होम -> सियासत

 |  7-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 05 अगस्त, 2019 02:16 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
  • Total Shares

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने साफ साफ कह दिया है कि संसद सत्र चल रहा है, ऐसे में जो भी होगा, छिपा कर तो कुछ भी नहीं होने वाला है. गवर्नर ने ये बात भी महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला जैसे कश्मीरी नेताओं सूबे में हो रही हलचल को लेकर लगातार बयानबाजी के प्रसंग में ही कही है.

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की गतिविधियों को लेकर सोशल मीडिया पर एक बात खूब चल रही थी- कुछ बड़ा होने वाला है! स्वामी रामदेव भी शायद उसी बात को आगे बढ़ाते नजर आ रहे थे- 'आजादी के बाद से जिसका हर किसी को इंतजार था अब वो होने वाला है.' अमरनाथ यात्रा के रास्ते में मिले हथियार और माइंस और सरहद पार से आतंवादियों की घुसपैठ की कोशिश के बीच सुरक्षा बलों की कार्रवाई भी चल रही है. घाटी में नाजुक नजर आ रहे हालात के बीच अमरनाथ यात्रियों सहित सारे सैलानियों को वापस भेजा गया.

महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला जैसे कश्मीरी नेता केंद्र की मोदी सरकार से जानना चाह रहे थे कि 'कुछ बड़ा होने वाला...' जैसी बातों के आखिर मायने क्या हैं? महबूबा मुफ्ती का कहना था कि बार बार पूछे जाने के बावजूद केंद्र सरकार स्थिति साफ नहीं कर रही है.

लेकिन, अब सबकुछ साफ हो गया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्‍यसभा में जम्‍मू-कश्‍मीर से जुड़ी धारा 370 को खत्‍म करने का प्रस्‍ताव रखा. और इसी के साथ 35A का मामला भी खत्‍म हो गया. जम्‍मू-कश्‍मीर और लद्दाख दो अलग-अलग केंद्र शासित राज्‍य बना दिए गए. इसी के साथ करीब 70 साल से आतंकवाद और अलगाववाद झेल रहे इस सूबे के खाते में ऐतिहासिक बदलाव जोड़ दिया गया.

संसद में चल रही इस संवैधानिक फेरबदल की कार्यवाही के बीच जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला से चंडीगढ़ में ED की पूछताछ के बाद, अब एंटी करप्शन ब्यूरो ने महबूबा मुफ्ती से नोटिस भेज कर भ्रष्टाचार के एक मामले में सफाई मांगी है.

महबूबा और अब्दुल्ला दोनों ही ने धारा 370 और 35A से छेड़छाड़ होने के गंभीर नतीजे होने की धमकी भी दे रहे हैं - लेकिन क्या वे वाकई कश्मीर के लोगों को लेकर ही इतने फिक्रमंद हैं?

भ्रष्टाचार के मामले में महबूबा से मांगी गयी सफाई

बीजेपी और पीडीपी गठबंधन सरकार की मुख्यमंत्री रहीं, महबूबा मुफ्ती का इल्जाम है कि जांच एजेंसियों के जरिये कश्मीरी नेताओं को डराने की कोशिश हो रही है. महबूबा मुफ्ती ने खुद को मिले नोटिस के साथ साथ, फारूक अब्दुल्ला को पूछताछ के लिए चंडीगढ़ बुलाये जाने का मामला भी उठाया है.

जांच एजेंसियों के एक्शन और महबूबा मुफ्ती के केंद्र की मोदी सरकार पर आरोपों से सवाल जरूर पैदा होता है - लेकिन क्या कश्मीरी नेता जांच एजेंसियों के एक्शन को काउंटर करने के लिए ही कश्मीर का मुद्दा उछाल रहे हैं?

दरअसल, ACB यानी एंटी करप्शन ब्यूरो ने महबूबा मुफ्ती को एक नोटिस भेजा है. ये नोटिस जम्मू और कश्मीर बैंक में नियुक्तियों को लेकर पहले से ही चल रही जांच के सिलसिले में है.

ACB के एसएसपी की तरफ से 3 अगस्त को जारी एक पत्र में महबूबा मुफ्ती से कहा गया है - 'FIR के बाद जांच से पता चला है कि नियुक्तियों के लिए जम्मू और कश्मीर बैंक के चेयरमैन से कुछ मंत्रियों ने सिफारिश की थी.'

इसी सिलसिले में ब्यूरो ने पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से पूछा है 'ये साफ करना जरूरी है कि इन नियुक्तियों के लिए क्या आपकी ओर से मौखिक या अन्य तरीके से हामी भरी गई थी क्या?'

acb letter to mehbooba muftiACB की तरफ से ऐसे नोटिस कुछ और नेताओं को भी भेजे जा सकते हैं.

