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Updated: 31 जनवरी, 2020 06:02 PM
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अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) को दिल्ली की चुनावी रैली (Delhi Election 2020) में प्रवेश वर्मा (Parvesh Verma) का 'आतंकवादी' बताना BJP पर ही बैकफायर करने लगा है. प्रवेश वर्मा ने अनुराग ठाकुर के साथ मिल कर बीजेपी को काफी मुश्किल में डाल दिया है. चुनाव आयोग ने भड़काऊ बयानबाजी के लिए प्रवेश वर्मा के चुनाव प्रचार पर 96 घंटे और अनुराग ठाकुर के चुनाव प्रचार पर 72 घंटे की पाबंदी लगा दी है. प्रवेश वर्मा ने अपने बयान पर सफाई में केजरीवाल को नक्सली कहने की बात तो मानी है, लेकिन आतंकवादी कहने से ये कहते हुए मुकर गये हैं कि उनकी बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया.

प्रवेश वर्मा अब जो भी सफाई देते फिरें, अरविंद केजरीवाल ने ये मुद्दा वैसे ही लपक लिया है जैसे पांच साल पहले बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने 'डीएनए' को. अब तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी बीजेपी का 'डीएनए टेस्ट' शुरू कर दिया है.

अरविंद केजरीवाल घूम घूम कर दिल्ली के लोगों से कहने लगे हैं - अगर वे उन्हें आतंकवादी समझते हैं तो 8 फरवरी को बीजेपी के चुनाव निशान कमल का ही बटन दबायें.

ये तो लेने के देने ही पड़ गये!

अरविंद केजरीवाल को अमित शाह ने ही प्रवेश वर्मा के साथ बहस की चुनौती दी थी. आमने-सामने तो नहीं, लेकिन चुनावी रैलियों के माध्यम से बहस होने तो लगी है, लेकिन माहौल और पूरा मैदान अरविंद केजरीवाल ही लूटने लगे हैं. अमित शाह को केजरीवाल और प्रवेश वर्मा के बीच ऐसी बहस की उम्मीद तो नहीं ही रही होगी.

28 जनवरी को मादीपुर की एक जनसभा में बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तुलना आतंकवादी और ठगों से कर डाली थी. प्रवेश वर्मा बोले, 'केजरीवाल जैसे नटवरलाल... केजरीवाल जैसे आतंकवादी देश में छुपे बैठे हैं... हमें तो सोचने पर मजबूर होना पड़ता है हम कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों से लड़ें या फिर केजरीवाल जैसे आतंकवादियों से इस देश में लड़ें?'

पहले तो अरविंद केजरीवाल ने प्रवेश वर्मा के बयान पर दुख जताया था, लेकिन लगता है प्रशांत किशोर की सलाह के बाद वो इसे चुनावी रंग में डुबो-डुबो कर सराबोर करने लगे हैं. अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के दरबार में गुहार लगाते हुए गुजारिश की है कि वे ही फैसला करें - 'ये दिल्ली के लोग तय करेंगे कि वे मुझे आतंकवादी मानते हैं या फिर बेटा और भाई समझते हैं?'

दिल्ली की चुनावी रैलियों में अरविंद केजरीवाल इमोशनल कार्ड खेलने लगे हैं - और अपनी जिंदगी से जुड़ी बातों का जिक्र कर पूछते हैं - क्या मैं आतकंवादी हूं?

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी पढ़ाई लिखायी से लेकर नौकरी छोड़ने तक की पूरी कहानी सुनाते हैं और बार बार यही सवाल पूछते हैं. कहते हैं वो अकेले ही नहीं उनका पूरा परिवार प्रवेश वर्मा के बयान से दुखी है, 'मुझे आतंकी बताये जाने पर मेरे मां-बाप को बहुत दुख है. उनका यही कहना था कि उनका बेटा कट्टर देशभक्त है.'

