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Updated: 16 मई, 2020 10:44 AM
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लॉकडाउन 4.0 में तमाम तरह के छूट (Lockdown 4.0 Relaxations) की संभावनाएं जतायी जा रही हैं. ऐसा लग रहा है कि जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने के लिए स्थिति सामान्य बनाने की कोशिश की जा रही है. ये पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की तरफ से ही हो रही है ताकि देश की अर्थव्यवस्था को संभाला जा सके. प्रधानमंत्री मोदी के आर्थिक पैकेज की घोषणा के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण उससे जुड़ी तमाम चीजों को धीरे धीरे विस्तार से रखती जा रही हैं.

देश के मुख्यमंत्रियों से लॉकडाउन 4.0 को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने 15 मई तक सुझाव देने को कहा था और उसके बाद 18 मई से नये दिशानिर्देश भी आ जाएंगे. रेल यातायात तो पहले से ही शुरू हो चुका है, लॉकडाउन के चौथे चरण में हवाई सेवा और दिल्ली मेट्रो के साथ ऑटो, टैक्सी से लेकर बस सेवा बहाल करने जैसी संभावनाएं भी किसी न किसी तरीके से नजर आने लगी हैं. एयर इंडिया की बुकिंग और दिल्ली मेट्रो में सोशल डिस्टेंसिंग की स्टिकर लगी तस्वीरें सबूत के तौर पर देखी जा सकती हैं.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या देश के लोग भी इतने तैयार हैं कि छूट मिल जाने पर भी संयम बरतने को तैयार होंगे?

लोग मानेंगे तब तो!

जिस आगरा मॉडल की दुहाई दी जा रही थी वो फेल हो गया. आगरा मॉडल तो दूर अब वो रेड जोन बन चुका है. जो गोवा कोरोना मुक्त राज्य बताया जा रहा था वहां नये मामले दर्ज किये जा चुके हैं. केरल जैसे राज्य में जिसकी कोरोना को काबू में रखने की मिसाल दी जा रही है वहां भी नये मामले आने बंद नहीं हो रहे हैं.

उत्तर प्रदेश का बलिया जिला ग्रीन जोन में था और अपने अगल बगल के आरा, छपरा और सिवान में कोरोना संक्रमितों की मौजूदगी के बावजूद कोरोना वायरस के प्रभाव से अछूता रहा - लेकिन अहमदाबाद से पहुंचे एक व्यक्ति के पॉजिटिव आने की खबर के बाद से हाल ये हुआ कि अब जिले में 10 हॉट स्पॉट बन चुके हैं. जो बाजार खुल चुके थे और जिंदगी धीरे धीरे सामान्य होने लगी थी, एक झटके में काफी पीछे चली गयी है.

आखिर ऐसे ही ग्रीन जोन की ज्यादा संख्या के कारण ही तो आर्थिक गतिविधियां बहाल करने की तैयारी चल रही है. बताया तो यही गया है कि रेड जोन को छोड़ कर बाकी ऑरेंज जोन और ग्रीन जोन में कई तरह के कामों की छूट दी जाएगी. लॉकडाउन के मौजूदा दौर में भी तो हालात को बेहतर समझ कर ही कामकाज को आगे बढ़ाया जा रहा है.

social distancing mockingलॉकडाउन 3.0 में सोशल डिस्टेंसिंग का ये नमूना है - आगे क्या होगा?

लेकिन जो हाल आगरा और बलिया में हुआ है और जिस तरीके से गोवा और केरल में संक्रमण के नये मामले आ रहे हैं - अगर कामकाज शुरू किया गया तो बंद ही करना पड़ेगा. फिर ऐसे कामकाज शुरू करने का क्या फायदा?

जैसे लॉकडाउन लागू होते ही लाखों लोग सड़कों पर उतर आये वैसे ही छूट मिलने पर भी हो सकता है. जैसे शराब की दुकाने खुलते ही लोग टूट पड़े - क्या गारंटी है कि छूट मिलने पर लोग खुद को घरों में रोक पाएंगे ही?

क्या लोग जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं भी?