महबूबा मुफ्ती की पार्टी PDP ने एसीबी के नोटिस पर गहरी नाराजगी जताई है और आरोप लगाया है कि जम्मू-कश्मीर केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण नेताओं निशाना बनाया जा रहा है. पता चला है कि राज्य सरकार में मंत्री रहे कुछ और नेताओं के खिलाफ भी ऐसे नोटिस जारी किये जा सकते हैं.

महबूबा मुफ्ती का भी कहना है कि उन पर दबाव बनाया जा रहा है और जानबूझ कर भ्रष्टाचार के आरोप मढ़े जा रहे हैं. महबूबा से पहले राज्य के मुख्यमंत्री रहे फारूक अब्दुल्ला को भी ED ने भ्रष्टाचार के एक अन्य मामले में पूछताछ के लिए चंडीगढ़ बुलाया था.

फारूक अब्दुल्ला से ED ने की पूछताछ

बताते हैं कि BCCI की ओर से 2002 से 2012 के बीच जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन को सूबे में क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए 113 करोड़ रुपये का फंड रिलीज किया गया था, लेकिन इस पूरी रकम खिलाड़ियों को प्रस्तावित सुविधाओं पर खर्च नहीं की गयी.

ये तब का मामला है जब फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हुआ करते थे. फारूक अब्दुल्ला के अलावा इस घोटाले में एसोसिएशन के तत्कालीन महासचिव मोहम्मद सलीम खान, कोषाध्यक्ष एहसान अहमद मिर्जा और जम्मू कश्मीर बैंक का एक कर्मचारी बशीर अहमद मिसगर भी आरोपी है. सभी पर आपराधिक साजिश और विश्वासघात करने का आरोप लगा है.

भ्रष्टाचार के जिस मामले में फारूक अब्दुल्ला से पूछताछ हुई है वो 113 करोड़ रुपये का मामला बताया जा रहा है. ये क्रिकेट एसोसिएशन को मिले फंड में गड़बड़ी का मामला है.

जांच पड़ताल का पैटर्न तो एक जैसा ही है

कानून सबके लिए बराबर है, इसलिए जांच एजेंसियां भी बगैर भेदभाव के एक ही पैटर्न पर सभी मामलों में जांच के साथ आगे बढ़ रही हैं. देखा जाये तो महबूबा-अब्दुल्ला के आरोप वैसे ही हैं जैसे आम चुनाव के दौरान मायावती और अखिलेश यादव लगाते रहे. या लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले में सजा मिलने पर जेल जाने के बाद आरजेडी नेता तेजस्वी यादव लगाते रहे हैं. प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा भी तो ED के सामने पूछताछ के लिए वैसे ही पेश होते रहे हैं जैसे अभी अभी फारूक अब्दुल्ला हुए हैं. या फिर मायावती को जब तब सीबीआई नोटिस देकर बुला लिया करती है.

हाल ही में एनसीपी नेता शरद पवार ने आरोप लगाया था कि उनकी पार्टी के नेताओं को जांच एजेंसियों के नाम पर धमकाया जा रहा था, ताकि वे पाला बदल लें. पवार के भी निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ही रहे.

वैसे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का भी एक ऐसा ही बयान आया है. बयान का प्रसंग तो अलग है लेकिन सत्ताधारी बीजेपी के विरोधियों को घेरने के आरोपों को लेकर अधिक प्रासंगिक लगता है. महाराष्ट्र में जनादेश यात्रा पर निकले देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर ने कहा - 'जिसने छोड़ा मोदी का साथ, उसका हुआ सत्यानाश.'

प्रसंग भले ही अलग हो, लेकिन ये महबूबा मुफ्ती के मामले में बिलकुल फिट बैठता है. जम्मू-कश्मीर में बीजेपी ने पीडीपी के साथ मिल कर सरकार बनायी थी और फिर समर्थन वापस ले लिया. एक आम धारणा बन चुकी है कि दूसरे दलों के दागी नेता बीजेपी का भगवा ओढ़ते ही पवित्र हो जाते हैं. वैसे सिर्फ देश की बात कौन कहे, इजरायल में तो भ्रष्टाचार के आरोपों के फेर में पड़े बेंजामिन नेतन्याहू चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर भी इस्तेमाल कर रहे हैं. महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस की बात तो वाकई दमदार लग रही है.

इन्हें भी पढ़ें :

कश्मीरी नेताओं की धड़कन बढ़ी हुई है तो वह बेवजह नहीं है

कश्‍मीर में कयासों का हड़कंप: क्‍या 5 से 7 अगस्‍त के बीच कुछ होने वाला है?

कश्मीर तो निमित्त मात्र है, मोदी सरकार के फोकस पर Pakistan है

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय