जगह हैं और अभी लगता तो ऐसा है कि शरद पवार की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की एक वजह प्रशांत किशोर की विपक्षी दलों को लेकर एकजुटता की कोशिश भी हो सकती है - क्योंकि संसद के किसी भी सत्र के शुरू होने से पहले सदन को शांतिपूर्वक चलाने के लिए सर्वदलीय बैठकें तो होती हैं, लेकिन दोनों पक्षों के बीच इस कदर संवाद तो कम ही होता है जैसा मॉनसून सत्र से पहले हुआ है.

मॉनसून सत्र से पहले एक महत्वपूर्ण मुलाकात

मोदी और पवार की मुलाकात को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से ट्विटर पर तस्वीर तो शेयर हुई ही, एनसीपी नेता ने भी अपनी ट्विटर पोस्ट में औपचारिक जानकारी दी, 'देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की. राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई.'

लेकिन जैसे ही मुलाकातों को लेकर जितने मुंह उतनी बातें शुरू हुईं, एनसीपी प्रवक्ता और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नवाब मलिक सामने आये और बोले कि कांग्रेस और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को मुलाकात की जानकारी पहले से थी. अपने दावे पर भरोसा दिलाने के मकसद से नवाब मलिक ने लगे हाथ बड़ी बातें भी बोल दी, 'संघ का राष्ट्रवाद और एनसीपी का राष्ट्रवाद अलग है - दोनों नदी के दो छोर हैं जो कभी नहीं मिल सकते.'

sharad pawar, narendra modiमोदी-पवार मुलाकात के साइड इफेक्ट का सबसे बड़ा शिकार तो कांग्रेस नेतृत्व लगता है!

ऐसा लगता है जैसे नवाब मलिक नेतृत्व से मिले दिशानिर्देशों से थोड़े भटक से गये हों और शायद इसीलिए शरद पवार ने थोड़ा और डिटेल शेयर किया, जिसका एक मकसद एक संभावित डैमेज-कंट्रोल भी लगता है. वैसे पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे ने भी अपनी तरफ से एक गुगली डाल ही दी है, 'पवार साहब और मोदी जरूर मिले होंगे. हालांकि, चिंता की कोई बात नहीं है. पवार साहब गुगली फेंकने में माहिर हैं. वो ऐसी गुगली कई बार फेंक चुके हैं... चिंता करने का कोई कारण नहीं है.'

शरद पवार ने बताया कि वो नये सहकारिता मंत्रालय और सहकारी बैंकों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी से मिले हैं - एक पत्र शेयर करते हुए ये भी बताया कि मकसद कानून की खामियों के खामियाजे की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश भी रही.

हाल ही में हुई कैबिनेट फेरबदल में एक नया मंत्रालय भी बनाया गया है - सहकारिता मंत्रालय. मंत्रालय की जिम्मेदारी अमित शाह को गुजरात में उनके पुराने अनुभव के चलते दिया गया है, ऐसा बताया भी गया है. देखने में भले ही ये पंचायती राज व्यवस्था की तरह सहकारी आंदोलन को बेहतर और मजबूत बनाने की कवायद लगे, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में नेताओं के सहकारी आंदोलन से जुड़ाव और राज्य के कोऑपरेटिव कानूनों के संदर्भ में देखें तो ये दूरगामी सोच के साथ केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा ही लगता है.

अब अगर लोग सहकारिता मंत्रालय को भी अमित शाह के गृह मंत्रालय से निकलने वाले सरकारी विभागों के नोटिसों के साये में राजनीतिक निहितार्थ की कल्पना कर रहे हैं तो वे गलत भी नहीं हैं. ये इनकार करना मुश्किल भी हो सकता है कि विपक्ष सीबीआई, ईडी, आयकर और नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो जैसे आरोप आगे चल कर सहकारिता मंत्रालय के अफसरों पर लगाने से परहेज करेगा.

बहरहाल, मोदी-पवार मुलाकात के पीछे की वजह और उसके साइड इफेक्ट की हो तो ये जरूर माना जा सकता है कि ये हालिया विपक्षी गतिविधियों में शरद पवार के सेंटर में होने के चलते भी हो सकता है.

विपक्ष की राजनीति दम दिखाने लगी है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले शरद पवार की रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल से भी मुलाकातें हुई थीं. पीयूष गोयल को राज्य सभा में सदन का नेता बनाया गया है.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शरद पवार के साथ ही एके एंटनी के साथ भी मुलाकात की थी. मुलाकात के दौरान चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और आर्मी चीफ जनरल मुकुंद नरवणे भी मौजूद रहे.

असल में पवार और एंटनी दोनों ही देश के रक्षा मंत्री रह चुके हैं - और बताया गया है कि राजनाथ सिंह ने विपक्षी खेमे के दोनों नेताओं को चीन के मुद्दे पर सरकार के स्टैंड की जानकारी दी है.

अब जितनी महत्वपूर्ण ये मुलाकात है, तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण लगता है. कांग्रेस की तरफ से एके एंटनी ऐसी मुलाकातों को हिस्सा जरूर रहे हैं लेकिन उनका पूर्व रक्षा मंत्री होना बड़ी वजह है - ध्यान देने वाली बात ये है कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ऐसी किसी भी मुलाकात का हिस्सा नहीं बने हैं.

