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Updated: 05 सितम्बर, 2019 04:13 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
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जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटे 1 महीना हो चुका है. बीते हुए इस एक महीने में घाटी की सियासत का पासा पलट चुका है. महबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला और उनकी पार्टी के तमाम नेता नजरबंद है. सरकार अलगाववादियों को पहले ही जेल रवाना कर चुकी है. कुछ इलाकों में कर्फ्यू है तो कुछ में नहीं है. इंटरनेट और फ़ोन बंद हैं सरकार का यही प्रयास है कि कश्मीर की स्थिति जल्द से जल्द संभले. इन सारी बातों के बाद एक बड़ा सवाल ये भी खड़ा होता है कि आखिर कश्मीर और कश्मीर का आने वाला राजनीतिक भविष्य क्या होगा? ये सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जैसी स्थिति वर्तमान में है इसे ज्यादा दिन तक जस का तस नहीं रखा जा सकता. सरकार ने अपने प्लान को अमली जामा पहनना शुरू कर दिया है और घाटी में नए नेतृत्व के लिए फसल बोनी शुरू कर दी है.

दिल्ली में कश्मीर से आए सरपंचों के साथ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मुलाकात की है. घाटी के सरपंचों के साथ अमित शाह की ये मुलाकात उनके प्लान का हिस्सा बताई जा रही है. इस प्लान के अनुसार, शाह बड़े नेताओं से बिना किसी संवाद के सीधे गांवों की जनता से जुड़ना और पंचायत स्तर पर अपनी पैठ मजबूत करना चाह रहे हैं. अमित शाह की पंचों और सरपंचों से ये मुलाकात न केवल पंचायत सिस्टम को मजबूत करेगी. बल्कि इस मुलाकात का उद्देश्य कश्मीर के अंतर्गत पनपे परिवारवाद की परंपरा पर भाजपा सरकार का सीधा प्रहार है. जिसे कश्मीर के गर्त के अंधेरों में जाने की एक बड़ी वजह माना जा सकता है.

अमित शाह, सरपंच,मोदी सरकार, राजनीति, जम्मू कश्मीर,Amit Shah कश्मीर से आए सरपंचों से मिलते गृहमंत्री अमित शाह

नया नेतृत्व - पंच सरपंच

महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला अब कश्मीर के लिहाज से गुजरे ज़माने की बात हो गए हैं. अब घाटी का सारा दारोमदार पंचों और सरपंचों, जो समाज की सबसे निचली इकाई से आते हैं. और जिनकी पकड़ जमीन स्तर पर होती है. उनके ऊपर है. सरकार को लगता है कि उनके माध्यम से आम लोगों का विश्वास आसानी से जीता जा सकता है. इनको सरकार इसलिए भी आगे लेकर आई है क्योंकि अब तक इन्होंने तमाम तरह के जुल्मों सितम का सामना किया है. पिछली सरकारों ने अपनी तरफ से पूरे प्रयास किये कि ये लोग सक्रिय राजनीति में न आ पाएं. साथ ही ये आतंकवादियों की गोली और अलगाववादियों की बेरुखी का भी शिकार हुए.

पंचों और अमित शाह की मुलाकात में अब्दुल्ला और मुफ़्ती परिवार चर्चा की एक बड़ी वजह रहा. तमाम सरपंचों और प्रधानों ने बताया कि कैसे विगत के वर्षों में उन्हें 'मुफ्ती और अब्दुल्ला परिवारों' द्वारा डराया गया और लगातार उनके अधिकारों का हनन किया गया. यानी सरकार इन्हें इसलिए भी आगे लेकर आई है क्योंकि यही वो लोग थे जो अब तक घाटी में सबसे ज्यादा शोषण सहते आ रहे थे.

