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Updated: 27 नवम्बर, 2021 06:19 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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किताबें बहस शुरू करायें ये तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन किताबों के बहाने खास मंशा से बहस शुरू की जाये उससे बुरा भी कुछ नहीं हो सकता. हाल फिलहाल शुरू हुई कई बहसों का आधार किताबों के विमोचन समारोह बने हैं - और जो बहस चली है, उसमें किताबों से ज्यादा समारोह में हिस्सा ले रहे मेहमानों के भाषण की भूमिका रही है.

हिंदुत्व को लेकर कांग्रेस नेता मीरा कुमार (Meira Kumar) ने नये सिरे से एक पुरानी बहस को ही आगे बढ़ा रही हैं. अपनी बात कहने के लिए मीरा कुमार ने अपने पिता जगजीवन राम का संदर्भ भी पेश किया है - और खास बात ये है कि हिंदुत्व के जिस पक्ष की तरफ मीरा कुमार ने ध्यान दिलाया है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी उसकी अरसे से खासी फिक्र रही है. फिक्र भी गंभीर इसलिए हो जाती है क्योंकि उस दिशा में संघ की हर कोशिश भी आखिर में किसी सकारात्मक नतीजे तक नहीं पहुंच पाती.

मीरा कुमार से पहले कांग्रेस से ही हिंदुत्व के दो-स्वरूप पेश करने की कोशिशें हुई हैं, लेकिन वे बिलकुल अलग हैं. राहुल गांधी (Rahul Gandhi) तो अपनी थ्योरी बाद में दिये, पहले तो कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने अपनी किताब में हिंदुत्व की तुलना मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों ISIS और बोको हराम से कर डाली - और 2022 में होने जा रहे विधानसभा चुनावों से जैसे पहले सांप्रदायिकता की राजनीति में नया मसाला छिड़क दिया.

मीरा कुमार ने भी हिंदुत्व के दो अलग अलग शेड्स की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की है जो राजनीतिक से ज्यादा सामाजिक सरोकार लगता है. लंबे अरसे से संघ प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) भी हिंदुत्व के उस फॉर्मूले पर अभियान चला रहे हैं, जो 'एक कुआं, एक श्मशान और एक मंदिर' को प्रमोट करता है - लेकिन तमाम ताम-झाम भरी कवायदें नाकाम ही नजर आयी हैं.

ये डबल-बैरल-हिंदुत्व राजनीति में नया फैशन है

पूर्व लोक सभा स्पीकर मीरा कुमार ने हिंदुत्व को लेकर जिस फिक्र का जिक्र किया है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उससे काफी समय से जूझ रहा है - और 2015 से तो संघ प्रमुख मोहन भागवत सक्रिय रूप से स्थायी सॉल्यूशन ढूंढ रहे हैं, मगर अफसोस की बात है कि अब तक ऐसी कोई भी मुहिम अपेक्षा के अनुरूप नतीजे नहीं दे पायी है.

मुद्दा भले ही एक जैसा लगता हो, लेकिन मीरा कुमार और मोहन भागवत का मकसद तो एक जैसा होने से रहा - क्योंकि ये बात भी तो विचारधाराओं के टकराव से ही निकल कर सामने आ रही है. हिंदुत्व के भीतर के जातिगत भेदभाव को लेकर मीरा कुमार की चिंता कांग्रेस के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए है, जबकि मोहन भागवत की चिंता जैसे भी संभव हो, हिंदू समुदाय को एकजुट रखने की है. हालांकि, दोनों का कॉमन मकसद राजनीतिक ही है.

meira kumar, mohan bhagwatहिंदुत्व पर मीरा कुमार और मोहन भागवत की चिंता एक जैसी, लेकिन एजेंडा अलग अलग!

उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने जा रहे 2022 के शुरू में विधानसभा चुनावों को लेकर बन रहे माहौल में ये बातें ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाती हैं. कांग्रेस ने अगर पंजाब को पहला दलित मुख्यमंत्री दिया है तो ये अलग जगाये रखने की जिम्मेदारी तो मीरा कुमार जैसे नेताओं पर ही आ जाती है. वैसे भी मीरा कुमार उस राष्ट्रपति चुनाव में भी उम्मीदवार रह चुकी हैं जिसका मूल भाव 'दलित बनाम दलित' के दायरे में सिमट कर रह गया था.

और संविधान दिवस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर भीमराव अंबेडकर का नाम ले लेकर चिंता जाहिर करते हैं तो तो भी वो दलित एजेंडे को ही अपने तरीके से हाइलाइट करने की कोशिश कर रहे हैं, जो हिंदुत्व की राजनीति में कमजोर नस जैसा ही है. जिसके हर वक्त हाथ से फिसल जाने का खतरा मंडराता रहता है और उसके मुकाबले दलित-मुस्लिम को जोड़ कर राजनीति अलग तरीके से शुरू हो जाती है.

1. सलमान खुर्शीद का तुलनात्मक अध्ययन: हिंदुत्व को लेकर ताजातरीन बहस शुरू हुई है, कांग्रेस नेता और यूपी में पार्टी के मैनिफेस्टो कमेटी के प्रभारी सलमान खुर्शीद की किताब 'सनराइज ओवर अयोध्या' जिसमें लेखक ने हिंदुत्व के कट्टर फेस और सनातन हिंदुत्व को अपने हिसाब से अलग बताने की कोशिश की है, लेकिन उसकी तुलना भी मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों से कर डाली है.

सलमान खुर्शीद ने किताब के छठे चैप्टर 'द सैफ्रन स्काई' के पेज नंबर 113 पर लिखा है, "साधु और संत जिस सनातन धर्म और शास्त्रोक्त हिंदुत्व की बातें करते आये हैं, आज उसे कट्टर हिंदुत्व के जरिये हाशिये पर धकेला जा रहा है. हर तरीके से ये एक राजनीतिक संस्करण है जो हाल के वर्षों में ISIS और बोको हराम जैसे जिहादी मुस्लिम गुटों के समान है."

2. राहुल गांधी की डबल-बैरल हिंदुत्व थ्योरी: वर्धा के सेवाग्राम आश्रम में आयोजित एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने हिंदू धर्म और हिंदुत्‍व में अपने हिसाब से फर्क समझाने की कोशिश की थी - ये भी याद दिलाया कि ये सब वो उपनिषद पढ़ने का बाद बता रहे हैं.

कांग्रेस नेता राहुल के मुताबिक, 'हिंदू धर्म और हिंदुत्‍व, दोनों अलग-अलग बातें हैं' - और उनकी दलील है, 'अगर एक होते तो उनका नाम भी एक ही होता.'

कहते हैं, 'सिम्‍पल सा लॉजिक है... अगर आप हिंदू हो तो हिंदुत्‍व की क्‍या जरूरत है? नये नाम की क्‍या जरूरत है?'

सलमान खुर्शीद के हिंदुत्व और इस्लाम के तुलनात्मक अध्ययन के बाद, ये राहुल गांधी का सिद्धांत है - और इसे लेकर दावा है कि उपनिषद पढ़ने के बाद उनकी राय बनी है.

3. मीरा कुमार कुमार क्या चाहती हैं: कांग्रेस नेता मीरा कुमार ने भी हिंदुत्व के दो रूपों का जिक्र किया है. मीरा कुमार की बातों से एकबारगी तो लगता है जैसे वो समाज में जातीय व्यवस्था से निजात पाना चाहती हैं और एक प्रसंग के जरिये खुद का उदाहरण भी देती हैं. मीरा कुमार ने ये बातें कांग्रेस नेता जयराम रमेश की किताब के विमोचन के मौके पर कही है. जयराम रमेश की किताब को लेकर मीरा कुमार का कहना है कि उसने सामाजिक व्यवस्था का एक बंद दरवाजा खोलने में मदद की है, जिसके भीतर लोगों का दम घुट रहा था.