मोदी-पवार मुलाकात को ज्यादा समझने के लिए हाल की कई मुलाकातों से जोड़ कर भी समझने की कोशिश की जा सकती है. सिलसिले की शुरुआत प्रशांत किशोर की शरद पवार के साथ एक लंबी मुलाकात से होती है - और अंत पीके के गांधी परिवार के साथ हुई मीटिंग से. राहुल गांधी के घर पर प्रशांत किशोर ने प्रियंका गांधी और खबरों के मुताबिक सोनिया गांधी से भी वर्चुअल मुलाकात की थी.

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि गांधी परिवार से प्रशांत किशोर की मुलाकात यशवंत सिन्हा की पहल पर राष्ट्र मंच के बैनर तले विपक्षी दलों की एक अहम बैठक और उसके ठीक बात कमलनाथ के शरद पवार से मिलने के बाद होती है. समझने वाली बात ये रही कि ममता बनर्जी के लिए काम कर रहे प्रशांत किशोर ने शरद पवार को आगे कर विपक्ष को एकजुट करने की कवायद शुरू की और कांग्रेस को उससे पूरी तरह अलग रखा गया.

लेकिन जब कमलनाथ ने शरद पवार के घर जाकर मुलाकात की उसके बाद ही कांग्रेस को लेकर उनका बयान आया कि विपक्ष की कोई भी मोर्चेबंदी कांग्रेस के बगैर पूरा होना संभव नहीं है. बात भी सही है, लेकिन अब तो यही होता रहा कि विपक्षी खेमे को जुटाने में भी कांग्रेस की तरफ से एक खास सेलेक्शन प्रॉसेस हुआ करता था - और अब तक ऐसी बैठकों से अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को बाहर ही रखा जाता रहा.

पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्नी ने ये समीकरण बदलने की कोशिश की है. अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को आगे कर ममता बनर्जी ने मीटिंग तो करायी, लेकिन कांग्रेस नेताओं के नाम पर एनसीपी नेता माजिद मेमन ने उन नेताओं का नाम गिनाया था जिनमें ज्यादातर कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ बगावत के लिए जाने जाते रहे हैं.

अब खबर ये भी आ रही है कि ममता बनर्जी का दिल्ली दौरा जल्द ही होने वाला है - और उस दौरान विपक्षी खेमे के नेताओं से उनकी मुलाकात होनी है, ऐसी संभावना जतायी जा रही है. बताते हैं कि ये दौरा जल्दी ही हो सकता है लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की तारीख पक्की हो जाएगी उसके बाद ही - और उसके आस पास ही विपक्षी नेताओं की सक्रियता देखने को मिलेगी.

ये भी मान कर चलना होगा कि दिल्ली आकर ममता बनर्जी निश्चित तौर पर सोनिया गांधी से मिलेंगी क्योंकि अब तक तो ऐसा ही देखने को मिला है - और जरूरी नहीं कि राहुल गांधी से भी टीएमसी नेता की मुलाकात होगी ही क्योंकि ये भी होता ही आया है.

संसद के मॉनसून सत्र से पहले सत्ता पक्ष की गांधी परिवार और कांग्रेस नेताओं की जगह ज्यादा मुलाकातें शरद पवार से होना भी देश की राजनीति में बन रहे नये समीकरणों का ही संकेत है - ऐसे समीकरण बन रहे हैं जिसमें शरद पवार विपक्षी खेमे के बीच मजबूत कड़ी के तौर पर उभर कर सामने आये हैं. 19 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलने वाले मॉनसून सेशन में सरकार की तरफ से 17 बिल लाये जाने की संभावना जतायी गयी है.

मोदी-पवार मुलाकात तात्कालिक तौर पर सदन में विपक्ष की सत्ता पक्ष को घेरने की रणनीति को काउंटर करने की कोशिश भी सकती है. कांग्रेस ने जहां राफेल डील को लेकर वहीं ममता बनर्जी ने भी कई मुद्दों पर मोदी सरकार को संसद में घेरने की तैयारी कर रखी है. कांग्रेस को फ्रांस में राफेल को लेकर बिठायी गयी जांच के चलते एक मुद्दा नजर आ रहा है. वैसे भी राफेल डील तो राहुल गांधी का मोदी सरकार के खिलाफ पसंदीदा पुराना हथियार है ही.

संसद को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी मोदी सरकार की है - और हंगामा करने का नैसर्गिक हक विपक्ष को हासिल है, लिहाजा हर सेशन से पहले सत्ता पक्ष विपक्षी नेताओं से मिल कर एक औपचारिक गुजारिश करता है. ये परंपरा चली आ रही है, फर्क सिर्फ ये आया है कि विपक्षी खेमे से ज्यादा अहमियत राहुल और सोनिया गांधी को न मिल कर शरद पवार को मिल रही है - और तब भी गांधी परिवार फिर से मोर्चे पर आने की मन ही मन तैयारी कर रहा है तो समझ लेना चाहिये कि पहले ही उहापोह में बहुत देर हो चुकी है - अभी ममता बनर्जी का सामने आना तो बाकी ही है.

राजनीतिक कयासों और अफवाह या सपने में एक बड़ा फर्क तर्क का होता है - अब मोदी-पवार मुलाकात को लेकर चर्चाओं का में जो भी क्राइटेरिया प्रैक्टिस में हो, लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ये सब दो मिनट में मैगी की तरह पकाने की जरूरत नहीं लगती - शरद पवार के साथ सत्ता पक्ष के नेताओं की बारी बारी मुलाकात बता रही है कि बीजेपी नेतृत्व को भी नये सिरे से विपक्ष की अहमियत समझ में आने लगी है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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