जैसा रुख पंचायत सिस्टम पर सूबे की पिछली सरकार का रहा, हमेशा ही ये राज्य सरकार की आंखों की किरकिरी और दिक्कत का कारण रहे. साफ़ है कि पिछली सरकारों ने इन्हें जी भरकर नजरंदाज किया. चाहे विधानसभा रही हो या फिर लोकसभा राज्य सरकारों ने खुद सत्ता भोगा और जब बात इनकी आई तो इन्हें और इनके मुद्दों को ठन्डे बसते में डाल दिया गया.

प्रधानमंत्री खुद इस बात को स्वीकार कर चुके हैं. लोकसभा चुनावों से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि कश्मीर में उनके द्वारा किये जा रहे तमाम प्रयास एक डेड एंड की तरफ पहुंच गए हैं जिससे आम लोगों को कोई फायदा नहीं मिला रहा है. अब जबकि सरकार इन्हें सामने ले आई है तो अपने आप ही साफ़ हो गया है कि सूबे का अगला मुख्यमंत्री इन्हीं पंचायत सदस्यों में से कोई एक हो सकता है. एक इंटरव्यू के दौरान पीएम मोदी ने कहा था कि कश्मीर की असल समस्या वो 50 के लगभग परिवार हैं जिन्होंने अपनी राजनीति को चमकाने के उद्देश्य से पूरी घाटी के निजाम और उस निजाम के अंतर्गत आने वाले अनुशासन की धज्जियां उड़ा दी हैं. पीएम मोदी ने ये भी बताया था कि 50 के लगभग ये परिवार नहीं चाहते कि राज्य के आम लोगों यानी कश्मीरियों को कोई फायदा पहुंचे.

सरपंचों से हुई अमित शाह की ये मुलाकात बड़े संकेत की तरह देखी जा सकती है. बूथ लेवल पर काम करना और उसे मजबूत करना अमित शाह की शक्ति है. अमित शाह इस काम में कितने अच्छे हैं? इसे जानने के लिए हम पश्चिम बंगाल या फिर उन तमाम राज्यों का रुख कर सकते हैं जहां कुछ वर्षों पहले तक कोई भाजपा का नाम लेने वाला नहीं था. उन राज्यों की जैसी स्थिति अब है वो हमारे सामने है.

कश्मीर का मामला भी कुछ कुछ ऐसा ही है. सरकार यहां निचले स्तर पर काम कर रही है. अमित शाह इस बात से परिचित हैं कि यदि उन्हें कश्मीर की बिगड़ी हुई स्थिति को संभालना है तो काम ग्राउंड जीरो से शुरू करना होगा. माना जा रहा है की मोदी -शाह की जोड़ी की इस पहल के परिणाम देर से निकलेंगे मगर इस पहल के बाद घाटी और घाटी की कानून व्यवस्था और तुगलकी रवैये पर एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा.

कश्मीर की मौजूदा स्थिति का रुख करने पर कुछ चीजें खुद साफ़ हो जाती हैं. सरपंचों के साथ मुलाकात करके भाजपा विशेषकर पीएम मोदी और अमित शाह ने अपने पत्ते खोलने की शुरुआत कर दी है. बताया जा रहा है कि भाजपा का ये प्रयास बुनियादी स्तर पर है लेकिन आने वाले वक़्त में हमें कश्मीर में तमाम ऐसी चीजें दिखेंगी जिन्हें हमने शायद ही कभी सोचा हो. बीते एक महीने से तनाव में रहने वाले कश्मीर के ये सरपंच गृहमंत्री के साथ हुई इस मुलाकात से काफी खुश हैं. कहा जा रहा है कि तनाव में घिरी घाटी के लिए ये एक अच्छी खबर है. साथ ही अपने इस प्रयास के बाद कहीं न कहीं सरकार भी जम्मू और कश्मीर को परिवारवाद से मुक्त करने और आम कश्मीरी आवाम के बीच एक भरोसा कायम करने में कामयाब हो गई है.

