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Updated: 03 जनवरी, 2018 06:00 PM
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कहीं ऐसा तो नहीं कुमार विश्वास अपनी तुलना स्मृति ईरानी से करते रहे हैं? वैसे अपने अपने क्षेत्र में दोनों ग्लैमर के महारथी हैं - और तमाम बातों के अलावा कुमार विश्वास और स्मृति ईरानी में एक कॉमन बात ये है कि दोनों ही अमेठी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को चुनौती दे चुके हैं.

फर्क सिर्फ ये है कि स्मृति के हार जाने के बावजूद बीजेपी ने उन्हें राज्य सभा भेजा और कैबिनेट में अहम जिम्मेदारी दी. जब आप की बारी आयी तो राज्य सभा के लिए कुमार का पत्ता ही कट गया.

सवाल ये है कि दो बाहरी लोगों के अलावा संजय सिंह का रेस जीतना बड़ी बात है या कुमार विश्वास का चूक जाना? सीधा सा फंडा है कि जिस पर खुद को ही रिप्लेस करने का शक हो उसे केजरीवाल भला और तवज्जो क्यों देते? असल बात तो ये है कि कुमार विश्वास तो रेस में कहीं थे ही नहीं, लगता तो ये है कि मीडिया की सुर्खियों में रहने का इंतजाम भी उन्होंने खुद ही किया था.

'विश्वास' संकट से इतर!

आप के राज्य सभा सदस्यों को लेकर जारी चर्चा के बीच जिन महत्वपूर्ण लोगों ने कुमार विश्वास के पक्ष में ट्विटर पर आवाज उठायी उनमें हार्दिक पटेल भी शुमार रहे. हार्दिक के हिसाब से सत्ता पक्ष को चुप कराने की कुव्वत अगर किसी में है तो वो हैं कुमार विश्वास. एक दौर वो भी था जब आप नेता अरविंद केजरीवाल भी हार्दिक के ट्वीट को रीट्वीट किया करते रहे.

सवाल ये है कि क्या आम आदमी पार्टी को अरविंद केजरीवाल के होते हुए ऐसे ही किसी नेता की जरूरत थी जो सत्ता पक्ष को चुप करा सके? आप से राज्य सभा जाने वाली चर्चाओं की सूची में नाम तो अरविंद केजरीवाल का भी रहा.

kumar, kejriwal, sanjay'अभिमन्यु' होने का भ्रम!

आप के पास राज्य सभा की तीन सीटें है - और उसी सहारे उसे संसद के भीतर और बाहर सभी चीजों को साधना है. किसी भी पार्टी के लिए राज्य सभा की सीट, लोक सभा की तरह महज यूं ही एक सीट नहीं होती. एक-एक सीट के लिए सैकड़ों दावेदार होते हैं. नाम फाइनल होते-होते भी दर्जनों दावेदारों के नाराज होने का रिस्क भी रहता है और नाराजगी के बावजूद उन्हें अपने साथ बनाये रखना ही तो राजनीतिक हुनर होता है. दरअसल, आप में 'विश्वास' संकट, बिल्कुल 'विश्वास के संकट' जैसा ही है.

ये संकट उस वक्त और गहरा गया जब आप में कथित तौर पर तख्तपलट की तैयारी चल रही थी. उस वक्त की उड़ती उड़ती आई खबरों की मानें तो तब हालत ये थी कि केजरीवाल को खुद के यकीन पर भी यकीन नहीं हो रहा था. बरसों का रिश्ता जो था. कुछ-कुछ वैसे ही जैसे लंच पर गया कोई कुमार विश्वास का दोस्त ही स्टिंग ऑपरेशन करके चला आया. केजरीवाल ने रिश्ता तो नहीं खत्म किया, लेकिन दोबारा यकीन होने तक उसे विलंबित भाव में निलंबित कर दिया.

मीडिया रिपोर्ट को याद करें तो केजरीवाल इस बात से आश्वस्त हो चुके थे कि कपिल मिश्रा के मिशन चीफ मिनिस्टर के डायरेक्टर वही हैं. केजरीवाल को किसी और ने नहीं बल्कि स्टाफ के लोगों से ही ये जानकारी मिली थी - और महज एक कॉल कर केजरीवाल ने अपने सारे शक शुबहे को तात्कालिक यकीन में बदल लिया था. बावजूद इसके कोई वैसी कार्रवाई नहीं की जैसी योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के केस में हुई थी. केजरीवाल ने सियासी खेल के बीच संबंधों को तरजीह दी और किसी दूरगामी सोच की तरह वक्त के साथ मौके और अंजाम का इंतजार करने लगे.

विश्वास का संकट भी ऐसी ही मुश्किल है जिसमें दोबारा यकीन दिलाने की जिम्मेदारी उसी शख्स की होती है, जो खराद पर चढ़ा दिया गया हो. केजरीवाल को दोबारा यकीन दिलाने की जिम्मेदारी कुमार विश्वास की ही बनती थी. फिर भी, कुमार विश्वास सियासी शायरी और जख्मों को हरा भरा रखने वाले ट्वीट करते रहे. कभी वो 'अभिमन्यु' बन जाते तो कभी ‘पहले देश, फिर दल, फिर व्यक्ति’ जैसी बातें किया करते. यही वजह रही कि एक रीट्वीट के जरिये केजरीवाल ने भी साफ कर दिया कि पद-लोलुप लोगों के लिए पार्टी में जगह नहीं के बराबर है. 28 दिसंबर को कुमार विश्वास के कुछ समर्थक उन्हें राज्य सभा भेजने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गये थे.