केजरीवाल लोगों से कहते हैं, 'मैं डायबिटीज का मरीज हूं. दिन में चार बार इंसुलिन लेता हूं. अगर इंसुलिन लेने वाला डायबिटीज का मरीज 3-4 घंटे तक कुछ न खाये तो उसकी मौत हो सकती है. ऐसी हालत में भी मैंने दो बार 15 दिन और 10 दिनों के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ भूख हड़ताल की. हर डॉक्टर ने कहा कि केजरीवाल 24 घंटे से ज्यादा जिंदा नहीं रहेगा. मैंने देश के लिए अपनी जिंदगी खतरे में डाली. पिछले 5 साल में उन्होंने मुझे प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मेरे घर और दफ्तर पर छापा मारा गया. मेरे खिलाफ मुकदमे दर्ज कराये - मैं आतंकवादी कैसे हो सकता हूं?'

केजरीवाल ने लोगों के सामने सवालों की झड़ी लगा दी है - क्या लोगों की सेवा करने के लिए IRS की नौकरी छोड़ने की वजह से वो आतंकवादी हैं? क्या दिल्ली के लोगों को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए उन्हें आतंकवादी बताया जा रहा है?

arvind kejriwal, parvesh vermaअब तुम्हारे हवाले दिल्ली दोस्तों...

और तमाम बातों के बीच अरविंद केजरीवाल वो बात सबसे ज्यादा असरदार लगती है वो ये कि अब वो दिल्लीवालों से अपने लिए वोट नहीं मांग रहे हैं, कहते हैं - "अगर आप लोग मुझे अपना बेटा मानते हो तो झाडू पर बटन दबा देना - और अगर आतंकवादी मानते हो तो 8 फरवरी को चुनाव के दिन कमल का बटन दबा देना!"

दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की ये भावनात्मक अपील बीजेपी को बहुत भारी पड़ सकती है. ये मौका भी बीजेपी ने ही मुहैया कराया है. 2015 के चुनाव में बीजेपी नेता केजरीवाल को भगोड़ा बता रहे थे - केजरीवाल ने माफी मांगी और दिल्लीवालों ने आम आदमी पार्टी को 70 में से 67 सीटें झोली में डाल दी.

केजरीवाल का ये कहना कि 'अगर आतंकवादी मानते हो तो बीजेपी को वोट दे देना...' मौजूदा दिल्ली सरकार की सारी कमजोरियों को हाशिये पर डाल दे रही है. सारा सत्ता विरोधी फैक्टर काफूर हो जा रहा है - ठीक वैसे ही जैसे आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसदों को पीछे कर अपने चेहरे पर वोट मांग रहे थे, अरविंद केजरीवाल भी बिलकुल वही कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री मोदी की ही तरह केजरीवाल की भी यही कोशिश है कि किसी के मन में कोई कन्फ्यूजन न रहे. केजरीवाल ने वोट देने का फैसला करने से पहले लोगों के सामने मानक रख दिया है - अरविंद केजरीवाल को वोट नहीं देने का मतलब लोग भी बीजेपी की तरह उन्हें 'आतंकवादी' मानते हैं.

2015 का DNA और 'उपद्रवी गोत्र' विवाद

21 अगस्त, 2015 को बिहार के मुजफ्फरपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली थी और उसी दौरान पुरानी बातों का जिक्र करते करते मोदी ने नीतीश कुमार के डीएनए पर सवाल खड़े कर दिये. तब प्रशांत किशोर ही नीतीश कुमार के चुनाव कैंपेन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. उससे ठीक पहले प्रशांत किशोर मोदी की चुनावी मुहिम चला चुके थे और पूरे देश में उनका नाम हो चुका था. प्रशांत किशोर ही फिलहाल दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के लिए चुनाव प्रचार का काम देख रहे हैं.

रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने अपना डिनर रद्द करने के साथ ही जीतनराम मांझी की बगावत का सपोर्ट करते हुए नीतीश कुमार को टारगेट किया, 'जीतन राम मांझी पर जुल्म हुआ तो मैं बेचैन हो गया. एक चाय वाले की थाली खींच ली, एक गरीब के बेटे की थाली खींच ली - लेकिन जब एक महादलित के बेटे का सबकुछ छीन लिया तब मुझे लगा कि शायद डीएनए में ही गड़बड़ है.' फिर क्या था नीतीश कुमार ने हाथोंहाथ मुद्दा कैच कर लिया और इसे अपने स्वाभिमान और बिहार के आन-बान-शान से जोड़ दिया. पूछने लगे, 'ये किसके डीएनए की बात कर रहे हैं? मैं कौन हूं? मैं कहां से आया हूं? मैं आपका हूं. ये बिहार के डीएनए पर ऊंगली उठाई गई है - जिनके पूर्वजों का देश की आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था वो हमारे डीएनए पर उंगली उठा रहे हैं.'

बाद में तो लोग डीएनए जांच के लिए अपने नाखून और बाल के नमूने प्रधानमंत्री कार्यालय भेजने के लिए सड़कों पर उतर आये - और महीने भर के भीतर देखते ही देखते हजारों सैंपल दिल्ली भेज दिये गये.

अरविंद केजरीवाल ने प्रवेश वर्मा के बयान को भी ठीक वैसे ही उठा लिया है - और घूम घूम कर लोगों से पूछने लगे हैं 'क्या मैं आतंकवादी हूं?'

बीजेपी की मुश्किल तो ये है कि बिहार चुनाव से पहले उसी साल उससे पहले हुए दिल्ली चुनाव में हुई गलती दोहरा दी है. 2015 में बीजेपी केजरीवाल को मीडिया में विज्ञापन देकर टारगेट कर रही थी. कभी केजरीवाल को भगोड़ा बताती कभी कुछ और. इसी कड़ी में एक ऐसा विज्ञापन छप गया जिसका पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा - 'उपद्रवी गोत्र'. तब अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी के विज्ञापन को अग्रवाल समाज की बेइज्जती के तौर पर पेश कर दिया था - और वैसे ही शोर मचाया था जैसे आगे चल कर नीतीश कुमार ने डीएनए को लेकर हल्ला बोल दिया था.

bjp advertisement 20152015 में प्रकाशित बीजेपी का 'उपद्रवी गोत्र' वाला विज्ञापन जो बीजेपी की हार के कारणों में से एक था.

देखा जाये तो प्रवेश वर्मा का बयान भी केजरीवाल के पुराने बयानों जैसा ही है - लेकिन बात मौके की होती है. पूरे पांच साल चाहे जो भी बोला या कहा जाये, सब भूल जाता है. चुनाव के वक्त की बात अलग होती है.

ये अरविंद केजरीवाल ही हैं जो राजनीति में आने से पहले संसद के भीतर बैठे लोगों को लुटेरे, डकैत, हत्यारे और बलात्कारी तक कह डाले थे. संसद में इस मुद्दे पर खूब चर्चा भी हुई लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया. सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया गया. ये अरविंद केजरीवाल ही हैं जो अरुण जेटली सहित कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे, लेकिन अदालत में गर्दन फंसने लगी तो माफी मांग कर बच निकले.

और ये अरविंद केजरीवाल ही हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'मनोरोगी' और 'कायर' तक कह चुके हैं - लेकिन तब दिल्ली में चुनाव नहीं हो रहे थे. दिल्ली वालों ने 2015 में केजरीवाल को माफी जरूर दे दी थी, लेकिन जब MCD चुनाव में बोले थे कि अगर अपने बच्‍चों को डेंगू की बीमारी से बचाना चाहते हैं तो बीजेपी को वोट न दें - और अगर निगम चुनाव में बीजेपी की जीत होती है तो दोषी वोट देने वाले ही होंगे.

अरविंद केजरीवाल ऐसी अपील कोई पहली बार नहीं कर रहे हैं, बस इतना ध्यान रहे 2015 के विधानसभा चुनाव, MCD चुनाव और 2019 के आम चुनाव के नतीजे अलग अलग आये - जरूरी नहीं कि बार बार लोग भावनात्मक अपील पर पिघल ही जायें.

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