इस मुलाकात सड़े साफ़ है कि सरकार ने कश्मीर को पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के मकड़जाल से मुक्त कर दिया है. यानी हम बहुत जल्द कश्मीर में सियासत का एक पूरा नया चैप्टर देखने वाले हैं.  मुख्यमंत्री बनकर कोई ऐसा व्यक्ति शासन चलाएगा जो जमीन से जुड़ा होगा जिसने गरीबी और पस्ताहाली देखि होगी जिसने महबूबा और उमर के मचाए आतंक से संघर्ष किया होगा.

अमित शाह, सरपंच,मोदी सरकार, राजनीति, जम्मू कश्मीर,Amit Shahकश्मीर को लेकर पीएम मोदी पहले ही कह चुके हैं कि कुछ परिवारों ने पूरे कश्मीर को बर्बाद करके रख दिया

तो अब्दुल्ला और मुफ़्ती का क्या होगा ?

राज्य के दोनों पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती नजरबंद हैं. ये बहार आ भी गए तो इनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी है. घाटी के दोनों ही नेताओं ने किस हद तक घाटी के लोगों को बेवकूफ बनाया है. इसपर एक किस्सा है. एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि घाटी में पीडीपी के साथ भाजपा का गठबंधन एक प्रयोग का हिस्सा था. ये तब तक सही चला जब तक मुफ़्ती मोहम्मद सईद कश्मीर के मुख्यमंत्री थे. 2016 में मुफ़्ती मोहम्मद सईद कि मौत के बाद जब महबूबा मुफ़्ती राज्य की मुख्यमंत्री बनीं तो स्थिति वैसी नहीं थी जैसी वो पूर्व में हुआ करती थी. हमने उन्हें भी वैसा ही समर्थन दिया जैसा हमने उनके पिता को दिया था मगर बात जब पंचायत चुनाव की आई उन्होंने यही प्रयास किये कि इसे बढ़ाया जाए. इसके पीछे महबूबा ने तर्क दिए कि इससे घाटी में तनाव फैलेगा और हिंसा बढ़ेगी. ये चीजें घाटी में बदस्तूर चलती रहीं और नौबत घाटी में राज्यपाल का शासन लगाने तक की आ गई.

पहले कश्मीर की राजनीति एक बिल्कुल अलग तरह के मुहाने पर खड़ी थी. राज्य के नेता तअलग अलग भ्रष्टाचारों में लिप्त थे. ये लोग ऐसी गतिविधियों को अंजाम दे रहे थे जिसका एकमात्र उद्देश्य उनका अपना निजी फायदा था. सीधे लहजे में कहा जाए तो कश्मीर की सियासत के मद्देनजर वहां के नेताओं को एक पुल की तरह काम करना था लेकिन उन्होंने खाई का काम किया और दिल्ली और श्रीनगर के बीच दूरी बढाई. घाटी के नेता, खासतौर से महबूबा मुफ़्ती  और उमर अब्दुल्ला दिल्ली से कुछ और बात करते.बात जब स्थानीय लोगों की आती तो उनका नजरिया और नैरेटिव दोनों ही बिल्कुल अलग होता.

इस बात को हम राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के एक उदाहरण से समझ सकते हैं. आतंकवाद और अलगाववाद को लेकर जब दिल्ली, श्रीनगर पर दबाव बनाता. तो महबूबा यही कहतीं कि उनकी सरकार आतंकवाद और अलगाववाद के खात्मे की दिशा में काम कर रही है. वहीं जब बात आम कश्मीरियों की आती, तो वो अपनी कही पुरानी बातों से पलट जातीं. हम ऐसी तमाम खबरें सुन चुके हैं जिनमें बुरहान वानी या अन्य आतंकियों/अलगाववादियों के जनाजे में न सिर्फ महबूबा मुफ़्ती ने शिरकत की बल्कि भारत की हुकूमत के खिलाफ खूब दबाकर जहर भी उगला. राज्य के एक अहम नेता द्वारा ऐसा करने का नतीजा ये निकला कि कश्मीर की स्थिति ख़राब होती रही और जब राज्य सरकार ने इस दिशा में काम करना शुरू किया तो इसने अलगाववादियों को सरकार की आलोचना का मौका दिया और ऐसे तमाम मौके आए जब इन्हें भारत का एजेंट तक कह दिया गया.

ऐसा ही कुछ हाल उमर अब्दुल्ला का भी रहा. उन्होंने भी सियासत का इस्तेमाल केवल और केवल अपने फायदे के लिए किया और ऐसी तमाम गतिविधियों को अंजाम दिया जिसने कश्मीर की समस्या को कम करने के बजाए बढ़ाने का काम किया. आज भी ट्विटर पर वो तमाम  कश्मीर की सियासत का एक दिलचस्प पहलू ये भी रहा कि सत्ता या तो यहां अब्दुल्ला कुन्बे में जाती या फिर सत्ता की मलाई मुफ़्ती परिवार खाता. इन तमाम बातों पर यदि गौर करें तो ये भी सामने आता है कि इन दोनों ही परिवारों ने कभी अन्य लोगों को ऊपर आने का मौका ही नहीं दिया. अब जबकि ये नजरबंद हैं तो ये अपने आप साफ़ है कि इन्हें अपनी राजनीतिक जमीन हासिल करने में अभी लम्बा वक़्त लगेगा.

अमित शाह, सरपंच,मोदी सरकार, राजनीति, जम्मू कश्मीर,Amit Shahबुरहान वानी के जनाजे में गयीं महबूबा मुफ़्ती की इस तस्वीर ने खुद तमाम सवालों के जवाब दे दिए हैं

चूंकि अब सरकार ने कश्मीर से अलगाववाद ख़त्म करके सारा स्कोप ख़त्म कर दिया है. सियासत में भी तरजीह उसी को दी जाएगी जो न सिर्फ विकास की बातें करेगा बल्कि उसे अमली जामा पहनाएगा. सियासत के लिहाज से कश्मीर का आने वाला वक़्त न सिर्फ दिलचस्प है बल्कि कई मायनों में ये खासा महत्वपूर्ण भी है. उस स्थिति में कश्मीर के ख़राब हालात को संवारने की जिम्मेदारी खाली दिल्ली की नहीं रहेगी बल्कि इसमें एक बड़ी भूमिका आने वाले नेताओं की भी होगी. दक्षिण कश्मीर ने हमेशा ही सरकार को चुनौती दी है इसलिए माना यही जा रहा है कि सरकार के ताजे प्रयास वहां की भी स्थिति सुधारने में मददगार साबित होंगे.  कुल मिलाकर ये कहना हमारे लिए कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं है कि कश्मीर से आए सरपंचों के डेलिगेशन से मिलकर मोदी-शाह की जोड़ी ने खुद कश्मीर के लोगों को एक बड़ा मौका दिया है. अब ये उनपर निर्भर करता ही कि वो अपना मुकद्दर बनाते हैं या फिर उसे वैसा ही छोड़ देते हैं जैसा वो वर्तमान में है.

बहरहाल, बात कश्मीर की सियासत के तीन चरणों पर हुई है. तो हमारे लिए ये बता देना भी जरूरी है कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए ख़त्म करने के दौरान सरकार ने इस बात का वादा किया था कि, वो हर हाल में कश्मीर को विकास की मुख्य धारा से जोड़ेगी. पाकिस्तान पोषित आतंकवाद और अलगाववाद का खात्मा करेगी. सरकार ने इस मामले को लेकर अब तक जो प्रयास किये हैं उन्होंने इस बात की गवाही दे दी है कि सरकार ने अपनी बातों में रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं किया है. चीजों को बदलने में वक़्त लगता है और इस मामले में न सिर्फ घाटी के लोगों बल्कि सरकार को भी वक़्त चाहिए.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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