मीरा कुमार की बातें काफी गंभीर हैं, 'मैं आपसे कहती हूं कि दो प्रकार के हिंदू हैं... एक वे जो मंदिर में जा सकते हैं... दूसरे मेरे जैसे जो नहीं जा सकते.'

फिर वो जातीय व्यवस्था की पृष्ठभूमि में अपने सतत संघर्ष की तरफ ध्यान खींचती हैं, 'पुजारी ने अक्सर मुझसे मेरा गोत्र पूछा है... मैंने उनसे कहा है कि मेरी परवरिश वहां हुई है जहां जाति को नहीं माना जाता...'

मीरा कुमार कहती हैं, ‘हम 21वीं सदी में रहते हैं... हमारे पास चमचमाती सड़कें हैं, लेकिन बहुत से लोग जो उन पर चलते हैं वे आज भी जाति व्यवस्था से प्रभावित हैं...

और फिर पूछती हैं, 'हमारा मस्तिष्क कब चमकेगा? हम कब अपने जाति आधारित मानसिकता का त्याग करेंगे?'

क्या वास्तव में मीरा कुमार ऐसा ही चाहती हैं? जातीय व्यवस्था से निजात? फिर तो मीरा कुमार को खुल कर जातीय जनगणना की मांग का भी विरोध करना चाहिये.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी हिंदुत्व को धर्म से इतर लाइफस्टाइल के तौर पर समझाने की कोशिश करता रहा है. चूंकि मुस्लिम समुदाय धर्म के खांचे में मिसफिट हो जाता है, इसलिए उसे भारत के पूर्वजों के बहाने लाइफस्टाइल से जोड़ कर एक बताने की कोशिश रहती है, लेकिन ये थ्योरी भी ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाती क्योंकि आगे हिंदू राष्ट्र का एजेंडा साफ साफ नजर आने लगता है - और यही डबल-बैरल-हिंदुत्व राजनीति में लेटेस्ट फैशन चल रहा है.

जातिवाद और सिनेमा में दलित विमर्श

1. धर्म बदलने से जाति नहीं बदल जाती: जाति और धर्म के कॉकटेल का एक मामला मद्रास हाईकोर्ट तक पहुंचा था जिसमें एक शख्स धर्म बदल कर इंटरकास्ट मैरेज के नाम पर लाभ लेने के कोशिश में था. हाई कोर्ट ने ये कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि एक धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाने से व्यक्ति की जाति नहीं बदलेगी. कोई दलित व्यक्ति धर्म परितवर्तन करता है तो कानूनन उसे आरक्षण का फायदा पिछड़े वर्ग के तौर पर मिलता है, न कि अनुसूचित जाति के तौर पर.

हुआ ये कि एक दलित व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर ईसाई और शादी एक दलित समुदाय की ही लड़की से की, लेकिन उसका धर्म नहीं बदला. जब प्रशासनिक अधिकारियों ने उसकी रिक्वेस्ट नहीं सुनी तो उसने अदालत का रुख किया कि उसकी शादी इंटर-कास्ट मैरेज है, लिहाजा उसे सरकारी नौकरियों में आरक्षण का फायदा मिलना चाहिये. निचली अदालत से अर्जी रिजेक्ट होने के बाद वो हाईकोर्ट पहुंचा.

2. जाति नयी शक्ल दी जा सकती है, खत्म नहीं किया जा सकता: बीजेपी की राजनीति छोड़ संघ लौट चुके राम माधव का मानना है, 'जाति सामाजिक ढांचे में बना सिस्टम है. समाज असंगठित तरीके से नहीं चल सकता. सिस्टम में वैक्यूम जैसी जगह नहीं होती. ऐसे में वक्त की जरूरत ये है कि जाति को किसी और चीज से रिप्लेस किया जाये, न कि इसे खत्म करने का प्रयास होना चाहिये.' ये विचार राम माधव ने अपनी किताब द हिंदुत्व पैरडाइम में व्यक्ति किया है.