कौन कितने करीब?

'तुम' से ज्यादा करीब 'आप' को समझा जाता है. आप के भीतर ऐसा भाव जिसे बतौर रुतबा भी समझा जा सकता है वो सिर्फ कुमार विश्वास को अब तक हासिल है. किसी को सीधे पहले नाम से बुलाना भी ऐसी ही करीबी का प्रतीक माना जाता है, जिसमें तुम का भाव भी देखा जा सकता है.

कुमार विश्वास आम आदमी पार्टी में अकेले शख्स होंगे जो हमेशा 'अरविंद' कह कर बुलाते हैं या सार्वजनिक तौर पर नाम लेते हैं. मनीष सिसोदिया के साथ भी उन्हें 'जी' लगाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती. यही वजह है कि बावजूद इन सबके संजय सिंह सहित दूसरे करीबियों के बाजी मार लेने पर बहुतों को आश्चर्य हो रहा है.

kumar, kejriwal, sanjayकेजरीवाल के करीब कौन?

आप के उम्मीदवारों के ऐलान के बाद कुमार की टिप्पणी में कटाक्ष तो था, लेकिन अरविंद केजरीवाल के प्रति संबोधन का अंदाज वही रहा, 'अरविंद ने मुझसे एक बार कहा था कि सर जी, आपको मारेंगे, पर शहीद नहीं होने देंगे. मैं अपनी शहादत स्वीकार करता हूं, बस एक निवेदन करता है कि युद्ध का भी एक छोटा सा नियम होता है कि शव के साथ छेड़छाड़ नहीं की जाती. शहीद तो कर दिया, पर शव के साथ छेड़छाड़ न करें और आगे से पार्टी दुर्गंध ना फैलाए.'

कुमार विश्वास ने दावा किया कि उन्हें सच बोलने की सजा मिली है. कुमार विश्वास ने मीडिया से अपनी प्रतिक्रिया कहा, 'चाहे सर्जिकल स्ट्राइक का मामला हो, पंजाब में अतिवादियों के प्रति सॉफ्ट रहने मामला हो, जेएनयू का मामला हो... सैनिकों की बात हो, मैंने जो सच बोले, उसका मुझे दंड मिला है.' राज्य सभा उम्मीदवारों के नाम का ऐलान करने आये दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया से कुमार विश्वास को लेकर सवाल भी पूछे गये, लेकिन वो वैसे ही इग्नोर कर उठ कर चल दिये जैसे कपिल मिश्रा के आरोपों पर पर एक लाइन का रिएक्शन देकर आगे बढ़ गये थे.

आप के उम्मीदवार

मनीष सिसोदिया ने बताया कि आप की ओर से 18 बड़े लोगों से संपर्क किया गया था. ये वे लोग थे जो आप की ओर से राज्य सभा में भेजे जाने की पेशकश ठुकरा दी. मान कर चलना चाहिये इन्हीं में से एक रघुराम राजन भी रहे. सिसोदिया के मुताबिक इन लोगों ने अपनी इंडिपेंडेंस बनाये रखने को तरजीह दी और सरकार के प्रति अपने सख्त रूप में समझौता नहीं करने का निश्चय जारी रखने की बात कही.

सिसोदिया ने राज्य सभा के लिए आप के तीनों उम्मीदावारों - संजय सिंह, नारायण दास गुप्ता और सुशील गुप्ता के बारे में विस्तार से जानकारी दी और बताया कि आप की पीएसी के 9 में से 8 सदस्यों ने सभी नामों पर सहमति जतायी, सिर्फ एक सदस्य को इन मुद्दे पर असहमति रही. सिसोदिया के साथ प्रेस कांफ्रेंस में गोपाल राय भी आये थे.

मालूम नहीं कुमार विश्वास को भरोसा रहा या नहीं, लेकिन सही बात तो ये है कि अरसा पहले वो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण वाली कैटेगरी में पहुंच चुके थे. वैसे ये मुश्किल और दुख सिर्फ कुमार विश्वास का ही नहीं उन सभी लोगों के लिए है जो ऐसी ही किसी उम्मीद में जमा-जमाया कॅरिअर छोड़ कर आप की राजनीति में कूद पड़े - और कई अब भी मेनस्ट्रीम और सोशल मीडिया पर आप का झंडा लिये दहाड़ते रहते हैं. अब तक तो वे न माया मिली न राम वाली हालत में ही हैं. कहने को तो आप ने कुछ लोगों को 2014 में टिकट भी दिया था, लेकिन लोक सभा का मैदान तो महज जुआ साबित हुआ, लॉटरी निकल गयी होती तो बल्ले बल्ले, वरना बघारने के लिए फिलॉसफी तो है ही - लड़ाई जीत हार के लिए थोड़े ही होती है, चाहे वो बनारस की गलियों में लड़ी जाये या फिर दिल्ली के दरबार में.

वैसे मनीष सिसोदिया से मीडिया ये भी जानना चाहता था कि कुमार विश्वास को लोक सभा के लिए बचा कर रखा गया है क्या? सिसोदिया के बगैर सीधा जवाब दिये चले जाने से सवाल जहां का तहां रह गया - 'क्या 2019 में कुमार विश्वास फिर से अमेठी में राहुल गांधी को चुनौती देंगे?'

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