स्वास्थ्य मंत्रालय और सरकार की तरफ से प्रत्येक स्तर पर अब तक यही बताया जाता रहा है कि कोरोना भारत में तीसरे चरण यानी कम्युनिटी ट्रांसमिशन के स्टेज तक नहीं पहुंचा है. भला इससे अच्छी बात क्या हो सकती है, लेकिन जिस तरीके से कोरोना वायरस के संक्रमण बढ़ रहे हैं उसे कैसे देखा जा सकता है?

कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ने की एक वजह तो ये भी हो सकती है कि टेस्टिंग पहले के मुकाबले बढ़ी है और ऐसा होने से मामलों में तेजी से इजाफा हो रहा है. समझने वाली बात ये है कि टेस्टिंग बढ़ी जरूर है लेकिन ऐसे कम ही लोगों का टेस्ट हो रहा है जिनमें कोरोना के कोई लक्षण नहीं पाये गये हैं. अब तक जो भी टेस्ट हो रहे हैं वे उनके हो रहे हैं जो थर्मल स्क्रीनिंग में पास नहीं हो रहे हैं या फिर उनमें कोरोना संक्रमण के खास लक्षण देखने को मिल रहे हैं. कोरोना संक्रमण का टेस्ट तभी हो रहा है जब कोई व्यक्ति किसी कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आया हो और उसमें भी संक्रमण की आशंका लग रही हो.

ये तो वे मामले हैं जिनके स्रोत मालूम हैं, लेकिन कुछ मामले ऐसे भी सामने आये हैं जिनके घर वाले संक्रमित व्यक्ति की कोई ट्रेवल हिस्ट्री होने से इंकार किये हैं. जब कोरोना वायरस के संक्रमण के स्रोत का पता चले तभी उसे तीसरे चरण से जोड़ कर देखा जाता है.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रोफेसर के श्रीनाथ रेड्डी का कहना है कि कम्युनिटी ट्रांसमिशन या सामुदायिक प्रसार का न सिर्फ जोखिम है बल्कि असल में ये एक खतरा है. प्रोफेसर रेड्डी बताते हैं कि हम उन लोगों में प्रसार को देखते हैं जिन्होंने कोई यात्रा नहीं की या किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में नहीं आये और निश्चित तौर पर ऐसे मामले सामने आये हैं. एम्स में हृदय रोग विभाग के प्रमुख रह चुके प्रोफेसर रेड्डी न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहते हैं, 'ज्यादातर मामले विदेशी यात्रियों के प्रवेश के मूल कारण के इर्द-गिर्द या उनके जानकारों की यात्रा करने से संबंधित हैं, इसलिए जो लोग इसे अब भी दूसरा चरण बता रहे हैं, उनका कहना है कि यह पता लग सकने वाला स्थानीय प्रसार है और ऐसा सामुदायिक प्रसार नहीं है जिसका अनुमान न लगाया जा सके.'

प्रोफेसर रेड्डी इसे भाषायी या परिभाषित करने का मसला मानते हैं और समझाते हैं कि चूंकि ऐसा सामुदायिक प्रसार नहीं है जिसका अनुमान लगाया जा सके इसलिए ऐसे शब्द के इस्तेमाल से बचा जा रहा है. ऐसे में इस बात से तो इंकार नहीं ही किया जा सकता कि कोरोना वायरस का संक्रमण भले ही तीसरे चरण में नहीं पहुंचा हो, लेकिन उसके मुहाने पर खड़ा तो है ही.

अब सवाल ये है कि क्या लॉकडाउन 4.0 में घर से बाहर निकलने का बेसब्री से इंतजार कर रहे लोग मानसिक तौर पर तैयार हो चुके हैं कि कोरोना वायरस को लेकर जमीनी हकीकत क्या है? क्या वास्तव में लोग कोरोना वायरस के खतरे को अब भी सही तरीके से समझ सके हैं - कुछ नमूनों को छोड़ दें तो ऐसी तस्वीर तो शायद ही कहीं नजर आ रही हो जहां हर कोई मास्क लगाये हो और सोशल डिस्टेंसिंग को मान रहा हो.

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Lockdown 4.0, Narendra Modi, Relaxations

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