3. सिनेमा का दलित महानायक: सोशल मीडिया के दलित एक्टिविस्ट दिलीप मंडल अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, 'तमिल नया सिनेमा के सभी डायरेक्टर एससी या ओबीसी समुदायों से हैं. इन तमिल फिल्मकारों के वंचित सामाजिक समूहों से आने का नतीजा ये है कि इन फिल्मों का नजरिया अलग हो गया है, क्योंकि ये समाज को नीचे से देख रहे हैं, जबकि हिंदी और बांग्ला के फिल्मकार समाज को अपनी नजर यानी ऊपर से देख रहे हैं.

एक अन्य पोस्ट में दिलीप मंडल उदाहरण देते हैं, 'सत्यजीत राय की सद्गति का दलित रोता है... लगान का कचरा रोतला है... अनुभव सिन्हा की आर्टिकल 15 के दलित या तो गूंगे हैं या रोते हैं... सुजाता, पार, दामुल से लेकर अब तक इनको लगातार रोता दिखाया गया है... तमिल फिल्में पेरियारुम पेरुमल, कबाली, काला, असुरन, कर्णन और सरपट्टा लेकर आ गईं - यहां दलित महानायक हैं.'

मीरा कुमार हिंदुत्व के जिस पक्ष की तरफ ध्यान दिलाना चाहती हैं, तमिलनाडु में धर्म बदल कर आरक्षण का फायदा लेने की कोशिश भी तो उसी का एक पक्ष है. उसे तस्वीर का दूसरा पहलू भी समझ सकते हैं - और जातिगत व्यवस्था का जो फायदा धर्म बदल कर उठाने की उस शख्स ने जो कोशिश की है, वही मोहन भागवत के लिए गंभीर चिंता का विषय है. क्योंकि वो नहीं चाहते कि हिंदू किसी भी सूरत में धर्म छोड़े, लेकिन उसे रोक भी नहीं पाते और ये सबसे बड़ी विडंबना है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संघर्ष

13 से 15 मार्च, 2015 के बीच RSS की तीन दिन की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में चर्चा में सबसे ऊपर मुद्दा यही था कि हिंदुत्व के भीतर जातिवाद का क्या सॉल्यूशन हो. तभी समाधान के तौर पर एक फॉर्मूला निकल कर आया - 'एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान!'

नागपुर में आयोजित उस सभा में 1400 प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे थे और - और उसमें कई राज्यों में कराये गये जातिगत सर्वे भी सब के सामने रखे गये. संघ का मकसद हिंदुओं के बीच जातिगत भेदभाव खत्म करने के मकसद से अगले तीन साल के लिए इसे मूल मंत्र बनाकर रणनीति तैयार की गयी. तीन साल की वो मियाद पूरी हुए भी तीन साल बीत चुके हैं और मामला टस से मस हुआ हो ऐसा भी नहीं लगता.

उससे थोड़ा पहले संतों और मठों के प्रमुखों की भी एक बैठक बुलायी गयी थी जिसमें छुआछूत और जातिगत भेदभाव खत्म करने की अपील की गयी. खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कार्यकर्ताओं को हिदायत दी गयी कि वे सभी राज्यों में जनजागरण समितियों के जरिये अभियान तेज करें. जातिगत भेदभाव को रोकने के उपायों पर भागवत ने प्रजेंटेशन बनाने का भी सुझाव दिया था. मान कर चलना चाहिये प्रजेंटेशन बना भी होगा और किसी कोने में धूल फांक रहा होगा.

ऐसा भी नहीं कि संघ की तरफ से हुई कोशिशें कहीं दिखी नहीं. खूब तस्वीरें शेयर की गयीं. एक से बढ़ कर एक नजारे भी देखने को मिले. अमित शाह और राजनाथ सिंह सहित बीजेपी नेताओं को दलितों के घर लंच करने के फोटो जरूर प्रचारित किये गये. दलित महिलाओं से राखी बंधवाने के कार्यक्रम भी आयोजित किये गये - फिर भी संघर्ष जारी है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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